Friday, 12 April 2013

संबोधन ...!!!

संबोधन

मैं तुम्हारे लिए
सीधे-सपाट
कुछ संबोधन ढूँढ़ रहा हूँ |
वस्तुतः वे सारे संबोधन,
वे सारे विशेषण
जो मैं तुम्हें देता रहा
दे जाते रहे बदले में
मुझे एक-एक नया छाला
अपने तन-मन पर
हज़ार अश्वत्थामाओं को ढोने की विवशता।
अब उन्हें दुहराने का
हौसला नहीं रहा
तुम्हें टेरने का
स्थान नहीं बचा 
नया जख्म पिरोने का
सँभालने का परम्परित अर्थों की सड़ांध
जो फैल-फ़ैल जाती रही
मेरे आसपास !
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नांव

मैं तेरे लई
सिवे-पधरे
कुछ नां लभ रिहा हाँ
दरअसल ओह सारे नांव
ओह सारे बिशेशन
जो मैं तैनू देंदा रिहाँ हाँ
दे जांदे रैए बदले 'च
मैंनू इक-इक नवां छाला
अपने तन-मन उते
हज़ार अस्वत्थामियानु ढोंण दी मजबूरी
हुण उनानु दौराउण दा
हौसला नहीं रिहा
तैनू पुकारण दा
थां नहीं बची नवां नासूर सम्मालण दी
परम्परावां दे अर्थ्याँ दी हवाड
खिड-पुड़ जांदी रई
मेरे आले- दुआले !
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(पंजाबी अनुवाद : टी. सी. रत्रा, कैलगरी,अल्बर्टा, कनाडा)