Thursday, 21 February 2013

ये परिंदे ...




  • ये परिंदे
    बड़ी दूर से आए हैं
    जहाँ टहनी-टहनी
    बंटी नहीं थी फूल-फूल में
    ताल-तलैया में
    नामों की तख्तियां
    लटकी नहीं थीं कोई
    दानों-तिनकों की तलाश इन्हें
    यहाँ खींच लाई है
    भटका कर |

       ***  
    ये परिंदे थके-हारे हैं
    पंख पसार
    छाँह ढूँढ रहे हैं बेचारे
    धूप से झुलसे
    वर्षा से भीगे
    आँधी से उखड़े
    चुप-चुप हैं
    भोंचक हैं
    टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं
    बदरंग आसमान को
    भीड़ भरे सूने जंगल को |

       *...

एक नया नाम


खिड़की पर झुक आई 
अर्थ भरी शाम
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !

   ***   

बदली फिर झूमी
फिर खनके कंगन 
प्यार की फुहार 
फिर बरसी एक बार 
भीग गया घर आँगन 
डूबा मन-वृन्दावन __
अनछुए रह न सके
अधरों के जाम 
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !


   ***   

केतकी के जुही के 
अटपटे-अनबोले 
प्रश्न भरी चितवन 
झेल नहीं पाई 
अलसाए भोर की
खिसियाई एक किरन  
ऋतुओं की चौखट में
कलियाँ बदनाम 
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !!


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