- ये परिंदे
बड़ी दूर से आए हैं
जहाँ टहनी-टहनी
बंटी नहीं थी फूल-फूल में
ताल-तलैया में
नामों की तख्तियां
लटकी नहीं थीं कोई
दानों-तिनकों की तलाश इन्हें
यहाँ खींच लाई है
भटका कर |
***
ये परिंदे थके-हारे हैं
पंख पसार
छाँह ढूँढ रहे हैं बेचारे
धूप से झुलसे
वर्षा से भीगे
आँधी से उखड़े
चुप-चुप हैं
भोंचक हैं
टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं
बदरंग आसमान को
भीड़ भरे सूने जंगल को |
*...
Thursday, 21 February 2013
ये परिंदे ...
एक नया नाम
खिड़की पर झुक आई
अर्थ भरी शाम
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !
***
बदली फिर झूमी
फिर खनके कंगन
प्यार की फुहार
फिर बरसी एक बार
भीग गया घर आँगन
डूबा मन-वृन्दावन __
अनछुए रह न सके
अधरों के जाम
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !
***
केतकी के जुही के
अटपटे-अनबोले
प्रश्न भरी चितवन
झेल नहीं पाई
अलसाए भोर की
खिसियाई एक किरन
ऋतुओं की चौखट में
कलियाँ बदनाम
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !!
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