Monday, 28 August 2023

जयन्ती और जन्मदिन

त्यौहारों के समय भाषा के प्रति हमारी जिज्ञासा अधिक सचेत, सजग हो जाती है। बातें छोटी होती हैं लेकिन नए-नए आयाम जोड़ दिए जाते हैं। दिवाली कहें या दीवाली, रमजान या रमादान, व्रत या उपवास, नवरात्र या नवरात्रि, जयन्ती या जन्मोत्सव? ताजा बहस हनुमान जी की जयन्ती को लेकर है कि इसे जयन्ती कहना ठीक है या जन्मोत्सव।

यों तो प्रत्येक शब्द के साथ एक या एक से अधिक अर्थ संकल्पनाएँ जुड़ी होती हैं फिर भी प्रसङ्ग और प्रयोग के अनुसार अर्थ भिन्नता होती है। एक ही शब्द भिन्न संदर्भ में भिन्न अर्थ देता है। जहाँ तक जयन्ती शब्द का सम्बन्ध है, इसकी उत्पत्ति संस्कृत भाषा की धातु √जि (जीतना, उन्नति करना) से है। जिसका अर्थ है विजय करनेवाली, विजयिनी। इसीलिए दुर्गा का एक नाम जयन्ती है।

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते॥

रथों, मन्दिरों पर फहरने वाली ध्वजा भी जयन्ती (जीत दिलाने वाली) है। कुछ शुभ और उपयोगी वनस्पतियों का नाम जयन्ती है। वैजयन्ती, विजया, जया परस्पर पर्याय हैं।

जन्मदिन को वर्षग्रन्थि या वर्षगाँठ भी कहा जाता है। ‘वर्षगाँठ’ से उत्तररामचरित की यह पंक्ति याद आती है

वत्से देवयजनसम्भवे सीते! अद्य खल्वायुष्मतोः कुशलवयोः द्वादशस्य जन्मवत्सरस्य संख्यामङ्गलग्रन्थिः अभिवर्तते।

वर्ष पूरा होने पर मनाई जाने वाली वर्षगाँठ ही जयन्ती, जन्मदिन, जन्मदिवस है। देवी-देवता के अवतरण या प्राकट्य दिवस को जयन्ती कहा जाता है। उसे उत्सव के रूप में मनाएँ तो जन्मोत्सव भी कहा जा सकता है। इधर कुछ वर्षों से परंपरा सी बन गई है कि दिवंगत व्यक्ति के जन्मदिनको ही जयंती कहें। जबकि व्यवहार में ऐसा नहीं है। जीवित व्यक्ति की भी २५-वीं वर्षगाँठ रजत जयन्ती, ६०-वीं स्वर्णजयन्ती और ७५-वीं हीरक जयन्ती मनाई जाती है! जन्म-जयंती कहना अनावश्यक दुहराव है।जयंती पर्याप्त है। जयंती शब्द का प्रयोग प्रायः सुखद घटनाओं के लिए किया जाता है। दुखद घटना हो तो (जैसे किसी महापुरुष की मृत्यु तिथि), तब "पुण्यतिथि" कहा जाता है।

ध्यान में रखने की बात यह भी है कि जीवित व्यक्ति के लिए जन्मदिन या वर्षगाँठ कहने की परंपरा है, जयंती नहीं।

जयंती विवाद पर एक बात और। हिंदी भाषियों के लिए जो श्रीकृष्ण जयंती जन्माष्टमी या श्रीकृष्णाष्टमी है, वह तमिल भाषियों के लिए श्रीजयन्ती है। इसी से समझा जा सकता है कि यह प्रयोग कितना पुराना है।

लोक में रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, हनुमान जयंती प्रचलित हैं। जन्मोत्सव तो राम, कृष्ण, हनुमान- किसी का भी मनाया जा सकता है। शेष "भिन्नरुचिर्हि लोकः।"

Sunday, 6 August 2023

राह भटकी किताब का टोटका

विश्व पुस्तक मेला, 2023 से
राह भटकी किताब का टोटका
(व्यंग्य)
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टोना-टोटका, झाड़-फूँक में कभी विश्वास नहीं किया। कालेज पढ़ाई के दिनों में एक फिरक्कड़ पंडिज्जी गाँव में आ गए थे। कहते थे हम बद्रीनाथ के पंडा हैं। हमारा हाथ जबरदस्ती खींच कर हथेली की एक रेखा पर अंगुली फिराते हुए बोले, "अरे बाबू, तुम्हारा स्त्री लोग से झगड़ा हुआ करेगा।" हम पूछे कैसे, तो वे संस्कृत का एक ठो कोटेशन फँसाते हुए बोले, यह जो रेखा देख रहे हो ना, इसका फल है जनानां विवादा। जनानां विवादा मने जनाना से झगड़ा फसाद होगा। तब से हम किसी जनाना के सामने से गुजरने में भी घबराने लगे। शादी के मंडप में भी इस आश्वासन के बाद गए कि बीच में परदा लटका रहेगा।

खैर, हम मुद्दे से भटक न जाएँ। असल में हम दूसरी बात करना चाह रहे थे। यह जो दिल्ली में तामझाम के साथ एक मेला लगा है ना। वह क्या कहते हैं कि विश्व पुस्तक मेला, इसके हम बहुत पहले से मुरीद रहे। लोगों को तो अब याद भी नहीं होगा कि पहले यह जनपथ के पीछे वाले मैदान में लगा था जहाँ अब मैदान नहीं, काला आसमान है और आसमानी इमारतें हैं। फिर बड़ी अदालत के पीछे सुनसान और वीरान से मैदान में लगने लगा जिसे प्रगति मैदान कहा गया। हम सबमें जाते रहे। फिर जाना कुछ कम हुआ। दो साल कोरोना से बंद हो गया। अबकी जी कड़ा कर के लाठी लेकर निकलने की सोचे तो सूरदास जी याद आने लगे "मन उमगत, तन नाहीं।"

पिछले पुस्तक मेलों में हम पाठक की हैसियत से जाते और झोला भर पुस्तकें खरीद लाते। जरूरी और कभी-कभी गैरजरूरी भी। इस बार कुछ ऐसी मति मारी गई कि लेखक की हैसियत से पहुँचने की ठानी। ईमानदारी से कह रहे हैं कि हमने कभी कुछ लिखा उखा नहीं, लेकिन जाने क्यों कुछ लोग बिना हमसे चाय-पानी पिए हमें पुराना साहित्यकार मानने लगे। पहली किताब कभी छपी तो उसके लेखक, संपादक, प्रकाशक, प्रचारक, वितरक और विक्रेता हम ही हम रहे। पूँजी जरूर श्रीमती जी ने लगाई थी और डूब गई। जनाना विवादा में पड़ने की डर से उस पहली उधारी का ब्याज हम आज तक चुका ही रहे हैं। बाद में जिन प्रकाशकों ने मेरी किताबें छापीं उन्हें पुस्तक मेला बकवास लगता था और प्रगति मैदान टेढ़ा आँगन लगता था जहाँ नाचा ही नहीं जा सकता। बहरहाल, बयाने इकबालिया यह कि हमारी पुस्तक कभी पुस्तक मेला नहीं पहुँची। इस बार हम इस मुगालते में थे कि अपनी नाजुक-सी उमरिया की शताब्दी पूरी होते-होते कम से कम एक किताब तो पुस्तक मेले पर पहुँचेगी और हम अपनी सिकुड़ती- सिकुड़ाती 26 इंची छाती ठोक के कह सकेंगे कि देखो, हम पुस्तक मेले में मौजूद हैं। लोगों को ललकार रहे थे। रे भैया, हिम्मत हो तो एक नजर हमारी कितबिया की ओर भी फेर लेना। लेकिन वह जो कहते हैं न कि कानी के ब्याह में नौ झंझट। तीन दिन से "शब्दों के साथ-साथ" नाम की हमारी पुस्तक प्रकाशक के कारिंदों के साथ-साथ स्टोर से चल तो पड़ी, लेकिन प्रगति मैदान तक पहुंची नहीं। खरीदार स्टाल पर पहुंचें और विक्रेता कहें अभी आएगी, पर पुस्तक थी कि बेवफा माशूका की तरह वादा तोड़ने पर कायम। नौ दिन चले अढ़ाई कोस की प्रगति भी नहीं। बड़ा गुस्सा आया पंडित नेहरू पर। उन्होंने बेकार इस मैदान का नाम प्रगति मैदान रख दिया। मेरी चले तो मैं इसका नाम बदलकर विकास मैदान या ऐसा ही कुछ कर दूँ। 

तीन दिन से कोई तीन दर्जन (अब यह मत कहिए कि आदमी की नाप-जोख दर्जन में नहीं होती) अपने परिचित-अपरिचित सखा-सखी, भाई-बहन, बेटा-बिटिया लोग का संदेश आ रहा है कि मेले में हमारी पुस्तक रूपी दूतिका के दर्शन नहीं हुए। अरे भाई, होंगे कैसे! वह तो अभी चरैवेति चरैवेति का उपनिषद मंत्र जप रही है। आ जाएगी कल, कल नहीं तो परसों, जैसे अपने देस में आ रहा है वह ...। एक मित्र तो घर ही पधार गए के भाई दर्शन तो कराओ अपनी पुस्तक के। अब हमारे पास हो तो दर्शन कराएँ। हमें तो प्रकाशक ने सिर्फ फोटो भेजी थी। इधर मित्र हैं कि विश्वास करने को तैयार नहीं कि किसी की किताब छपे और वह किताब की फोटो को ही असली मान ले। बहरहाल हम विवश थे, क्या करते।

हम भाग्यशाली हैं कि हमारे कुछ हितेषी अभी हैं, मने अभी चोला बदली करके परलोक गमन नहीं किए हैं। उन्होंने सुझाया कि किसी अच्छे ज्योतिषी को जन्मपत्री दिखा लो। जरूर कोई ऊपरी बाधा है। कृपा कहीं रुक रही है । कृपा खुले तो रस्ता खुले, रस्ता खुले तो पुस्तक निकले, पुस्तक निकले तो पुस्तक मेला पहुंचेगी ही पहुंचेगी और कहां जाएगी निगोड़ी। हमने बताया अपना अख्खा जिन्नगी में जोतिशी लोगों ने बहुत कर्मकांड, टोना-टोटका, खेलन-कीलन, चाटन- उच्चाटन का बात किया। और एक बार एक जीन बुस्सट वाला तांत्रिक बाबू तो पूरे परिवार की जन्मपत्रियों के साथ ही साथ ₹5000 ऐसा झटक के ले गया कि अब तक उसका उत्तर दक्खिनै का पता नहीं। इसलिए हम कहीं नहीं जाएंगे। लेकिन वह कहते हैं न कि होनी होके रहती है। हम भितरघात के शिकार हो गए। भीतर वालों ने बिना हमारी मांग के हमारी जेब में कुछ नोट ठूँसे (ऐसा अघट आज तक नहीं घटा) और समझाया इतने दिन आँखें फोर के उस कितबिया के पीछे लगे रहे। वो कहीं अटक गई है तो जाओ और उसका कुछ उपाय करो। इतने दिन हमें छोड़कर उसे अपनी बनाए रहे तो उसकी खोज खबर कौन करेगा। हम जनाना विवाद उरझाना नहीं चाहते थे, इसलिए सिर झुकाकर चल पड़े।

अब हम सई साँझ दो घंटे से एक बड़े नामी संत महात्मा, त्रिकालदर्शी के दरबार में बैठे हैं कि अटकी हुई कृपा खोलें। उनके चेला-चाँटी, गुमाश्तों ने टिकट, भेंट, चढ़ावा, दक्षिणा के नाम पर हमारी जेब खाली कर ली है। वापसी में उधारी वाली टैक्सी करके लौटेंगे। पर किसी भी तरह से ऐसा टोटका जरूर करवाएँगे कि कृपा खुले और हमारी इकलौती चहेती (मने पुस्तक, अउर कौन) मेला में पहुँचे और हमारे प्रेमियों को दर्शन दे। 
आधी रात को दरसन का समय आया तो हमसे कुछ कहते नहीं बना। पर जाने कैसे संत जी सब जानते थे। वही पूछते गए और हम हर सवाल के जवाब में हां-हां कहते चले गए। अब चलते-चलते परम संत जी ने कह तो दिया है कि बच्चा (!), कल सूर्योदय के बाद शनि महाराज दूसरे नछत्र में चले जाएँगे और तुम्हारी साढ़ेसाती कम हो जाएगी और तुम्हारी पुस्तक मेले तक पहुँच जाएगी।

हम अभी भोर बेला घर पहुँचे हैं। पूरब की ओर ताक रहे हैं कि कब सूर्योदय हो और साढ़ेसाती छूटे।



Thursday, 3 August 2023

पौ बारह होना

पौ बारह होना

लूडो की तरह एक पुराना खेल होता था चौपड़ जिसे चौरस भी कहा जाता है। उसमें गोट आगे बढ़ाने के लिए पासे फेंके जाते थे। लंबे पासे होते थे और प्रत्येक पासे में चार फलकों (साइड्स) पर एक से चार तक निशान बने होते थे। (लूडो के वर्गाकार डाइस के समान 6 नहीं)। 
पौ बारह का "पौ" सं॰ पद > पव > पौ (=कदम) से बना है। चौसर के खेल में पासे की एक खास संख्या पर गोट का "घर" से बाहर पौ बढ़ाना , निकलना है। आज भी पौ, पौ पूजना, पौ चलाई जैसे कुछ शब्द प्रचलन में हैं जहाँ पौ का अर्थ पैर, कदम है।
तीनों पासे एक साथ फेंकने पर सबसे बड़ा स्कोर 4 * 3 =12 होगा। इस प्रकार पौ बारह होना का लाक्षणिक अर्थ होगा- घर से कदम निकलते ही अधिकतम मिल जाना। पौ बारह। अधिकतम लाभ।

पुराने खेलों के विलुप्त हो जाने से उनसे जुड़ी हुई ऐसी बीसियों कहावतें और अभिव्यक्तियाँ संदर्भ खो बैठी हैं या विलुप्त हो गई हैं।