Monday, 31 March 2025

नीम और नीम हकीम


नीम हकीम ख़तरा-ए-जान
आँगन के नीम में ताँबई कल्ले फूटने लगे हैं। बस सप्ताह भर में हरा-भरा छतनार हो जाएगा। उसके बाद छोटी-छोटी मंजरियाँ और निमोलियाँ। नीम भारत में सर्वत्र पाया जाता है और अनेक प्रकार से लाभदायक पेड़ माना जाता है। कहते हैं कि इसका प्रत्येक अंग उपयोगी और चिकित्सकीय गुणों से भरपूर होता है। इसलिए आयुर्वेदिक और देसी इलाज में नीम का बहुत महत्त्व है।


लोक में एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है- 'नीम हकीम ख़तरा-ए-जान'। सामान्यतः नीम से होने वाले देसी इलाज को लेकर इस कहावत का अर्थ जो लगाया जाता है, वह सही नहीं है। ग़लत अर्थ आमतौर पर वे लोग बताते हैं जो कहावत के संदर्भ में नीम के वास्तविक अर्थ नहीं जानते। वे कहते पाए जाते हैं— जो हकीम हर रोग के लिए नीम नामक वनस्पति की दवा बताता है उससे जान ख़तरे में आ सकती है। एक सीमा तक उनकी बात सही भी है कि नीम का काढ़ा पीने, नीम की पत्तियाँ चबाने, नीम की चटनी चाटने, जड़ों को उबालकर पीने, छिलके को घिसकर लगाने, नीम के फल-फूल या कोंपलों का सेवन करने आदि से हर रोग का इलाज नहीं हो सकता। स्पष्ट है कि कहावत की व्याख्या नीम के सही अर्थ पर नहीं टिकी है।
दरअसल कहावत का नीम देसी नीम नहीं , फ़ारसी नीम है। फ़ारसी में नीम का अर्थ है थोड़ा, कम, अपर्याप्त, अधूरा। जैसे: नीम गर्म- कम गर्म, नीम होश-  आधा बेहोश, नीम मुर्दा - अधमरा, नीम उम्र- अधेड़, नीम दिली- आधे मन से। इसलिए नीम हकीम का अर्थ होगा, अनाड़ी और कम पढ़ा लिखा हकीम, कठवैद्य, अज्ञानी चिकित्सक, अधूरा हकीम, अनपढ़ वैद्य, half-baked medicaster, जिसे आजकल चलताऊ भाषा में 'झोला छाप डॉक्टर' या quack भी कहा जाता है।
आगे समझाने की आवश्यकता नहीं है कि ऐसे चिकित्सक से चिकित्सा कराना अपनी जान को संकट में डालना क्यों है।
अब यह बात और है कि दुर्भाग्य से अकुशल हाकिम-हुक्काम, अनपढ़ नेता-मंत्री देश को चला रहे हैं। चारों ओर नीम हकीम बिखरे हैं, इसलिए जान तो ख़तरे में रहनी ही है।
तो कहावत सही बनी है- नीम हकीम ख़तरा-ए-जान।

Sunday, 30 March 2025

उल्लू का पट्ठा और गधे का बच्चा

🦉का पट्ठा 
(Photo courtesy: Wikicommons 
Perched Owl.svg)
पुष्ट से व्युत्पन्न पट्ठा/पाठा/पठिया पशुओं के छोटे, हृष्ट-पुष्ट बच्चे को कहा जाता है। 'साठे पर पाठा' कहावत में यही पाठा (हृष्ट-पुष्ट, नौजवान) है। अखाड़े वाले पहलवान के चेले को भी हृष्ट-पुष्ट और कसरती जवान होने के कारण पाठा, पट्ठा कहते हैं। उल्लू का लाक्षणिक अर्थ मूर्ख भी है, इसलिए 'उल्लू का पट्ठा' अर्थात् मूर्ख की संतान (महामूर्ख)।

लोक में गधा भी मूर्खता का प्रतीक है किंतु गधे के वंशधर को गधे का पट्ठा नहीं, गधे का बच्चा या पंजाबी में 'खोत्ते दा पुत्तर' कहा जाता है। यही अंग्रेजी में son-of-an-ass है। 

उल्लू का पट्ठा हो या गधे का बच्चा या 'सन ऑफ एन ऐस' ये सभी अभिव्यक्तियाँ अपशब्दों में गिनी जाती हैं। 
(चित्र साभार: https://urbandictionary.store/)

#भाषाशास्त्र #व्युत्पत्तिविज्ञान #शब्दविवेक #पट्ठा 
#उल्लूकापट्ठा #son_of_an_ass.

नीम का स्वाद

नीम: कटु या तिक्त
नव संवत्सर प्रतिपदा को, और कहीं-कहीं बैसाखी संक्रांति को, नीम की कलियाँ खाने का रिवाज है। कन्हैया को भी नीम- मिसरी का भोग लगाया जाता है। संभवतः इसलिए की जीवन में मीठे के साथ कड़वा भी आवश्यक है, जैसे सुखों के साथ दुख।
भोजन के रस छह प्रकार के गिनाए गए हैं —
मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (चरपरा), तिक्त (तीता), कषाय (कसैला)।
संस्कृत में मिर्च (मरीच) के स्वाद को "कटु" (कड़वा) कहा गया है , आयुर्वेद के अनुसार त्रिकटु में आते हैं - मरीच, पिप्पली, शुण्ठी (सौंठ)। नीम को "तिक्त" (तीता) कहा गया है। हिंदी में आते-आते नीम और करेले का स्वाद भी कड़वा हो गया। मिर्च कहीं तीती बताई जाती है, कहीं करू, कहीं तीखी। तीखा/तीखी किसी स्वाद के विशेषण तो हो सकते हैं, स्वाद-नाम नहीं। झाल, जाल, झौलि, झौलैन भी मिर्च के स्वाद हैं जिनका मूल संस्कृत के √ज्वल् 🔥 (जलना) से है। अंग्रेजी इन झंझटों से मुक्त है। वहाँ मिर्च हॉट है जो हमारे ज्वल के ही निकट है।
मध्ययुगीन कविता में तिक्त भी कटु माना जाने लगा था। कटु > कड़वा > करुआ।
"सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यों करुई ककरी"--सूरदास
"खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय. 
रहिमन करुए मुखन को, चहियत यही सजाय।।" -रहीम
तो मिर्च को तिक्त और नीम या करेले को कटु स्वाद का उदाहरण मान लिया जाय। "कड़वा तेल" में फिर मामला उलझता है क्योंकि उसका स्वाद नीम के नहीं, मिर्च के निकट है।
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Thursday, 27 March 2025

लिंग निर्धारण में उलझी हनुमान चालीसा



आज जब लखनऊ से पत्रकार मित्र नवलकांत सिन्हा ने मुझे पूछा कि हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है या पढ़ा जाता है, तो क्षण भर के लिए मैं भी अचकचा गया था। प्रश्न जितना सपाट लग रहा है, उतना सपाट है नहीं। वाक्य रचना कर्मवाच्य की है और कर्मवाच्य में क्रिया कर्म के अनुसार होती है। चालीसा, चालिसा (40 दिन का कोई अनुष्ठान, 40 का कोई संग्रह) पुल्लिंग है और इस दृष्टि से क्रिया भी पुल्लिंग होनी चाहिए। अर्थात हनुमान चालीसा पढ़ा जाता है।
प्रश्न को मैंने बिना किसी लागलपेट के सोशल मीडिया के दो मंचों पर अपने मित्रों से पूछ लिया और उनके संवाद देखने लगा। चर्चा अच्छी रही और सजग पाठकों ने सक्रिय रुचि भी दिखाई। समस्या क्योंकि क्रिया के लिंग निर्धारण या उसके प्रयोग से जुड़ी है, इसलिए यह समझना आवश्यक है की पूर्वांचल, बिहार, ओडिसा, पश्चिमी बंगाल आदि क्षेत्रों की हिंदी में लिंग कोई बहुत बड़ा मसला नहीं है और उसमें स्त्रीलिंग का भेद प्रायः नहीं किया जाता।

जैसा कि मैंने अनेक बार संकेत किया है कि कोई भी जीवंत भाषा, यदि आवश्यक हुआ तो, व्याकरण के कूल-कगारों को तोड़ती हुई भी आगे बढ़ती है। और व्याकरण के कूल-कगारों को तोड़ने का यह काम किसी अख़बार के कार्यालय में बैठकर (जैसे एक राष्ट्रीय समाचार पत्र द्वारा नए स्त्रीलिंग— बल्लेबाज़नी, वैज्ञानिका— बनाने का उपक्रम) या किसी लेखक की सनक से नहीं होता। उसे लोक निर्धारित करता है। भाषा का संबंध लेखन से कम, उसके मौखिक स्वरूप से अधिक होता है । इसे यों कहा जाए कि मूलत: तो भाषा मौखिक होती है। भाषा बोलने-बरतने के लिए पहले से व्याकरण जानना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि किसी भी भाषा का व्याकरण उसके वक्ता प्रयोक्ता के मन में पहले से अनुस्यूत होता है। उसी के अनुसार वह वाक्य रचना करता है और अपने आप को संप्रेषित करता है। यदि आवश्यक हुआ तो उसके पीछे के निहित व्याकरण नियमों को वह बाद में समझता है अर्थात भाषा पहले, व्याकरण बाद में।

अब आते हैं मूल समस्या पर कि हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है या पढ़ा जाता है? 
जैसा कि उत्तरों से भी स्पष्ट है अधिक संख्या में लोगों का मानना है कि हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है। निहित व्याकरण के अनुसार ये तर्क दिए जा सकते हैं । इनमें से कुछ तर्क मुझे अपने अनुसारकों, मित्रों, पाठकों से प्राप्त हुए हैं। उनका धन्यवाद।
आइए देखें -
यह सामान्यीकरण कि आकारांत संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। (जो इस संदर्भ में सत्य नहीं है क्योंकि चालीसा पुल्लिंग है)
जिसे पढ़ा जा रहा है वह आकार में बहुत छोटी पुस्तक, पुस्तिका/पोथी है, इसलिए स्त्रीलिंग ।
हनुमान चालीसा कोई सत्संग प्रवचन नहीं, स्तुति है और स्तुति स्त्रीलिंग है।
वेद-पुराण पढ़े जाते हैं; गीता या हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है। 
रामायण और महाभारत में महाभारत पढ़ा जाता है किंतु रामायण पढ़ी जाती है। इसलिए कि रामायण भक्ति भाव प्रधान कथा (स्त्रीलिंग) है तथा महाभारत वीरता और पौरुष का महाकाव्य (पुलिंग)।

कुछ और रोचक तर्क मिले, उन्हें आप स्वयं देख सकते हैं।