Friday, 25 June 2021
कल किसी का ...
Friday, 18 June 2021
लोल, बकलोल और लोलवा
Saturday, 12 June 2021
शिक्षा, अनुशासन और उपदेश
बात अधिक, अधिकांश और अधिकतर की
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चूँकि अधिकांश और अधिकतर दोनों ही अधिक से बने हैं, इसलिए पहले अधिक की ही चर्चा की जाए। अधिक परिमाण, मात्रा और संख्या बताने वाला विशेषण है। बहुत, ज़्यादा (much) के अर्थ में; जैसे आपको अधिक कष्ट नहीं होगा।
तुलना (more) के अर्थ में: मुझे आप से अधिक वेतन नहीं मिलता।
मात्रा (quantity): अधिक वर्षा से फसल नष्ट हो गई।
'अधिकांश' दो शब्दों (अधिक+अंश) से बना हुआ यौगिक शब्द है और 'अधिकतर' अधिक के साथ तुलनार्थक '-तर' प्रत्यय जुड़ने से बना है। 'अधिकांश' गणनीय इकाइयों के साथ प्रयुक्त नहीं होगा क्योंकि 'अंश' का अर्थ भाग है जिसे गणित से नहीं समझाया जा सकता। अर्थात् अंश की इकाइयों को एक-एक कर व्यक्त नहीं किया जाता; जैसे,
"अधिकांश विधायक असंतुष्ट बताए जाते हैं" कहना ठीक नहीं होगा। "अधिकतर विधायक" ठीक है क्योंकि विधायक गिने जा सकते हैं।
"अधिकांश रेलें समय पर चल रही हैं" कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि रेलें गिनी जा सकती हैं। इसलिए अधिकतर रेलें।
इसी प्रकार अधिकांश खेत, अधिकांश गेहूँ, अधिकांश बजट, अधिकांश कपड़ा, अधिकांश समय, अधिकांश संपत्ति, अधिकांश शक्ति, अधिकांश भीड़ कहना ठीक है।
खेतों, कपड़ों आदि की कभी गणना संकेतित हो तो अधिकतर भी संभव है। जैसे:
पहाड़ों में अधिकतर खेत सीढ़ीदार हैं, खेत का अधिकांश उपजाऊ है।
अधिकतर कपड़े सूख गए, इस कपड़े का अधिकांश गीला है।
"अधिकांश भाग" भी कहा, लिखा जा रहा है किंतु यह भी व्यर्थ की द्विरुक्ति है, जो अंश है वही भाग भी है।
'अधिकांश' प्राय: एकवचन रहता है किंतु 'अधिकतर' में चूँकि एकाधिक इकाइयाँ होती हैं, इसलिए वह बहुवचन; जैसे:
अधिकांश मैदान खाली पड़ा था, अधिकतर लोग जा चुके थे।
अधिकांश वन काटा जा चुका, अधिकतर पेड़ बिक गए।
अधिकांश फिल्म बेकार थी, अधिकतर संवाद उबाऊ थे।
Thursday, 10 June 2021
श्री, श्रीमती और सुश्री से अनंत श्री तक
"श्री" का मुख्य प्रचलित अर्थ है लक्ष्मी। यह प्रतिष्ठा, धन-दौलत, सम्मान आदि का वाचक भी है। है तो स्त्रीलिंग, किंतु पुरुषों ने इसे अपने नाम से पहले शोभा के रूप में धारण कर लिया है। पहले अपने देवताओं को अर्पित किया - श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री गणेश; और उसके बाद नैवेद्य के रूप में स्वयं ग्रहण कर लिया। अब यह पुरुष सामान्य के लिए विशेषण बन गया है। यह बात और है कि सौजन्य वश या शिष्टता के कारण (दिखावे की ही सही) व्यक्ति स्वयं अपने नाम के आगे श्री नहीं लगाता किंतु अपेक्षा करता है कि दूसरा उसे श्री अवश्य कहे। अब जिसके नाम का अंग ही श्री हो उन्हें एक श्री और उपहार में मिल जाता है - जैसे श्री श्रीलाल, श्री श्रीनाथ। अंग्रेजी के 'मिस्टर' के लिए यह हिंदी समानार्थी बन गया है। सामाजिक न्याय कुछ ऐसा है कि आप किसी सामान्य भिखारी को तो श्री भिखारी जी नहीं कहेंगे किंतु किसी सम्मानित पदधारी को आप श्री अशर्फीलाल ही नहीं, श्री भिखारी दास भी कह सकते हैं! हाँ, एक बात और। श्री आप एक व्यक्ति के लिए लगा रहे हैं तो भी क्रिया बहुवचन की ही लगेगी।
पुरुषों ने स्वयं को प्रतिष्ठित, धनसंपन्न, सम्मानित बताने के लिए अपने नाम के साथ श्री जोड़ा तो महिलाओं ने श्रीमती जोड़ लिया। अंततः धन-दौलत की चाबी तो उनके पास ही रहती है ना! वे श्रीमती होंगी, तभी आप श्रीमान होंगे; वरना ठन-ठन गोपाल। धीरे-धीरे श्रीमती विवाहिता महिला के लिए रूढ़ बन गया। केवल और केवल विवाहित महिला ही श्रीमती कही जाती है। यहां उसकी रुचि-अरुचि की अपेक्षा सामाजिक नियंत्रण अधिक समर्थ है। संपन्न किंतु अविवाहित महिला को श्रीमती कहे जाने का अधिकार नहीं।
याद आता है एक बार संसद में भी बहस हुई थी कि श्री विशेषण पर पुरुषों का वर्चस्व कैसे? महिलाओं के साथ भी श्री क्यों न लगे? यह पुरुषों का एकाधिकार कैसे हो सकता है? हम देवियों को तो श्री कहते हैं - श्री राधा जी, श्री सीता जी। याद नहीं कि बहस का क्या परिणाम निकला था किंतु पुरुष को श्री और विवाहिता महिला को श्रीमती कहने की यह परंपरा चल रही है आज भी और संभवत: आगे भी। पुरुषों ने रहस्य यहाँ भी बनाए रखा। विवाहित होने अथवा न होने के बारे में 'श्री' से कुछ पता नहीं चलता। श्री "अमुक" विवाहित भी हो सकते हैं, कुँवारे भी और विधुर भी। श्रीमती "अमुक" विवाहित ही होगी, विधवा होने पर भी श्रीमती। संबंध विच्छेद हो जाने पर उनकी इच्छा पर है कि वे 'सुश्री' ठीक समझती हैं या श्रीमती।
अपनी पत्नी को "श्रीमती जी!" संबोधन बिल्कुल सही है किंतु सामान्यतः किसी अन्य के लिए नहीं। पूछताछ वाली खिड़की पर बैठा कर्मचारी जब विनम्रता से किसी महिला से पूछता है, "मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ श्रीमती जी", तो उसका आशय अंग्रेजी के "मैडम" शब्द से होता है, कुछ और नहीं।
अविवाहित कन्याओं को "कुमारी" कहा जाने लगा किंतु कुमारी के साथ जो कौमार्य की अर्थ संकल्पना है वह नारी समाज के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण की भी द्योतक है और आवश्यक नहीं कि सबको स्वीकार्य हो। जो महिलाएँ उम्र में बड़ी हैं और विवाहित होने- न -होने के बारे में नहीं बताना चाहतीं या इस बारे में आपको नहीं पता है, तो? तब उनके नाम के पहले सम्मान व्यक्त करने के लिए "सुश्री" जोड़ने का चलन चला, अर्थात श्री को तो महिलाओं के लिए भी अपना लिया गया किंतु एक सुंदर सा प्रविशेषण "-सु" और जोड़ दिया गया। गोपनीयता की रक्षा भी हो गई।
श्री की सांस्कृतिक जड़ें बड़ी पुरानी और व्यापक रही हैं। पहले जब पत्र लेखन और औपचारिक संबोधन के नियम निर्धारित थे, तब सिखाया जाता था:
"श्री लिखिए षट् गुरुन को, स्वामि पाँच, रिपु चार।
अर्थात परिवार के बड़े लोगों, गुरुजनों को श्री ६, स्वामी अथवा राजा को श्री ५, शत्रु को श्री ४, मित्र को श्री ३, सेवक को श्री २, और शिष्य, पुत्र और पत्नी को श्री १ लिखा जाना चाहिए ।
कोई संत श्रीजी हों तो उन्हें श्री श्रीजी कहा जा सकता है, किंतु संत और साधुओं के समाज में श्री को लेकर बड़ी उथल-पुथल रही है और नियमों को ठीक ठीक नहीं समझा जा सकता। यहाँ तो कम से कम "श्री १०८" से संबोधन प्रारंभ होता है और "श्री १००८", "श्री १००००८" से होता हुआ "अनंत श्री" तक जा पहुँचता है। वे इतने समर्थ होते हैं कि अपने लिए स्वयं चुनाव कर सकते हैं कि उन्हें श्री १०८ कहा जाए या अनंतश्री विभूषित।
Wednesday, 9 June 2021
परात
परात ( پرات)
पीतल, काँसा, ताँबा, स्टील से बना थाली के आकार का एक बड़ा बरतन परात कहलाता है, जिसका किनारा थाली के किनारे से ऊँचा होता है । यह मुख्य रूप से आटा गूँधने के, रसोई में छुटपुट संग्रह के काम आता है। कभी-कभी हाथ-पैर धोने, शादी-ब्याह या किसी और सामूहिक भोज में सामग्री संग्रह या वितरण आदि के काम में भी लाया जाता है ।
—कोउ परात कोउ लोटा लाई ।
साह सभा सब हाथ धोवाई । (जायसी)
— पानी परात को हाथ छुयौ नहिं, नैनन के जल सों पग धोये। (नरोत्तमदास)
यह शब्द हिंदी, हिंदी क्षेत्र की सभी भाषाओं-बोलियों, नेपाली, पंजाबी, सिंधी, गुजराती, मराठी, कन्नड़ सहित अनेक भाषाओं में विद्यमान है। "परात" शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत पात्र से सहज लगती है। पात्र > परात।
कुछ इसे पुर्तगाली के pratt प्राट से भी व्युत्पन्न मानते हैं और कुछ देशज अर्थात् अज्ञात व्युत्पत्तिक मानते हैं।
Monday, 7 June 2021
अर्थ, आशय, अभिप्राय, तात्पर्य और भावार्थ
ये पाँचों शब्द प्रायः समानार्थी माने जाते हैं। शब्दकोश भी इनके अर्थ मिलते-जुलते देते हैं किंतु सूक्ष्म रूप से देखें तो इनमें निश्चय ही कुछ अंतर है । अर्थ से तात्पर्य सामान्यतः शब्दार्थ से होता है। आप किसी उक्ति , कथन में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ जानते हैं तो आप उक्ति का सामान्य अर्थ भी जानते हैं। उस अर्थ को बता भी सकते हैं। आशय और अर्थ में बस इतना ही अंतर है कि शब्दों का अलग-अलग अर्थ जाने बिना भी आप संदर्भ समझते हुए बात का आशय ग्रहण कर लेते हैं।
तात्पर्य इससे कहीं आगे हैं। यह तत्परता का दूसरा रूप है। तत्पर अर्थात उसके बाद आने वाला (तत् परम्)। जब आप किसी बात के गूढ़ अर्थ समझाने लगते हैं, एक के बाद एक उसकी परतें खोलने लगते हैं, तब आप तात्पर्य समझा रहे होते हैं और दूसरा भी तात्पर्य ग्रहण कर रहा होता है।
अभिप्राय मैं अभि उपसर्ग है और इसका आशय गति करने के निकट है (संस्कृत √इ धातु, अभि और प्र उपसर्ग) अर्थात आप अगले के भावों तक पहुंचते हैं। अपना अभिप्राय स्पष्ट करते हैं तो उसमें आपकी राय, आपकी धारणा भी दूसरे तक पहुंचती है क्योंकि आप अभिप्राय समझा रहे होते हैं। यह बहुत कुछ अंग्रेजी के इंटेंडेड मीनिंग सा है । (ध्यान रहे कि अंग्रेजी के मोटिफ़ शब्द को भी हिंदी में अभिप्राय कहा गया है।) तात्पर्य का संबंध विषय या वस्तु से होता है लेकिन अभिप्राय प्रायः व्यक्ति का होता है।
भावार्थ इन तीनों से थोड़ा हटकर है और थोड़ा तीनों के समान भी। तात्पर्य या अभिप्राय में आपको अपनी बात समझाने के लिए अधिक बातों, वाक्यों का सहारा लेना पड़ सकता है किंतु भाव समझाने में आप संक्षिप्तता का आश्रय लेते हैं। जो कथन या आशय है उसको आप केंद्रीय भाव मानकर समझाते हैं। आप भावार्थ समझा रहे होते हैं और दूसरा भावार्थ ग्रहण कर रहा होता है।
पुरानी किंतु शास्त्रीय शब्दावली का प्रयोग करें तो कह सकते हैं कि अर्थ और आशय में अभिधा अर्थ देखा जाता है तथा अभिप्राय, तात्पर्य और भावार्थ के लिए हमें लक्षणा और व्यंजना को भी समझना,स्पष्ट करना होता है।
Thursday, 3 June 2021
दारुहल्दी
दारुहरिद्रा बनाम किलमोड़ा
वैश्विक महामारी के कारण हल्दी को मिली व्यापक स्वीकृति के दौर में क्या दारुहल्दी (लकड़ी की हल्दी, tree turmeric) Berberis aristata को आप जानते हैं? उत्तराखंड में यह रसीला मौसमी जंगली फल "किलमोड़ा" नाम से जाना जाता है। भारत, नेपाल, भूटान में हिमालयी क्षेत्र में इसकी झाड़ियाँ प्राकृतिक रूप से उगी मिलती हैं। कुर्ग (कर्नाटक) और केंडी (श्रीलंका) की पहाड़ियों में भी मैंने इसे देखा है। हम पहाड़ के लोग इसके फल-फूलों पर ही मुग्ध रहे और वन-दोहकों ने इसकी जड़ें भी खोदकर महँगे दामों में बेच डालीं।
दारुहरिद्रा के फल, फूल, पत्तियाँ, छाल, लकड़ी, जड़ें सब कुछ उपयोगी है। इधर कुछ वर्षों से इसके फलों का रस बाज़ार में दिखाई देने लगा है जो बहुत सीमित मात्रा में कुटीर उद्योग के रूप में तैयार किया जाता है और कुछ दिनों में ही ख़राब हो जाता है।
जानकार लोग जड़ों को उबालकर बहुमूल्य रसौंत बनाते हैं जो आयुर्वेद में अनेक योग, रस, रसायन बनाने के काम आता है। चर्म उद्योग में तने की लकड़ी तथा जड़ें प्राकृतिक रूप से शोधन और रंजन के काम आती हैं।
दारुहल्दी को संस्कृत में दार्वी, पर्जन्या, पीता, पचम्पचा, कालियक, हरिद्रु, पीतदारु, पीतक आदि नामों से भी जाना जाता है। यह आयुर्वेद में एक महाऔषधि है। भावप्रकाश निघंटु में दारुहल्दी के गुणों का अद्भुत वर्णन मिलता है।
हृदय, पित्त, मधुमेह, रक्तचाप, जीर्ण ज्वर, खाँसी, दमा, मूत्रमार्ग की पथरी, रक्ताल्पता आदि अनेक रोगों में अपने गाँव में पितृ, पितृव्य, बांधवों को (जो परंपरा से वैद्य व्यवसायी थे) इसके योग बनाकर देते हुए देखा है।
