Sunday, 29 November 2020

शाल-दुशाला

 



ब्याह बरातों में दूल्हे की खास पहचान हुआ करती थी दुशाला। विवाह संबंधी अनेक लोकगीतों में दूल्हे और उसके पिता की पहचान "दुशाला ओढ़े" के रूप में बताई गई है। उधर दुल्हन का भी शृंगार शॉल के बिना अधूरा रहता है।


इस दुशाला शब्द की यात्रा बड़ी रोचक है। आज हिंदी और बहुत सी प्रांतीय भाषाओं में यह शॉल, साल, हाल बनकर रह गया है जिसे अंग्रेजी से आगत माना जाता है और अपने देसी सांस्कृतिक प्रतीक दुशाला की ओर लोग ध्यान नहीं देते। अब दूल्हे राजा को बहुमूल्य सूट के बाहर भी कुछ देर के लिए ही सही, शॉल अवश्य ओढ़ाया जाता है। दुशाला को लोग भूलने लगे हैं। 


दुशाला के लिए संस्कृत में शब्द है द्विशाटक अर्थात शाटक का जोड़ा। शाटक अर्थात् पशमीना, शाटक से द्विशाटक, द्विशाटक से द्विशाट, दुशाला। शाटक ही फारसी में यह बन गया शाल और फारसी से फिर अपने देश में आकर उर्दू - हिंदी में चल पड़ा शाल। कहते हैं अकबर दो शालों को जोड़कर पहनता था जिससे उनका उल्टा भाग दिखाई न दे। उसे दुशाला कहा गया।


उधर यह लोकप्रिय वस्त्र पश्चिम की ओर यात्रा पर निकला तो अधिकांश देशों में शॉल, चॉल, सॉल, साल, शाल बनकर जा बिराजा। हिंदी-अंग्रेजी में ही नहीं फारसी, स्पेनी, पुर्तगाली, इटालियन, जर्मन, डच, स्वीडिश, आईसलैंडिक, रशियन, डैनिश आदि अनेक भाषाओं में शॉल सुशोभित है। 



भारतीय ही नहीं अन्यत्र भी महिलाओं के साज - सिंगार के साथ शॉल अपरिहार्य है। इसके असंख्य डिजाइन आपको मिल जाएंगे। संपन्न महिलाओं के वॉर्डरोब में बीसियों शॉल शोभा बढ़ाते हैं। सामान्य महिलाएँ भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ जुटा ही लेती हैं।


अपने देश में इसे देसी नाम न मानकर अंग्रेजी नाम मानते हैं। कारण स्पष्ट है। अपने देश में लोग इसी भ्रम में जी रहे हैं कि अंग्रेजी संभ्रांत लोगों की भाषा है। सो, शॉल भी संभ्रांतता का प्रतीक हो गया है। बेचारा गरीब तो दुसूती या खेस से ही काम चला लेता है। 


किसी ने कहा भी तो है - नाम में क्या रखा है? ओढ़िये। सर्दी से बचाव होगा, शोभा बढ़ेगी और रुतबा भी।

Friday, 13 November 2020

लक्ष्मी शब्द की फ़्रांस यात्रा से वापसी: "लैक्मे" के रूप में

दीपावली की शुभकामनाएं 🙏

 #लक्ष्मीपूजन के इस पर्व पर यह जानना रोचक होगा कि सौंदर्य प्रसाधनों के पुराने और लोकप्रिय नाम "Lakme" का संबंध सीधे लक्ष्मी जी से जुड़ता है।
आर्थिक अनुशासन के उस दौर में भारत का अपना खज़ाना क्षीण था और विदेशी मुद्रा का भंडार नगण्य। तब 1950 में किए गए एक आर्थिक सर्वेक्षण में यह पाया गया कि मध्यवर्ग और संभ्रांत वर्ग की भारतीय महिलाएं अपने सौंदर्य प्रसाधनों के लिए आयातित वस्तुओं पर निर्भर करती हैं और इसमें विदेशी मुद्रा भंडार का एक बड़ा हिस्सा व्यय होता है।
यहाँ पर कहानी में जवाहरलाल नेहरू आ टपकते हैं। कहा जाता है कि विदेशी सौंदर्य प्रसाधन सामग्री की बढ़ती कीमतों की शिकायत लेकर महिलाओं का एक शिष्टमंडल नेहरू से मिला और उन्हें सस्ते में उपलब्ध कराने का आग्रह किया। यह नेहरू को स्वीकार नहीं हो सकता था। वे स्वयं लग्जरी के समर्थक नहीं थे और चाहते थे कि वे भारतीय उत्पाद खरीदें किंतु तत्कालीन भारतीय उत्पादों में गुणवत्ता और ब्रांड नेम की व्यापक लोकप्रियता का न होना बाधक था।
नेहरू ने उभरते भारतीय उद्योगपति जेआरडी टाटा से बात की और भारतीय विकल्प खोजने का आग्रह किया और टाटा ने इस चुनौती को स्वीकार भी कर लिया। उद्यमिता कौशल से संपन्न टाटा के लिए केमिकल इंजीनियर प्राप्त करना या मार्केट सर्वे कराना कठिन नहीं था किंतु ऐसा ब्रांड नाम तलाशना चुनौती था जो संभ्रांत और मध्यम वर्ग की भारतीय महिलाओं को लुभा सके। उन्हीं दिनों फ्रांस में एक लोकप्रिय ओपेरा था Lakmé । ज्ञात हुआ कि यह नाम संस्कृत भाषा के शब्द लक्ष्मी से व्युत्पन्न होता है जो भारत में धन और सौंदर्य की देवी मानी जाती हैं। 
लैक्मे ऑपेरा हाउस का एक टिकट
(चित्र गूगल से प्राप्त)

इस नामकरण पर विचार मंथन हुआ। लक्ष्मी की आवश्यकता भारत को थी ही। इससे लक्ष्मी स्वरूप विदेशी मुद्रा की बचत हो रही थी और भारतीयों में भी सम्मान्य और पूज्य थी किंतु "लक्ष्मी लिपस्टिक" या "लक्ष्मी आइ लाइनर" के नाम में देसीपन होने के कारण विदेशी मोह वाली इन महिलाओं का नाक-मुँह सिकुड़ना तय था, इसलिए फ्रांसीसी नाम Lakmé लैक्मे पर सहमति हो गई।
1952 में जे आर डी टाटा ने टाटा ऑयल मिल्स के अंतर्गत इसका कारोबार प्रारंभ किया। तुरंत ही यह बाजार का अनूठा ब्रांड बन गया और आज भी कायम है। भारतीय रिजर्व बैंक की करोड़ों की विदेशी मुद्रा की बचत हुई और औद्योगिक लाभ अलग से।

Monday, 3 August 2020

आइए, चाय पिएँ




आइए, चाय पिएँ 
धैर्यपूर्वक, फुरसत में 
सम्मान देते हुए इसे 
कुछ ऐसे कि जैसे यही वह धुरी है 
जिसके सहारे घूमती है पूरी दुनिया 
धीरे -धीरे, स्थिर गति से 
अतीत बीत गया
अनागत जाने कब आए
उसे लपकने की त्वरा क्यों
बस, यही पल सचमुच है जीवन 
आइए इस पल को जिएँ,
आइए, चाय पिएँ।