Tuesday, 9 December 2025

जिगोलो

अभी प्राप्त प्रश्न — पुरुष वेश्या (जिगोलो) के लिए हिंदी शब्द?
उत्तर — पहले तो यह धारणा मन से निकाल लीजिए कि किसी भी भाषा के में प्रयुक्त कोई शब्द उसी अर्थ में दूसरी भाषा में भी मिल जाएगा। भाषा का अटूट संबंध उस भाषा को बोलने वाले समाज और उसकी संस्कृति से होता है। 

जो बात संस्कृति में स्वीकार्य नहीं, उसके लिए शब्द दुर्लभ होता है। जैसे जूठा/जूठन के लिए अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं है क्योंकि वहाँ जूठन की कोई संकल्पना ही नहीं। इसी प्रकार हिंदी या संभवतः अन्य भारतीय भाषाओं में 'जिगोलो' का पर्याय नहीं मिलेगा। 

भविष्य में समस्त पद के रूप में कोई नवनिर्मित नाम हो सकता है, जैसे जैसे तलाक, डाइवोर्स के लिए विवाह-विच्छेद बना। और यह भी संभव है कि वही शब्द हिंदी में प्रयुक्त हो जाए, जैसे तलाक, डायवोर्स हिंदी में भी चल पड़े हैं।
सुरेश (10.12.25)

Saturday, 29 November 2025

बेपेंदी का लोटा

बेपेंदी का लोटा कहावत जिस लोक ने बनाई होगी उसने लोटे के गुण-दोष बहुत निकट से देखे-परखे होंगे। लोटे में जल लेकर रसोई-चौके में भोजन करने बैठे। निवाला गले में फँसा। कठिनाई से हिचकी रोकते हुए आपने लोटा उठाना चाहा, और देखा कि वह तो दूसरी ओर लुढ़का हुआ है। पड़ गई जान संकट में।
एक दूसरी स्थिति उस युग की सोचिए जब आँगन वाले सरकारी शौचालय या शयनकक्ष से चिपके शौचालय नहीं थे और आप लोटा-ए-आज़म मिर्जापुरी को लेकर किसी झाड़-झंखाड़ या टीले की आड़ में हो लेते थे। लोटा अटकाकर आप कर्म निवृत्ति के लिए बैठे। जब ज़रूरत हुई, लोटे के निकट आए तो देखा बेपेंदी का बादशाह तो लुढ़का पड़ा है! निदान "आतुरे मर्यादा नास्ति" अर्थात संकट के समय मर्यादा या नैतिकता का पालन आवश्यक नहीं रह जाता है, क्योंकि उस समय व्यक्ति का मुख्य उद्देश्य अपनी जान बचाना या संकट से बाहर निकलना होता है। तो संकटकालीन शास्त्रीय विधान का अनुपालन करते हुए आपको घास-पात पोछन या माटी घिस्सन का सहारा लेना पड़ता है। हमारे एक कक्का जी तो कहा करते थे कि ऐसे संकट के समय तीन बार "दक्षिण कर्ण" (दायाँ कान) का स्पर्श कर लेना पर्याप्त है क्योंकि दाहिने कान में गंगा का वास होता है!बेपेंदी के लोटे के न रहने से ऐसे अनेक संकटकालीन काव्य रसों का स्थायीभाव ही विलुप्त हो गया।मुहावरे के रूप में बेपेंदी का लोटा का उपयोग किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जो अपनी राय को परिस्थिति के अनुसार लुढ़ककर बदलता रहता है और जिसका कोई स्थायी रुख या सिद्धांत नहीं है। अपनी सुविधा के अनुसार पक्ष बदलता रहता है। ऐसे लोटे राजनीति में खूब देखे जाते हैं।नई पीढ़ी ने संभवतः ऐसा लोटा ही न देखा हो तो उसे मुहावरा समझाना कठिन है। हाँ, मानव शरीर धारी बेपेंदी के लोटे के गुण-कर्म-स्वभाव की चर्चा करके समझाया जा सकता है।बेपेंदे का लोटा के समतुल्य एक अन्य मुहावरा है– थाली का बैंगन होना।
बैंगनों के बारे में फ़िर कभी……!

Monday, 3 November 2025

इन्हें सँभाले रहना

(फोटो सौजन्य – अलका जोशी कौशिक, अभी ट्विटर पर इस चित्र को देखकर यह लिखने का मन हुआ)

नीलम-सा नभ और सजी 

हीरक मणि पर्वतमाला

मरकत-जैसे लहराते वन, 

ज्यों आँचल हरियाला


यह पुखराजी धूप दमकती

बिल्लौरी आँगन में
जाने कितनी यादें 

उमड़-घुमड़ आती हैं मन में

 
जन्मा यहीं, यहीं खेला हूँ, 

पड़ा दूर पर रहना
नया जन्म लेकर आऊँगा– 

इन्हें सँभाले रखना!

💚

Tuesday, 19 August 2025

क्या पुल्लिंग अशुद्ध है

पुल्लिंग <—> पुलिंग 
[वरिष्ठ पत्रकार भाई ओम थानवी जी की एक फेसबुक पोस्ट के संदर्भ में]

पुल्लिंग पुंस (नर) के लिंग (चिह्न) के अर्थ में रचा गया हिंदी का अपना सामासिक शब्द है।
 कुछ अन्य रूप जो दिखाई पड़ रहे हैं और शुद्ध बताए जा रहे हैं, उनमें पुर्लिंग बनेगा नहीं। पुंल्लिंग का उच्चारण नहीं हो सकता, इसलिए असिद्ध। पुँल्लिंग बोला जा सकता है किंतु मकार को अनुनासिक बनाने का नियम कम-से-कम मुझे मालूम नहीं है। 

स्रोत भाषा संस्कृत में पुल्लिङ्ग के स्थान पर पुंलिङ्ग शब्द का प्रयोग किया जाता है। 
"पुंलिङ्गा इव नार्य्यस्तु स्त्रीलिङ्गाः पुरुषाभवन्।" 
(~ महाभारत)

यदि संस्कृत वर्तनी ही शुद्ध होती हो तब तो पुल्लिंग अशुद्ध है, किंतु हमें यह भी देखना होगा कि हिंदी संस्कृत से बहुत आगे निकल आई है। उसका अपना व्याकरण कुछ ऐसा भी है जो संस्कृत से पूरा-पूरा मेल नहीं खाता। उसे बार-बार संस्कृत के व्याकरण में क्यों जकड़ा जाए। सैकड़ों शब्द ऐसे हैं जो वर्तनी, लिंग, अर्थ आदि में संस्कृत से भिन्न हैं या एकदम विपरीत हैं। भिन्न लिंग का ही एक उदाहरण देना चाहूँगा–
देवता- (संस्कृत में स्त्रीलिंग, हिंदी में पुल्लिंग) ।
आत्मा (संस्कृत में पुल्लिंग, हिंदी में स्त्रीलिंग)।

तद्भव रूप में विकसित हुए शब्दों में पुल्लिंग मेरी जानकारी में एकमात्र ऐसा शब्द है जिसमें अनुस्वार का ल् में परिवर्तन दिखाई पड़ता है। व्याकरण से भाषा बनती नहीं, सँवरती है और व्याकरण का अनुशासन भाषा के समकालीन प्रयोगों की अनदेखी नहीं कर सकता। लोकसिद्ध को असिद्ध भी नहीं ठहराया जा सकता।

यह मेरे विचार हैं। चर्चा से इन्हें आगे बढ़ाया जा सकता है और सुधार किया जा सकता है।

Monday, 11 August 2025

नाम में क्या रखा है

नाम में क्या रखा है
आजकल नएपन की दौड़ में आगे निकलने के लिए प्रायः निरर्थक और हास्यास्पद नए-नए अनेक नाम प्रचलन में हैं। इनमें से अनेक तो महापंडित गूगलानंद द्वारा समर्थित बताए जाते हैं। ऐसे नामों की सूची में कुछ लोग "तनिष्क" की गणना भी करते हैं।

तनिष्क निरर्थक नहीं, नव निर्मित है। संभव है विज्ञापन की भाषा में सायास बन गया हो। हमारा विचार है कि यह तनिष्क दो घटकों से बना 'पोर्टमेंट्यू' शब्द है और सार्थक है। 'निष्क' का अर्थ है सोने का सिक्का, दीनार, अशर्फी। अमरकोष के अनुसार 
दीनारेऽपि च निष्कोऽस्त्री (३.३.१४)
मनुस्मृति में– चतुःसौवर्णिको निष्को (८.१३७)
 चार माशा भार के स्वर्ण को भी निष्क कहा गया है। पंजाबी में इसका अपभ्रंश आज भी विद्यमान है– निक्का (=छोटा सिक्का, पैसा)।

तनिष्क में निष्क से पहले जो /त/ दिखाई पड़ रहा है वह तनिष्क के स्वामित्व वाली कंपनी टाटा के नाम का पूर्वार्ध है- ta ट => त। इसलिए पूरा नाम हो गया तनिष्क। अर्थात टाटा का निष्क (लक्षणा से टाटा कंपनी का स्वर्ण व्यवसाय)। 
इसलिए यदि अशर्फी लाल, स्वर्ण कुमार जैसे नाम हो सकते हैं तो तनिष्क क्यों नहीं!

एक बात और। आवश्यक नहीं कि विज्ञापन बनाने वाली कंपनी के कॉपीराइटर ने उपर्युक्त सारी परिभाषाओं और संभावनाओं पर विचार किया हो। 

एक और संभावना विचारणीय है। शब्द की अंग्रेजी वर्तनी Tanishq के अंत में Guttural /q/ (कंठ्य /क़/) है। इसलिए अधिक बौद्धिक व्यायाम में न पड़ते हुए तनिष्क के सीधे-सीधे दो खंड होंगे– तन (फ़ारसी)+ इश्क़(अरबी), बदन से प्यार। अर्थ संकेत यह कि अपने शरीर से प्रेम करने वाले आभूषणों से अधिक प्यार करते हैं। इस दृष्टि से भी स्वर्ण आभूषणों की निर्माता कंपनी के लिए Tanishq (तनइश्क़) नाम अधिक उपयुक्त लगता है।

Sunday, 22 June 2025

द्रविड़ मूल का हुड़का

बाएँ कंधे का ताल वाद्य हुड़का

कुछ लोग डमरू और हुड़का को एक मानते हैं। डमरू और हुड़का एक ही वाद्य के नाम नहीं हैं। दोनों ताल वाद्य हैं लेकिन दोनों की बनावट और बजाने की विधि अलग है। डमरू शब्दकल्पद्रुम और वाचस्पत्यम् के अनुसार प्रतिध्वन्यात्मक शब्द है क्योंकि इसको बजाने पर डम्-डम् शब्द निकलता है– "डम् इति अव्यक्तशब्दं ऋच्छति"। बीच का भाग पतला होता है और दोनों ओर दो गोलियाँ लटकी होती हैं जिनसे इसे बजाया जाता है। आचार्य भरत ने इसे कापालिकों और योगियों का वाद्य कहा है। 
हुड़का के लिए संस्कृत शब्द है हुडुक्कः। यह भी प्रतिध्वन्यात्मक शब्द है। हुडुक् इति शब्देन कायति शब्दायते इति अर्थात जिसको बजाने से हुडुक्क-हुडुक्क की आवाज़ निकले, वह हुड़का।
स्पष्ट है कि दोनों वाद्यों के स्वर अलग-अलग हैं इसलिए नाम भी अलग-अलग। डम-डम करने वाला डमरू और और हुडुक्क-हुडुक्क करने वाला हुड़का। नैषध में उल्लेख है, "न ते हुडुक्केन न सोऽपि ढक्कया न मर्दलैः" (नैषध.15.17)
दोनों को बजाने की विधि भी अलग है। डमरू को बीच से पड़कर ऐसे हिलाया जाता है कि उससे बँधी हुई दो गोलियाँ उसके दोनों ओर मढ़े हुए चमड़े पर चोट करके आवाज़ करें। हुड़के को लंबे फीते से बाएँ कंधे से लटकाया जाता है और दाँईं हथेली से चोट करके बजाया जाता है।
हुड़का की व्युत्पत्ति भी हुड़के की ही तरह बाँए कंधे पर टिकी है! 1970 के दशक में इन पंक्तियों के लेखक का एक आलेख "भाषा" त्रैमासिक (केहिनि) में प्रकाशित हुआ था, "कुमाउँनी में द्रविड़ भाषाओं की तलछट", जिसमें संभावना व्यक्त की गई थी की हुड़ुक, हुड़का शब्द द्रविड़ मूल का हो सकता है। अब इस मान्यता को अधिक दृढ़ता से प्रस्तुत किया जा सकता है।
वस्तुत: हुड़का भारत का बहुत प्राचीन वाद्य है और आज भी दक्षिण में बहुत लोकप्रिय है। दक्षिण भारत के मंदिरों और संगीत सम्मेलनों (तालवाद्य कच्चेरी) में इसे विधिवत बजाया जाता है। केरल के सोपान संगीतम् में इसका बड़ा महत्व है। माना जाता है कि इसकी संरचना में चार वेद और 64 कलाएँ प्रतीकात्मक रूप से दर्शाई जाती हैं। उत्तराखंड में इस तालवाद्यका नाम हुड़ुक या हुड़को है। इसकी गूँज बड़ी विचित्र और आकर्षक होती है। हुड़कियाबौल, जागर आदि लोक आयोजनों में आवश्यक माना जाता है क्योंकि इसका स्वर उत्तेजक होता है। इसके पारंपरिक वादक अब लुप्त होते जा रहे हैं। मलयालम, कुमाईं, गढ़वाली, तमिल आदि में नाम-साम्य इसकी व्यापकता, प्राचीनता का प्रमाण हैं।
 हुड़का को तमिऴ में उडक्कै உடூக்கை कहां जाता है और मलयालम में इडक्का, इडक्कै। इन दोनों शब्दों में पहले भाग उडु और इड का अर्थ है बाँयाँ और कै अर्थात हाथ, बाँह। वाद्य यंत्र को बाएँ कंधे से लटकाकर बजाया जाता है, इसलिए यह नाम बिल्कुल सार्थक है और व्यंजक भी। 



Sunday, 8 June 2025

छुटभैया कौन

छुटभैया कौन
छुट भैया शब्द तो दो मासूम शब्दों का कर्मधारय समास है— छोटा (विशेषण ) भाई (संज्ञा)। प्यार से छोटा भाई छुटभैया हो गया। लेकिन व्यवहार में यह इतना छोटा, प्यारा और मासूम शब्द अब नहीं रहा। 
ऐसा व्यक्ति जिसकी गिनती बड़े आदमियों में न होकर छोटे या साधारण लोगों में होती है। कम हैसियत का, अनुभवहीन और छोटी उम्र का बदमाश, प्रशिक्षु गुंडा, जूनियर नेता इस श्रेणी में आते हैं। लूट खसोट, हफ़्ता वसूली, तोड़फोड़ और अनेक प्रकार की गुंडई में शामिल कम उम्र के अपराधी जो किसी न किसी बड़े नेता या नामी गुंडे की आड़ में काम करते हैं, उन्हें उस नामी-गिरामी 'बड़े' का छुटभैया कहा जाता है।
छुटभैया नेताओं की ज़िंदगी एकदम बॉलीवुड फिल्मों की तरह ही होती है—अनाम और संघर्ष से भरी। कुछ छोटी मोटी करतूतों के बाद अगर बड़े नेता की नज़र में आ गए तो विधायक बनने का सपना पाले रहते हैं और मौका मिलते ही पंचायतों , सभा- समितियों, संस्थाओं के कार्यकर्ता से प्रमुख तक के पद सँभाल लेते हैं और दाँव लगा तो विधायिका या संसदों तक पहुँच जाते हैं।
एक बड़ी विडंबना भी है इस नाम के साथ।छुटभैया नेता को कोई छुटभैया नेता नहीं कहता। ये स्वयं भी अपने को इस नाम से पहचाना जाना नहीं चाहते। न खुद को इस नाम से संबोधित करते हैं, न उनके आसपास रहने वाले लोग करते हैं। वे चाहते हैं उन्हें नेताजी कहा जाए। कुछ लोग उन्हें नेता कह भी देते हैं लेकिन असली नेता के सामने नहीं। 

Thursday, 22 May 2025

हवस से हौसिया


हिंदी-उर्दू में हवस शब्द अरबी से आया है। मराठी, कोंकणी तथा कुछ अन्य उत्तर भारतीय आर्य भाषाओं में भी यह शब्द उपस्थित है। शब्दकोशों के अनुसार हवस का अर्थ है— वह इच्छा जिसकी संतुष्टि बराबर अथवा बार-बार की जाती हो, परंतु फिर भी जो और अधिक संतुष्टि के लिए उत्कट रूप धारण किये रहती हो। उत्कंठा, लालसा, बढ़ा हुआ शौक़, लोभ, लालच, वासना। (हिंदवी शब्दकोश)
पद्माकर कहते हैं -
सजै विभूषन बसन सब, पिया मिलन की हौस।
(सारे वस्त्राभूषणों से शृंगार कर लेने के बाद अब पिया से मिलने की हवस रह गई है!)
हवस से कुमाउँनी और मराठी में हौस बना है और हौस का विशेषण है हौसिया। कुमाउँनी की प्रवृत्ति के अनुसार स का श उच्चारण करने से होगा - हौशिया। मराठी में हौस, हौश दोनों हैं। हौसिया को हौसदार भी कहते हैं।
विकास क्रम इस प्रकार है 
हवस (ہَوَس अरबी)—> हौस > हौसिया > हौसदार।
हौसदार मराठी में भी है जिसका अर्थ है- रसिक, मौज-मस्ती का शौकीन।
"आपल्या मनाची हौस पुरविण्याचा स्वभाव असलेला।"
~ (मराठी शब्दकोश, मोल्सवर्थ)।
 कुमाउँनी में हौशिया उस रंगीन तबीयत के आदमी को भी कहते हैं जो नए-नए कपड़े पहनने का, अच्छे खाने का, मेले-ठेले में बिंदास नाचने का शौकीन हो। युवती की प्रसन्नता लोकगीत के इस मुखड़े से व्यक्त होती है 
"छुट्टी ऐ रौछ म्यर नंदू हौसिया!"
(मेरा हौसिया नंदू सेना की ड्यूटी से छुट्टी पर आया है।)

#भाषा #शब्दबोध #कुमाउँनी #मराठी #हवस

Sunday, 11 May 2025

विलायत और विलायती

विलायत कथा 
विलायत अरबी भाषा का शब्द है। वली (देखभाल करने वाला, रक्षक) से बना जो तुर्की , फ़ारसी और कुछ मध्य एशियाई भाषाओं में भी प्राप्त होता है। अरब और मध्य एशिया के देशों में प्रांत या ज़िले के स्तर की प्रशासनिक इकाइयों को विलायत, वेलायत कहते हैं। मूल अर्थ में विस्तार होने से इसका अर्थ बना दूसरा राज्य या पराया देश, समुद्र पार का देश। पहले इस शब्द का प्रयोग ईरान, तुर्किस्तान आदि के लिये होता था। ईरानियों के भारत से संपर्क के साथ-साथ यह शब्द भारत पहुँचा होगा। विलायत संज्ञा से ई प्रत्यय जोड़कर विशेषण बना 'विलायती' जो विलायत से अधिक प्रचलित है। भारत के मुख्य भूभाग में अन्य देशों से आने वाली अनेक वस्तुओं के लिए, पशुओं , वनस्पतियों आदि के लिए विलायती विशेषण का उपयोग मिलता है। जैसे मध्ययुगीन कवि दादू के समकालीन सुंदरदास ने विदेशी हाथी घोड़ों के लिए विलायत देश के हाथी घोड़े कहा है।

भारतीयों की दृष्टि से इंग्लैंड, अमेरिका, यूरोप आदि देश या महाद्वीप पहले विलायत कहे गए किंतु विलायत शब्द भारत में अंग्रेजों से बहुत पहले आ चुका था। प्रमुख विलायती (विदेशी ) शासक अंग्रेज थे, इसलिए अंग्रेजों के देश इंग्लैंड को विलायत/बिलायत कहा गया। यह नाम अंग्रेजों ने भी आपसी बोलचाल में स्वीकार किया। गोरे सैनिकों को और ब्रिटेन को प्यार से ब्लायटी Blighty कहा जाता था क्योंकि अंग्रेजी में ती के लिए टी है! हॉब्सन जॉब्सन शब्दकोश में सोडा वाटर को ब्लाइटी पानी और टमाटर को ब्लाइटी बैगन कहा गया है। अधिकतर इंग्लैंड और अंग्रेजों के लिए प्रयुक्त होने के बाद भी उन चीजों को विलायती कहा जाता रहा जो इस देश में कहीं बाहर से आईं। विलायती कीकर, बबूल, इमली, विलायती (कंधारी)घोड़ा, चूहा, पानी, शराब, इत्र और बहुत सारी चीज़ें जो स्वदेशी नहीं थीं , वे विलायती कही गईं । स्वतंत्रता संघर्ष के दौर में स्वदेशी आंदोलन में विलायती (विदेशी) चीजों का बहिष्कार किया गया। 
व्यंग्य या लाक्षणिक प्रयोग में विलायती का अर्थ बोली न समझने वाला, वहशी, जंगली, अनुभवहीन, नासमझ भी हो गया।
हिंदी साहित्य में विलायत विलायती का प्रयोग मध्ययुग से ही प्राप्त होता है।
मध्यकालीन कवि सुन्दरदास (1596- 1689) ने कहा है —
देश विलाइति हाथी घोरे।
ज्यौं ज्यौं बाँधे त्यौं त्यौं थोरे।।
—सुन्दरदास ग्रंथावली 1 पृष्ठ 289
खड़ी बोली हिंदी के साहित्य में भारतेंदु से भी पुराने कवि लोकरत्न पंत 'गुमानी' (१७९४-१८४६) ने सर्वप्रथम विलायत शब्द का उल्लेख अपने एक छंद में किया है। व्याजस्तुति (प्रशंसा के बहाने निंदा) करते हुए कहते हैं
दूर विलायत जल का रस्ता करा जहाज सवारी है, 
सारे हिन्दुस्तान भरे की धर्ती वश कर डारी है। 
और बड़े शाहों में सब में धाक बड़ी कुछ भारी है, 
कहै गुमानी धन्य फिरङ्गी तेरी किस्मत् न्यारी है ॥
— गुमानी ग्रंथावली, पृष्ठ १६७
अन्य कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं इनमें से अधिकांश डॉ श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित हिंदी शब्दसागर से प्राप्त हुए हैं।
करम उनका मदद जब तें न होवे । 
वली हरगिज विलायत कूँ न पावे । 
— दक्खिनी, पृष्ठ ११४ ।
"माँ और भाई मालिक से इनसाफ चाहने के लिये विलायत पहुँचे ।"
—भारतेंदु ग्रंथावली, भाग १, पृष्ठ ३४९ ।
जिसके नीचे की खुड्ढी घास में बैठकर एक दिन दो आने की विलायती मलाई की बर्फ खाई थी ।
—इत्यलम्, पृष्ठ १७१ ।
वे विलायती वस्तुओं को बेचने के बिचवई हैं ।
—प्रेमघन ग्रंथावली, भाग २, पृष्ठ २६६ ।
अब विदेशी राजा के होने से नौकरियाँ विलायतियों को विशेषकर दी जाती हैं ।
 —प्रेमघन ग्रंथावली, भाग २, पृष्ठ २६८ ।

Saturday, 12 April 2025

बहुवचन में संबोधन और '-ओं'

हिंदी का एक मसला— जो था नहीं, बना दिया गया है 
मित्रो!
डॉ वीरेन्द्र शुक्ल ने एक जिज्ञासा व्यक्त की उसका समाधान सार्वजनिक रूप में रख रहा हूँ कि अधिकाधिक लोग लाभान्वित हो सकें।

जिज्ञासा : संबोधन में अनुनासिक/अनुस्वार समाप्त होने के पीछे क्या तर्क है ?

समाधान : संबोधन में अनुनासिक/अनुस्वार होता ही नहीं। जो है नहीं, उसको समाप्त क्या करना! तब आगे-पीछे तर्क ढूँढ़ना भी व्यर्थ है।
फिर भी आपकी शंका निराधार नहीं है। लोगों ने जो नहीं है, उसको अपनाना शुरू कर दिया है क्योंकि हमारे परम आदरणीय भाषा में भी दखल रखते हैं और वे जो कहते हैं वह ब्रह्म वाक्य होता है। वे अपने सार्वजनिक भाषणों में सर्वत्र और सर्वदा कुछ इस प्रकार संबोधन किया करते हैं: भाइयों! बहनों! साथियों! मेरे प्यारे देशवासियों! वे चूँकि हजारों जनसभाओं के माध्यम से देश के करोड़ों नागरिकों तक पहुँचने वाले सबसे लोकप्रिय नेता हैं, मीडिया भी उनके भाषणों को बार-बार सुनाता और दिखाता है, इसलिए उनकी यह चूक जैसे शास्त्रीय प्रमाण बन गई है और संक्रामक रोग की तरह फैलती ही जा रही है। पढ़े- लिखे, लेखक-पत्रकार (फेसबुक के लेखक ही नहीं, कुछ अच्छे लेखक) भी अब इसे सही मानकर चलने लगे हैं। समस्या तब आती है जब हिंदी शिक्षक भी इसे ही सही मानने लगें। पाठ्यक्रम में निर्धारित व्याकरण की पुस्तकें चाहे सही नियम बता कर कहती हों कि संबोधन बहुवचन में अनुस्वार नहीं लगता, सही उदाहरण देती हों कि भाइयो!, बहनो!, साथियो!, बच्चो! आदि शुद्ध है, किंतु शिक्षक फिर स्वयं यही अशुद्ध प्रयोग करते है। यह अशुद्धीकरण हिंदी जानकारों के लिए चिंतनीय है। 
अब उनके समर्थकों का तर्क भी देख लीजिए। कहते हैं सभी कारकों में तिर्यक रूप बनाने के लिए ओं जोड़ा जाता है तो संबोधन बहुवचन में क्यों नहीं? इसका उत्तर दो तरह से 
१) अनपढ़ों-अधपढ़ों के लिए तो इतना ही समझना काफी है कि भाषा इसे नहीं स्वीकारती। हिंदी के लगभग 300 साल के इतिहास में पिछले तीसेक सालों की दो-एक सतही रचनाओं को हटा दें तो आपको कहीं संबोधन बहुवचन में अनुनासिकता नहीं मिलेगी।
२) व्याकरण में थोड़ी रुचि रखने वालों को याद करना होगा कि कारक क्रिया के साथ संबंध दिखाता है। शब्द से जुड़ने वाले -ने,-को, -से, -के द्वारा, -के लिए, -में , -पर इसी कारक संबंध को दिखाते हैं। संबोधन के लिए परंपरा से स्कूलों में रटाए जाने वाले हे!, ओ!, अरे! स्वतंत्र शब्द हैं, कारक चिह्न नहीं हैं। संबोधन इनके बिना भी हो सकता है और प्रायः इनके बिना ही होता है। वस्तुत: संबोधन तो कारक है ही नहीं, क्योंकि यह क्रिया से संबंध नहीं दिखाता। 
चलिए, यदि आप व्याकरण के पचड़े में भी नहीं पड़ना चाहते तो एक सीधा-सा लिटमस परीक्षण है। तिर्यक रूपों में बहुवचन बनाने के लिए जहाँ-जहाँ भी -ओं जुड़ता है, उसके आगे एक कारक चिह्न अवश्य जुड़ता है। यों समझ लें कि "ओं" को जब बहुवचन बनाने के लिए मूल एकवचन से जोड़ते हैं तो उसे तुरंत एक साथी की भी आवश्यकता होती है, जैसे : बहनों ने, भाइयों को, बहुओं के लिए, देवताओं से ...। पर संबोधन में यह संभव नहीं होता, हो ही नहीं सकता। सीधा बहुवचन बनेगा -- भाइयो!, बहनो!, बहुओ!, देवताओ!, गुरुजनो!, सभासदो! आदि।

Monday, 31 March 2025

नीम और नीम हकीम


नीम हकीम ख़तरा-ए-जान
आँगन के नीम में ताँबई कल्ले फूटने लगे हैं। बस सप्ताह भर में हरा-भरा छतनार हो जाएगा। उसके बाद छोटी-छोटी मंजरियाँ और निमोलियाँ। नीम भारत में सर्वत्र पाया जाता है और अनेक प्रकार से लाभदायक पेड़ माना जाता है। कहते हैं कि इसका प्रत्येक अंग उपयोगी और चिकित्सकीय गुणों से भरपूर होता है। इसलिए आयुर्वेदिक और देसी इलाज में नीम का बहुत महत्त्व है।


लोक में एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है- 'नीम हकीम ख़तरा-ए-जान'। सामान्यतः नीम से होने वाले देसी इलाज को लेकर इस कहावत का अर्थ जो लगाया जाता है, वह सही नहीं है। ग़लत अर्थ आमतौर पर वे लोग बताते हैं जो कहावत के संदर्भ में नीम के वास्तविक अर्थ नहीं जानते। वे कहते पाए जाते हैं— जो हकीम हर रोग के लिए नीम नामक वनस्पति की दवा बताता है उससे जान ख़तरे में आ सकती है। एक सीमा तक उनकी बात सही भी है कि नीम का काढ़ा पीने, नीम की पत्तियाँ चबाने, नीम की चटनी चाटने, जड़ों को उबालकर पीने, छिलके को घिसकर लगाने, नीम के फल-फूल या कोंपलों का सेवन करने आदि से हर रोग का इलाज नहीं हो सकता। स्पष्ट है कि कहावत की व्याख्या नीम के सही अर्थ पर नहीं टिकी है।
दरअसल कहावत का नीम देसी नीम नहीं , फ़ारसी नीम है। फ़ारसी में नीम का अर्थ है थोड़ा, कम, अपर्याप्त, अधूरा। जैसे: नीम गर्म- कम गर्म, नीम होश-  आधा बेहोश, नीम मुर्दा - अधमरा, नीम उम्र- अधेड़, नीम दिली- आधे मन से। इसलिए नीम हकीम का अर्थ होगा, अनाड़ी और कम पढ़ा लिखा हकीम, कठवैद्य, अज्ञानी चिकित्सक, अधूरा हकीम, अनपढ़ वैद्य, half-baked medicaster, जिसे आजकल चलताऊ भाषा में 'झोला छाप डॉक्टर' या quack भी कहा जाता है।
आगे समझाने की आवश्यकता नहीं है कि ऐसे चिकित्सक से चिकित्सा कराना अपनी जान को संकट में डालना क्यों है।
अब यह बात और है कि दुर्भाग्य से अकुशल हाकिम-हुक्काम, अनपढ़ नेता-मंत्री देश को चला रहे हैं। चारों ओर नीम हकीम बिखरे हैं, इसलिए जान तो ख़तरे में रहनी ही है।
तो कहावत सही बनी है- नीम हकीम ख़तरा-ए-जान।

Sunday, 30 March 2025

उल्लू का पट्ठा और गधे का बच्चा

🦉का पट्ठा 
(Photo courtesy: Wikicommons 
Perched Owl.svg)
पुष्ट से व्युत्पन्न पट्ठा/पाठा/पठिया पशुओं के छोटे, हृष्ट-पुष्ट बच्चे को कहा जाता है। 'साठे पर पाठा' कहावत में यही पाठा (हृष्ट-पुष्ट, नौजवान) है। अखाड़े वाले पहलवान के चेले को भी हृष्ट-पुष्ट और कसरती जवान होने के कारण पाठा, पट्ठा कहते हैं। उल्लू का लाक्षणिक अर्थ मूर्ख भी है, इसलिए 'उल्लू का पट्ठा' अर्थात् मूर्ख की संतान (महामूर्ख)।

लोक में गधा भी मूर्खता का प्रतीक है किंतु गधे के वंशधर को गधे का पट्ठा नहीं, गधे का बच्चा या पंजाबी में 'खोत्ते दा पुत्तर' कहा जाता है। यही अंग्रेजी में son-of-an-ass है। 

उल्लू का पट्ठा हो या गधे का बच्चा या 'सन ऑफ एन ऐस' ये सभी अभिव्यक्तियाँ अपशब्दों में गिनी जाती हैं। 
(चित्र साभार: https://urbandictionary.store/)

#भाषाशास्त्र #व्युत्पत्तिविज्ञान #शब्दविवेक #पट्ठा 
#उल्लूकापट्ठा #son_of_an_ass.

नीम का स्वाद

नीम: कटु या तिक्त
नव संवत्सर प्रतिपदा को, और कहीं-कहीं बैसाखी संक्रांति को, नीम की कलियाँ खाने का रिवाज है। कन्हैया को भी नीम- मिसरी का भोग लगाया जाता है। संभवतः इसलिए की जीवन में मीठे के साथ कड़वा भी आवश्यक है, जैसे सुखों के साथ दुख।
भोजन के रस छह प्रकार के गिनाए गए हैं —
मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (चरपरा), तिक्त (तीता), कषाय (कसैला)।
संस्कृत में मिर्च (मरीच) के स्वाद को "कटु" (कड़वा) कहा गया है , आयुर्वेद के अनुसार त्रिकटु में आते हैं - मरीच, पिप्पली, शुण्ठी (सौंठ)। नीम को "तिक्त" (तीता) कहा गया है। हिंदी में आते-आते नीम और करेले का स्वाद भी कड़वा हो गया। मिर्च कहीं तीती बताई जाती है, कहीं करू, कहीं तीखी। तीखा/तीखी किसी स्वाद के विशेषण तो हो सकते हैं, स्वाद-नाम नहीं। झाल, जाल, झौलि, झौलैन भी मिर्च के स्वाद हैं जिनका मूल संस्कृत के √ज्वल् 🔥 (जलना) से है। अंग्रेजी इन झंझटों से मुक्त है। वहाँ मिर्च हॉट है जो हमारे ज्वल के ही निकट है।
मध्ययुगीन कविता में तिक्त भी कटु माना जाने लगा था। कटु > कड़वा > करुआ।
"सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यों करुई ककरी"--सूरदास
"खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय. 
रहिमन करुए मुखन को, चहियत यही सजाय।।" -रहीम
तो मिर्च को तिक्त और नीम या करेले को कटु स्वाद का उदाहरण मान लिया जाय। "कड़वा तेल" में फिर मामला उलझता है क्योंकि उसका स्वाद नीम के नहीं, मिर्च के निकट है।
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Thursday, 27 March 2025

लिंग निर्धारण में उलझी हनुमान चालीसा



आज जब लखनऊ से पत्रकार मित्र नवलकांत सिन्हा ने मुझे पूछा कि हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है या पढ़ा जाता है, तो क्षण भर के लिए मैं भी अचकचा गया था। प्रश्न जितना सपाट लग रहा है, उतना सपाट है नहीं। वाक्य रचना कर्मवाच्य की है और कर्मवाच्य में क्रिया कर्म के अनुसार होती है। चालीसा, चालिसा (40 दिन का कोई अनुष्ठान, 40 का कोई संग्रह) पुल्लिंग है और इस दृष्टि से क्रिया भी पुल्लिंग होनी चाहिए। अर्थात हनुमान चालीसा पढ़ा जाता है।
प्रश्न को मैंने बिना किसी लागलपेट के सोशल मीडिया के दो मंचों पर अपने मित्रों से पूछ लिया और उनके संवाद देखने लगा। चर्चा अच्छी रही और सजग पाठकों ने सक्रिय रुचि भी दिखाई। समस्या क्योंकि क्रिया के लिंग निर्धारण या उसके प्रयोग से जुड़ी है, इसलिए यह समझना आवश्यक है की पूर्वांचल, बिहार, ओडिसा, पश्चिमी बंगाल आदि क्षेत्रों की हिंदी में लिंग कोई बहुत बड़ा मसला नहीं है और उसमें स्त्रीलिंग का भेद प्रायः नहीं किया जाता।

जैसा कि मैंने अनेक बार संकेत किया है कि कोई भी जीवंत भाषा, यदि आवश्यक हुआ तो, व्याकरण के कूल-कगारों को तोड़ती हुई भी आगे बढ़ती है। और व्याकरण के कूल-कगारों को तोड़ने का यह काम किसी अख़बार के कार्यालय में बैठकर (जैसे एक राष्ट्रीय समाचार पत्र द्वारा नए स्त्रीलिंग— बल्लेबाज़नी, वैज्ञानिका— बनाने का उपक्रम) या किसी लेखक की सनक से नहीं होता। उसे लोक निर्धारित करता है। भाषा का संबंध लेखन से कम, उसके मौखिक स्वरूप से अधिक होता है । इसे यों कहा जाए कि मूलत: तो भाषा मौखिक होती है। भाषा बोलने-बरतने के लिए पहले से व्याकरण जानना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि किसी भी भाषा का व्याकरण उसके वक्ता प्रयोक्ता के मन में पहले से अनुस्यूत होता है। उसी के अनुसार वह वाक्य रचना करता है और अपने आप को संप्रेषित करता है। यदि आवश्यक हुआ तो उसके पीछे के निहित व्याकरण नियमों को वह बाद में समझता है अर्थात भाषा पहले, व्याकरण बाद में।

अब आते हैं मूल समस्या पर कि हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है या पढ़ा जाता है? 
जैसा कि उत्तरों से भी स्पष्ट है अधिक संख्या में लोगों का मानना है कि हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है। निहित व्याकरण के अनुसार ये तर्क दिए जा सकते हैं । इनमें से कुछ तर्क मुझे अपने अनुसारकों, मित्रों, पाठकों से प्राप्त हुए हैं। उनका धन्यवाद।
आइए देखें -
यह सामान्यीकरण कि आकारांत संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। (जो इस संदर्भ में सत्य नहीं है क्योंकि चालीसा पुल्लिंग है)
जिसे पढ़ा जा रहा है वह आकार में बहुत छोटी पुस्तक, पुस्तिका/पोथी है, इसलिए स्त्रीलिंग ।
हनुमान चालीसा कोई सत्संग प्रवचन नहीं, स्तुति है और स्तुति स्त्रीलिंग है।
वेद-पुराण पढ़े जाते हैं; गीता या हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है। 
रामायण और महाभारत में महाभारत पढ़ा जाता है किंतु रामायण पढ़ी जाती है। इसलिए कि रामायण भक्ति भाव प्रधान कथा (स्त्रीलिंग) है तथा महाभारत वीरता और पौरुष का महाकाव्य (पुलिंग)।

कुछ और रोचक तर्क मिले, उन्हें आप स्वयं देख सकते हैं।

Saturday, 8 February 2025

जग बौराइ राजपद पाए

जग बौराइ राजपद पाए
वात (= वायु) से संस्कृत में एक शब्द है वातुल जिसका अर्थ है मानसिक वायु विकार से ग्रस्त। प्राकृत में यह वाउल हो गया है। व का ब हो जाने से बाउल; बाउल से बावला, बौला। 
बावला अर्थात उन्मत्त, पागल, वायुप्रकोप के कारण जिसकी बुद्धि ठिकाने न हो। विवेक या बुद्धि से रहित । (mad, crazy, insane)। हिंदी की कुछ बोलियों में इसे बावळा भी कहा जाता है। ल का र हो जाने से बावला का वैकल्पिक रूप बना बावरा, बौरा। आकारांत विशेषण होने के कारण बावला, बौरा का स्त्रीलिंग बना बावली, बावळी, बावरी, बौरी। हरियाणा में एक बहु प्रचलित विशेषण है "बावळी बूझ/ बावळी पूँछ। पागल या पगली कहना किसी के लिए कुछ अपमानजनक हो सकता है, किंतु बावली, बावरी में अपमान कम स्नेह या झिड़कने का भाव अधिक है। ब्रज, बुंदेली में महिलाएँ प्यार से कहती सुनी जाती हैं "बावरी है रई है" (पगला गई है क्या) ? बिहारी का यह प्रसिद्ध दोहा याद आ रहा है जिसमें एक बिरह बावरी को सारा गाँव बौरा दिखाई पड़ता है -
हौं ही बौरी बिरह-बस कै बौरौ सब गाँउ।
कहा जानि ये कहत हैं, ससिहिं सीतकर नाँव॥
बौरा का क्रिया रूप बौराना, अर्थात् पगला जाना।
भरतहि दोष देइ को जाए । 
जग बौराइ राजपद पाए॥
—तुलसी 
(भरत अपनी सेना और दलबल के साथ राम की ओर बढ़ते आ रहे हैं तो उन्हें क्या दोष दें। अब राजा हो गए हैं राजा का पद मिलने पर तो संसार ही पगला जाता है)।

Monday, 3 February 2025

ओर - और की बात

ओर, तरफ़
'ओर' देखना, जाना जैसी क्रियाओं के साथ दिशा सूचित करने वाला परसर्ग है। इसका अर्थ है किसी दिशा में, तरफ़ । इसके साथ सदा 'की' आता है।
घर की ओर चलो।
पूर्व की ओर लालिमा फैल गई।
किंतु यदि ओर से पहले 'दोनों', 'चारों' आदि संख्या सूचक विशेषण हों तो ओर का प्रयोग पुल्लिंग की भाँति होगा, अर्थात इसके पहले 'की' के स्थान पर 'के' आएगा।
घर के चारों ओर फूल लगे थे।
नदी के दोनों ओर खेत हैं।
और
'और' व्याकरण के अनुसार समुच्चयबोधक/योजक है। अन्य अनेक अर्थ छबियों में भी देखा जा सकता है ; जैसे :
~अभी और लोग आएँगे। (विशेषण)
~कुछ और दीजिए। (क्रियाविशेषण)
~काम भी करो और ताने भी सुनो। (परिणाम)
~मैं और चुपचाप सुनता रहूँ! (विपरीतता या विलक्षणता)
~एक मैं, और एक तुम! (विपरीतता, विरोध)
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Wednesday, 15 January 2025

गुड़ को प्रणाम

॥ नमो गुडाय ॥

(फोटो सौजन्य: wiki commons)


गुड द्रविड़ परिवार का शब्द माना जाता है। पालि में इसे गुळ कहा गया है, प्राकृत और संस्कृत में गुड। हिंदी में गुड़, बोलियों में गुर, गुल, गुली, गुलो भी। कुमाउँनी में रोचक स्थिति यह है कि पदार्थ का नाम तो प्राकृत गुड से है किंतु उसका स्वाद पालि गुळ से- गुळियो, गुलिय् (मीठा)। गन्ने के अतिरिक्त ताड़, महुआ और खजूर से भी गुळ/गुड़ बनाया जाता है।
आयुर्वेद में गुड़ की बड़ी महिमा गाई गई है। विशेषकर पुराने गुड़ को रसायन कहा गया है।
स पुराणोऽधिकगुणो गुडः पथ्यतमः स्मृतः॥
भाव प्रकाश के अनुसार
श्लेष्माणमाशु विनिहन्ति सदार्द्रकेण
पित्तं निहन्ति च तदेव हरीतकीभिः ।
शुण्ठ्या समं हरति वातमशेषमित्थं
दोषत्रयक्षयकराय नमो गुडाय ॥
[गुड़ को अदरक के साथ लें तो कफ दोष, हरड़ के साथ पित्त और सौंठ के साथ लेने पर वात विकार समूल नष्ट हो जाते हैं। इसलिए कफ-पित्त-वात तीनों दोषों को नष्ट करने वाले गुड़ को प्रणाम।]

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Thursday, 9 January 2025

किसी की नज़र न लगे...!

किसी की नज़र न लगे...
ब्रिटिश अंग्रेजी में 'टच वुड' या अमेरिकी अंग्रेजी में 'नॉक ऑन वुड' यह बताने के लिए प्रचलित है कि आप जो कुछ कर रहे हैं उसमें आपको सफलता की, अच्छे भाग्य की उम्मीद रहे। आप 'टचवुड' कहते हैं और सुनने वाला भी आपसे सहमत होता हुआ कभी-कभी टचवुड कहता है। एक ईसाई विश्वास है कि सूखी लकड़ी में दुष्ट आत्माओं का निवास होता है और यदि हम कुछ सौभाग्य की बात कहते हैं तो दुष्ट आत्माएँ सुन लेती हैं और उसमें बाधा उत्पन्न करती हैं। इसलिए लकड़ी को छूकर उन्हें शांत किया जाता है जिससे दुर्भाग्य न आए। अनेक यूरोपीय और अमेरिकी देशों में इसका बहुत चलन है। अपने देश में भी आजकल नई पीढ़ी में इस मुहावरे का बहुत चलन है। यह ऐसा ही है जैसे हिंदी/उर्दू में 'नज़र न लगे' कहा जाता है। 
नज़र लगने से बचाव के लिए तुर्की भाषा से एक शब्द चला 'नज़र बोन्चु' (nazar boncuğu)। अपने यहाँ नज़रबट्टू (बजरबट्टू ) शब्द का मूल शायद यही हो। नज़र से बचने के तलिस्मा/ताबीज़ (evil eye amulet) का चलन भी तुर्किये से बताया जाता है जो अब दुनिया भर में बिकते हैं! तुर्किये के गोरेन राष्ट्रीय उद्यान में तो नज़र बोन्चु के पेड़ पर काँच की नीली आँख-जैसे सैकड़ों ताबीज़ लटकाए हुए होते हैं जिन्हें खरीदने दूर-दूर से लोग जाते हैं। 
(चित्र सौजन्य: Wikicommons)
आजकल मोबाइली भाषा में बुरी नज़र रोकने के लिए एक इमोजी भी है 👁️. 

नज़र न लगने देने के लिए टोटकों का यह विश्वास दुनिया के अनेक समुदायों में भिन्न-भिन्न रूपों में पाया जाता है। भारत में भी बीसियों प्रकार के टोटके हैं। राई-नमक चटकाना, फिटकरी फुलाना, लाल मिर्च जलाना, धूनी देना, काजल लगाना, काला/लाल धागा बाँधना, सिर पर मोरपंख , झाड़ू या चप्पल फिराना, नींबू लटकाना, क्रॉस पहनना, किसी मंत्र, आयत या स्तोत्र का पाठ करना, नज़र बट्टू का मुखौटा टाँगना इत्यादि सैकड़ों उपाय बताए और किए जाते हैं। नजर उतारने के उपाय खोजने वालों की भीड़ ओझाओं, तांत्रिकों, ज्योतिषियों, मौलवियों, पादरियों के यहाँ देखी जा सकती है।

भूटान में नज़र न लगने देने का एक लोकप्रिय उपाय है घरों के मुख्य द्वार पर शिश्न की आकृति की खूँटी गाढ़ दी जाती है। वास्तु दोष निवारण, फेंगशुई उपाय आदि का संबंध भी बुरी नज़र बचाने से बताया जाता है। अपने देश में ट्रकों के पीछे स्पष्ट चेतावनी लिखी होती है, "बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला!"
आपके क्षेत्र में बुरी नज़र से बचने के लिए क्या किया जाता है?
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