Sunday, 22 June 2025

द्रविड़ मूल का हुड़का

बाएँ कंधे का ताल वाद्य हुड़का

कुछ लोग डमरू और हुड़का को एक मानते हैं। डमरू और हुड़का एक ही वाद्य के नाम नहीं हैं। दोनों ताल वाद्य हैं लेकिन दोनों की बनावट और बजाने की विधि अलग है। डमरू शब्दकल्पद्रुम और वाचस्पत्यम् के अनुसार प्रतिध्वन्यात्मक शब्द है क्योंकि इसको बजाने पर डम्-डम् शब्द निकलता है– "डम् इति अव्यक्तशब्दं ऋच्छति"। बीच का भाग पतला होता है और दोनों ओर दो गोलियाँ लटकी होती हैं जिनसे इसे बजाया जाता है। आचार्य भरत ने इसे कापालिकों और योगियों का वाद्य कहा है। 
हुड़का के लिए संस्कृत शब्द है हुडुक्कः। यह भी प्रतिध्वन्यात्मक शब्द है। हुडुक् इति शब्देन कायति शब्दायते इति अर्थात जिसको बजाने से हुडुक्क-हुडुक्क की आवाज़ निकले, वह हुड़का।
स्पष्ट है कि दोनों वाद्यों के स्वर अलग-अलग हैं इसलिए नाम भी अलग-अलग। डम-डम करने वाला डमरू और और हुडुक्क-हुडुक्क करने वाला हुड़का। नैषध में उल्लेख है, "न ते हुडुक्केन न सोऽपि ढक्कया न मर्दलैः" (नैषध.15.17)
दोनों को बजाने की विधि भी अलग है। डमरू को बीच से पड़कर ऐसे हिलाया जाता है कि उससे बँधी हुई दो गोलियाँ उसके दोनों ओर मढ़े हुए चमड़े पर चोट करके आवाज़ करें। हुड़के को लंबे फीते से बाएँ कंधे से लटकाया जाता है और दाँईं हथेली से चोट करके बजाया जाता है।
हुड़का की व्युत्पत्ति भी हुड़के की ही तरह बाँए कंधे पर टिकी है! 1970 के दशक में इन पंक्तियों के लेखक का एक आलेख "भाषा" त्रैमासिक (केहिनि) में प्रकाशित हुआ था, "कुमाउँनी में द्रविड़ भाषाओं की तलछट", जिसमें संभावना व्यक्त की गई थी की हुड़ुक, हुड़का शब्द द्रविड़ मूल का हो सकता है। अब इस मान्यता को अधिक दृढ़ता से प्रस्तुत किया जा सकता है।
वस्तुत: हुड़का भारत का बहुत प्राचीन वाद्य है और आज भी दक्षिण में बहुत लोकप्रिय है। दक्षिण भारत के मंदिरों और संगीत सम्मेलनों (तालवाद्य कच्चेरी) में इसे विधिवत बजाया जाता है। केरल के सोपान संगीतम् में इसका बड़ा महत्व है। माना जाता है कि इसकी संरचना में चार वेद और 64 कलाएँ प्रतीकात्मक रूप से दर्शाई जाती हैं। उत्तराखंड में इस तालवाद्यका नाम हुड़ुक या हुड़को है। इसकी गूँज बड़ी विचित्र और आकर्षक होती है। हुड़कियाबौल, जागर आदि लोक आयोजनों में आवश्यक माना जाता है क्योंकि इसका स्वर उत्तेजक होता है। इसके पारंपरिक वादक अब लुप्त होते जा रहे हैं। मलयालम, कुमाईं, गढ़वाली, तमिल आदि में नाम-साम्य इसकी व्यापकता, प्राचीनता का प्रमाण हैं।
 हुड़का को तमिऴ में उडक्कै உடூக்கை कहां जाता है और मलयालम में इडक्का, इडक्कै। इन दोनों शब्दों में पहले भाग उडु और इड का अर्थ है बाँयाँ और कै अर्थात हाथ, बाँह। वाद्य यंत्र को बाएँ कंधे से लटकाकर बजाया जाता है, इसलिए यह नाम बिल्कुल सार्थक है और व्यंजक भी। 



Sunday, 8 June 2025

छुटभैया कौन

छुटभैया कौन
छुट भैया शब्द तो दो मासूम शब्दों का कर्मधारय समास है— छोटा (विशेषण ) भाई (संज्ञा)। प्यार से छोटा भाई छुटभैया हो गया। लेकिन व्यवहार में यह इतना छोटा, प्यारा और मासूम शब्द अब नहीं रहा। 
ऐसा व्यक्ति जिसकी गिनती बड़े आदमियों में न होकर छोटे या साधारण लोगों में होती है। कम हैसियत का, अनुभवहीन और छोटी उम्र का बदमाश, प्रशिक्षु गुंडा, जूनियर नेता इस श्रेणी में आते हैं। लूट खसोट, हफ़्ता वसूली, तोड़फोड़ और अनेक प्रकार की गुंडई में शामिल कम उम्र के अपराधी जो किसी न किसी बड़े नेता या नामी गुंडे की आड़ में काम करते हैं, उन्हें उस नामी-गिरामी 'बड़े' का छुटभैया कहा जाता है।
छुटभैया नेताओं की ज़िंदगी एकदम बॉलीवुड फिल्मों की तरह ही होती है—अनाम और संघर्ष से भरी। कुछ छोटी मोटी करतूतों के बाद अगर बड़े नेता की नज़र में आ गए तो विधायक बनने का सपना पाले रहते हैं और मौका मिलते ही पंचायतों , सभा- समितियों, संस्थाओं के कार्यकर्ता से प्रमुख तक के पद सँभाल लेते हैं और दाँव लगा तो विधायिका या संसदों तक पहुँच जाते हैं।
एक बड़ी विडंबना भी है इस नाम के साथ।छुटभैया नेता को कोई छुटभैया नेता नहीं कहता। ये स्वयं भी अपने को इस नाम से पहचाना जाना नहीं चाहते। न खुद को इस नाम से संबोधित करते हैं, न उनके आसपास रहने वाले लोग करते हैं। वे चाहते हैं उन्हें नेताजी कहा जाए। कुछ लोग उन्हें नेता कह भी देते हैं लेकिन असली नेता के सामने नहीं।