॥ महर्षि पाणिनि का अपवाद सूत्र ॥
एक मित्र हैं युवा मन, वृद्ध तन। वृद्ध बोले तो वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध , अनुभव वृद्ध। आज उन्होंने फोन पर बताया संस्कृत व्याकरण में एक अव्यय जुड़ गया है। हम चौंक गए कि यह कैसे हो सकता है।
पूछा, कौन सा अव्यय जुड़ गया जिसे पाणिनि बताना भूल गए?
बोले- इदानीम्, तदानीम् को जानते हैं?
~ जानते क्यों नहीं है। इदानीम् इस समय, तदानीम् उस समय...!
~बिल्कुल ठीक इसी तरह से अदानीम् पढ़े हैं कभी?
~ऐसा कोई शब्द हइयै नहीं है तो पढ़ेंगे कैसे?
~वोई तो! अब आ गया है, पढ़ना पड़ेगा।
~यह कोई यूनिवर्सिटी का सिलेबस है क्या कि सरकार बदली तो बदल जाएगा। यह है क्या बला?
~अव्यय है, क्योंकि यह व्यय नहीं करता, इसके लिए सरकार व्यय करती है। सफल अव्यय है अर्थात सबके उपक्रमों और कर्मों का फल इसी को मिलता है।
~पल्ला छुड़ाने के लिए हमने निवेदन किया संस्कृत व्याकरण की गठड़ी तो पाणिनि पक्की गाँठ लगाकर सौंप गए। अब उसको न कोई खोल सकता है, न उसमें कुछ बढ़ा-घटा सकता है। सॉरी, आपकी मेहनत बेकार जाएगी।
बस फिर क्या था, वे आपसे तुम पर आगए।
~तुम संस्कृत वाले नहीं समझोगे। रट-रट के दो अक्षर पढ़ लेते हो, अकल तो है नहीं। तुम्हें मालूम है पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी में सवा-सात अध्याय के बाद क्या कहा है? उन्होंने कहा है "पूर्वत्रासिद्धम्"। अर्थात आगे आने वाले सूत्रों पर अभी तक बताई गई बातें लागू नहीं होंगी।
~ जी, कहा तो है किंतु
~ कोई किंतु-परंतु नहीं। इसी को ध्यान में रखकर कहा है। वे होते तो एक अपवाद सूत्र और बना देते, "राजमित्राय ईमव्ययादेश:", अर्थात् राजा के मित्र को अव्यय बनाने के लिए ईम् आदेश होगा, या ऐसा ही कोई सूत्र।
"हो ही नहीं सकता, आचार्य," हमने पीछा छुड़ाने की नीयत से कहा।
"अरे! (हमें लगा वे अरे मूर्ख! कहना चाहते हैं किंतु अरे के बाद रुक गए) राजा चाहे तो सब कुछ हो सकता है। देखा नहीं तुमने कि धर्मक्षेत्र के एक आश्रम में प्रोफेसर को इस्तीफा देना पड़ा था। इंद्रप्रस्थ के एक विश्वविद्यालय को टुकड़े-टुकड़े करना पड़ा। और भी बहुत से उदाहरण हैं।"
हमने सोचा वे आपसे तुम पर तो आ ही गए थे , अब शीघ्र ही तू तड़ाक वाला रिश्ता बन जाएगा। इसलिए आसमान की ओर हाथ जोड़कर कहा, "आपको मान गए श्रीमान। हमको क्षमा कीजिए"।
उन्होंने सुर बदलते हुए कहा क्षमा बाद में करेंगे, पहले आप इन अव्यय वाक्यों को रट लीजिए -
इदानीम् पश्य।
तदानीम् पश्य।
अदानीम् पश्य।
और हम रट रहे हैं-
अदानीम् पश्य। अदानीम् पश्य। अदानीम् पश्य।
Thursday, 19 December 2024
महर्षि पाणिनि का अपवाद सूत्र
Sunday, 15 December 2024
शतरंज के भारतीय विश्व चैंपियन का नाम
Thursday, 28 November 2024
दाढ़ी बनाना और बढ़ाना
उस्तरे या ब्लेड से गाल, होंठ, ठोड़ी पर उगे बालों को छील-छालकर साफ़ करने के लिए हिंदी में दाढ़ी 'बनाना' क्रिया है जब कि इसमें 'बनाने' जैसा कुछ भी नहीं। इसके विपरीत इसके अंग्रेजी पर्याय shaving में शाब्दिक अर्थ बना रहता है, " to remove the hair or beard off with a razor." (OED)
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संस्कृत में दाढ़ी-मूँछ को श्मश्रु कहा जाता है और इन्हें काटने-बनाने वाले कारीगर (नाई, barber) को संस्कृत में नापित कहते हैं। नापित सेे ही हिंदी आदि अनेक भाषाओं में 'नाई' शब्द बना है।
नापित (नाई) का एक रोचक पर्याय है- 'श्मश्रुवर्धक' (आप्टे)। श्मश्रुवर्धक का शाब्दिक अर्थ है– दाढ़ी (श्मश्रु) को बढ़ाने वाला (वर्धक), दाढ़ी को पाल-पोसकर बड़ा करने वाला। यह कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे दिया बुझाने को कहा जाता है– दिया बढ़ाना। अन्य पर्याय हैं– वपन, परिवापन, भद्राकरण आदि। वपन, परिवापन भी वप् धातु से बने हैं जिसका मूल अर्थ है बोना, उगाना। वप् से ही बाप बना है! चौंकिए नहीं, कुछ भाषा प्रयोग बड़े रोचक होते हैं।
इस काम के लिए एक अन्य शब्द क्षौर कर्म भी है। क्षौर कर्म के अंतर्गत मुंडन के साथ-साथ अनेक क्रियाएँ आ जाती हैं, केशश्मश्रुनखादीनां कर्त्तनं संप्रसाधनम् । अर्थात क्षौर के अंतर्गत केश, दाढ़ी-मूँछ, नाखून आदि काटकर सजना-सँवरना आदि क्रियाएँ मानी गई हैं।
अरबी से हिंदी-उर्दू में आया हुआ "हजामत" भी लगभग ऐसा ही है। इसलिए "दाढ़ी बनाना" उपयुक्त है। ढूँढाड़ी में दाढ़ी बनाने के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है– सुँवार बनाना, सुँवारना। सुँवार शब्द 'सँवरने' का ही स्थानीय रूप है।
Tuesday, 12 November 2024
कुमाऊँ में बसंत और पतझड़
Tuesday, 22 October 2024
हरसिंगार और सप्तपर्णी
हरसिंगार और सप्तपर्णी
कुछ लोग हरसिंगार (पारिजात) की गंध को शरद ऋतु की गंध मानते हैं। निःसंदेह मनभावन है, मधुर भी। मुझे जाने क्यों लगता है कि इसमें आभिजात्य की ठसक है। समुद्र मंथन में देवताओं के साथ जन्म लेने से कुलीनता का अहंकार । इंद्र की बगिया में खिलने का अभिमान। जाने कैसा कौमार्य का गर्व है कि आधी रात चुपचाप खिलो और भोर होते बिखर जाओ कि जो स्वर्ग के देवताओं के लिए बना हो उसे धरती पर कोई मनुष्य छू न ले।
हरसिंगार की गंध आम जन की गंध हो ही नहीं सकती।
मेरा मानना है कि छितवन (सप्तपर्णी) की गंध शरद ऋतु की गंध है- मादक। सारी रात दूर-दूर तक महका देने वाली। शयनकक्ष के गवाक्षों से भीतर पहुँच जाए तो जोड़े मचल उठें। ऐसी समर्थ कि आसपास खिले दस हरसिंगार लजा जाएँ।
देवालय के लिए हरसिंगार उपयुक्त हो सकता है लेकिन मुझ जैसे चिर श्रमिक को छितवन प्रेरणा देता है, शक्ति देता है। ललकारता है आओ, उठो मेरी ही तरह। ऐसा कुछ करो कि अंधकार भी गमक उठे। भोर हो तो लोग तुम्हें पाने के लिए ललचाएँ। ऊँची डालियों पर खिलो कि लोग ईर्ष्या करें पर तुम्हारा कुछ बिगाड़ न पाएँ। ऊँचे उठोगे तो छोटी-मोटी बाधाओं से दूर रहोगे। वरना हरसिंगार की भाँति दुर्बल बाहु रह जाओगे।
तुम पर चाहे कोई कवि एक पंक्ति न लिखे, चिंता मत करो। स्वयं अपना रास्ता बनाओ और अपना होना सिद्ध करो।
Sunday, 20 October 2024
चौथ का चाँद
और इस नायिका ने तो कमाल ही कर दिया। उसके घर के आस-पास पूरे मोहल्ले में हर रात पूनम का चांद चमकता है। लोगों को समस्या है कि पूर्णिमा तिथि किस दिन मानें। निदान उन्हें पंचांग का महत्व समझ में आया कि पूर्णिमा जाननी हो तो भाई, पत्रा-पंचांग में ढूँढ़ लो। मोहल्ले में तो उस मुखड़े की चमक-दमक से रोज़ चाँदनी ही चाँदनी है।
पत्रा ही तिथि पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पून्यौई रहै, आनन-ओप-उजास॥
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Friday, 18 October 2024
चेतावनी : व्याकरण न जानने से होगी दुर्गति
Wednesday, 16 October 2024
कोजागरी, खीर और रोटी
कोजागरी, खीर और बेड़ईं रोटी
आश्विन पूर्णिमा को कुमाऊँ, नेपाल, महाराष्ट्र में "कोजागरी" [< 'क: (को) जागर्ति' से व्युत्पन्न] के नाम से जाना जाता है! लोकविश्वास है कि इस रात को लक्ष्मी स्वयं घर-घर घूमकर देखती हैं कि कौन उनकी प्रतीक्षा में जागा हुआ है ' को जागर्ति'। बिहार में, विशेषकर मिथिला में, इसे कोजागरा के नाम से मनाते हैं। नवविवाहित जोड़ों की ओर से तांबूल (पान), बतासा और मखाना वितरित किया जाता है। इसे विवाह के बाद का पहला सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है!
मराठियों में इस पर्व को कोजागिरी कहा जाता है। चन्द्रोदय के उपरांत, श्वेत वस्त्र धारी लक्ष्मी का पूजन होता है और प्रसाद में खीर , बर्फ़ी आदि अनेक प्रकार की सफेद वस्तुओं का भोग लगाया जाता है। सबसे मज़ेदार बात यह कि परिवार में पहली (ज्येष्ठ) सन्तान की आरती उतारी जाती है और उसे परिवार के सभी बड़ों से त्योहारी मिलती है। यह प्रिविलेज छोटे भाई-बहनों के लिए ईर्ष्या और झगड़े का एक कारण बन जाता है।
कुमाऊँ में एक पुराना रिवाज़ यह था कि इस दिन रात को उड़द की पिट्ठी से बेड़ईं रोटी अवश्य बनाई जाती थी। "भाव प्रकाश" में इसे बलभद्रिका रोटी कहा गया है। उल्लेख कुछ यों है:
“चूर्णं यच्छुष्कमाषाणां चमसी साभिधीयते।
चमसीरचिता रोटी कथ्यते बलभद्रिका॥"
(शब्दकल्पद्रुमुम)
अर्थात मास की पिट्ठी को चमसी कहा जाता है और चमसी से बनी रोटी का नाम है बलभद्रिका। संकेत यह भी है कि बलभद्रिका बेड़ई रोटी बल बढ़ाने वाली होती है।
किसी कवि ने इसे "चंद्रबदनी रोटी" भी कहा है।
गोधूमचूर्णचयचारुसुधाकराभा माषप्रचूर्णलवणार्द्रकहिङ्गुगर्भा । हैयङ्गवीनकृतमार्जनकोमलाङ्गी
रोटी मुखे विशतु पुण्यवतां जनानाम् ॥
अर्थात "दाल की पिट्ठी, नमक, अदरक, हींग को अपने उदर में समेटे हुए, ताज़ा घी से चुपड़ी, कोमलांगी, चाँद-सी गोरी, गेहूँ के आटे से बनी विशेष रोटी सभी पुण्यवान लोगों के मुँह में प्रवेश करे।"
शरद पूर्णिमा को अमृत काल कहकर रात भर खुले में रखी खीर सुबह खाना कभी स्वास्थ्यवर्धक रहा होगा, किंतु आज प्रदूषण के कारण एक रात में उसमें ढेर सारा अपद्रव्य मिल जाएगा। प्रदूषित खीर खाने से अच्छा है घर के भीतर बनी ताजी बलभद्रिका (बेडमी) रोटी खाना!
रुचि और वरीयता आपकी।
Sunday, 13 October 2024
सौगंध, सौगंध
Friday, 11 October 2024
अपराजिता
Wednesday, 9 October 2024
लफड़ा
Tuesday, 24 September 2024
प्यार का एक कूट शब्द
१४३
प्यार प्रकृति की ओर से मनुष्य को दी गई संभवतः पहली और सबसे अनूठी सौगात है। यह एक ऐसी भावना है जो आदिम युग से लेकर आज तक जीवित है, न केवल मानवों में, बल्कि प्रकृति के अन्य जीवों में भी। प्यार का यह बंधन जीवन को संजीवनी प्रदान करता है और समाज को जोड़ने का कार्य करता है। इसके बिना, जीवन की कल्पना करना भी कठिन है। आधुनिक युग में, तकनीकी विकास के साथ-साथ यांत्रिक मनुष्य में भी प्यार के भावों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा लगता है कि चाहे कितनी भी प्रगति कर लें, प्यार की गहराई और उसकी महत्ता कभी कम नहीं होगी। यह हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हमारे संबंधों का अभिन्न हिस्सा बना रहेगा। इसलिए, प्यार का यह रूप और उसकी संवेदनशीलता हमें सिखाती है कि हम अपनी भावनाओं को कैसे व्यक्त करें और एक-दूसरे के प्रति कितने संवेदनशील रहें।
विश्व की सभी ज्ञात और अज्ञात भाषाओं में प्यार अभिव्यक्त करने के लिए कोई न कोई विशेष शब्द या वाक्यांश होता है, जो इस गहन भावना को व्यक्त करता है। हालांकि वाचिक भाषा सबसे आम विधि है, लेकिन प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए कई अन्य रचनात्मक तरीके भी हैं। जैसे, प्रेमपत्र लिखना, कविता के माध्यम से भावनाओं को व्यक्त करना, चित्र या कला के जरिए अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करना, या प्रेम गीत गाना। इन सभी माध्यमों से हम अपने हृदय की कोमलतम भावनाओं को खूबसूरती से व्यक्त कर सकते हैं, जो प्यार की गहराई और जटिलता को समझने में मदद करते हैं।
सौभाग्य से आज एक आंकिक अभिव्यक्ति ज्ञात हुई जिसका उपयोग प्यार का इजहार करने के लिए किया जा रहा है। इस कूट शब्द से कितने लोग इज़हार-ए-'आशिक़ी कर रहे हैं, यह सांख्यिकी विभाग का विषय है और जैसा कि आप जानते हैं, मैं गणित में बहुत पैदल हूँ।मैं इस दुविधा में भी हूँ कि इसे शब्द कहूँ या संख्या! यहाँ एक विशेष संख्या शब्द की बात की जा रही है जो कूट भाषा का-सा लगता है:
शब्द है १४३ (= ILU) !!
इलू तक तो अपनी समझ अपने प्राचीन काल में बन गई थी, (फिल्म सौदागर दिलीप कुमार, राजकुमार)। भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से इलू एक परिवर्णी शब्द है जो अंग्रेजी अभिव्यक्ति "आई लव यू" के आद्यक्षरों से बना है, लेकिन यह १४३ एकदम नया लगा। हो सकता है अपन यहाँ पहुँचने में भी लेट हो गए हों। ऐसे मौकों के लिए प्रसिद्ध शायर मुनीर नियाज़ी साहब कह तो गए हैं:
"बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं"।
जो भी हो, प्रत्येक ज्ञात शब्द से इलू कहने वाले मुझ-जैसे दिलफेंक के सामने समस्या यह है कि आने वाले समय में यदि इसे कोई शब्दकोश में स्थान देना चाहे, तो अकारादि क्रम निर्धारण करने में बड़ी कठिनाई होगी। किसी कोष विज्ञानी के पास संभवतः इसका कोई व्यावहारिक उपाय हो। तब तक इसे फुटकर प्रविष्टि समझ लीजिए। आम खाने वाले गुठलियाँ नहीं गिना करते।
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©सुरेश पंत
(सितंबर 24, 2024)
Sunday, 22 September 2024
तिजोरी से बटुवे तक
Tuesday, 20 August 2024
बुझते शब्द "लादौ" का सफ़र
Sunday, 18 August 2024
भला और भद्दा
Thursday, 18 July 2024
प्रेत चर्चा
किसी ने पूछी है प्रेत की व्युत्पत्ति।
(फोटो सौजन्य Wikicommons)
प्रेत [प्र+√इ(जाना)+क्त], परेत [परा+√इ+क्त]; इस संसार से गया हुआ, मृत, और्ध्वदेहिक क्रिया (मरणोत्तर कर्म) संपन्न किए जाने से पूर्व जीव की अवस्था। नरकस्थ प्राणी। (The departed spirit, the spirit before obsequial rites are performed, deceased).
नरकस्थ प्राणी पर शंका आई कि प्रेत को "नरकस्थ प्राणी" कैसे कहा गया, जब कि यह तो भटकने वाली योनि मानी गई है जिसकी कतिपय कारणों से मुक्ति न हो सकी हो !'
दरअसल प्रेतावस्था एक प्रकार से मुक्ति से पहले का ठिकाना कही जा सकती है। सनातन विश्वास के अनुसार मृत्यु के बाद सपिण्डीकरण या लोकाचार के अनुसार अन्य विहित कर्म सम्पन्न होने के बाद उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और कर्मानुसार 'स्थान' भी। अमरकोष में उल्लिखित प्रेत के अनेक पर्यायों में से एक "नरकस्थप्राणी" भी है।
जानना रोचक होगा कि हमारे पुराणों और अन्य अनेक ग्रंथों में प्रेत की पारलौकिक व्याख्या से अधिक इहलौकिक लक्षण गिनाए गए हैं। जीवित प्रेत के बारे में बहुत सामग्री है। उन लक्षणों के अनुसार तो हम सब भी किसी ने किसी रूप में जीवित प्रेत ही हैं।
Tuesday, 4 June 2024
पाखंड
पाखंड (hypocrisy)
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"पालनाच्च त्रयीधर्म्मः पाशब्देन निगद्यते।
तं खण्डयन्ति ते यस्मात् पाखण्डास्तेन हेतुना॥"
त्रयीधर्म का अर्थ है तीनों वेदों द्वारा निर्धारित आचरण न करना, धर्म का खंडन करना अर्थात वेद विरुद्ध आचरण। इसे ही पाखंड कहा गया है।
मॉनियर विलियम्स के अनुसार वह धर्म विरुद्ध आचरण करने वाला हिंदू पाखंडी है जो बाहरी धार्मिक चिह्न तो धारण करता है किंतु कार्य वेद विरुद्ध करता है। (a heretic, heterodox Hindū, adopting the exterior marks of the classes, but not respecting the ordinances of the
Vedas.)
भक्ति या उपासना जो केवल दूसरों के दिखाने के लिये की जाय और जिसमें कर्ता की वास्तविक निष्ठा अथवा श्रद्धा न हो, बुरे हेतु से ऐसा काम करना जो अच्छे इरादे से किया हुआ जान पड़े। ढोंग, आडंबर, ढकोसला, बगुलाभक्ति, यह सब लक्षण पाखंड के अंतर्गत आते हैं ।
श्रीमद्भागवत में एक कथा आती है कि एक विमुक्त संन्यासी बनकर देवराज इंद्र महाराज पृथु के घोड़े को चुरा कर ले जा रहा था तो भगवान अत्रि ने भगवा वस्त्र और नकली जटाजूट पहने इंद्र के पाखंड को पहचान लिया।
संन्यासी जैसी भगवा वेशभूषा धारणकर वेद विरुद्ध कर्म करना भी पाखंड है। पाखंड का भाँडा एक दिन फूटता ज़रूर है, चाहे इंद्र का ही क्यों न हो।
सुरेश,
४जून, २०२४
Thursday, 16 May 2024
Pleasures of Old Age
Episode 05
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This is about my most esteemed friend, a respected journalist of the bygone era, sadly no more now. This is s penned for me by his darling daughter.]
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“One morning after his hour or so of yoga, followed by meditation and breakfast, my father read a little and then took a little pre-lunch snooze. My sister and I were at work and my mother was in the pooja room.
At lunch time our house help woke my father and told him to freshen up for lunch. He sat up and looked down to find his slippers missing. He immediately complained that while cleaning the floor, she had again pushed them under the bed. She looked under the bed to no avail, and then, equally unsuccessfully, searched the whole room. Now two of them were puzzled.
Then, my father decided to get up without the slippers and shook off the sheet he had draped over himself and lo and behold, the slippers were snug on his feet. The house help, who was very fond of my parents and could growl at them at times like this, growled and sputtered with laughter, “Uncle!!!”.
And in his unique style my father replied, “Arey! Ye yahan kaise aa gai?”
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Episode 06
Old age: Episode 06
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Decades ago a not-so-distant relative of mine, in his sixties, lost his wife. He had two married daughters with their kids. One of his grandchildren was just about two years younger to me.
After a couple of months of bereavement, he started looking for a bride. Finally he got one in her teens, from a very poor family in a far off village. He allegedly offered some money to the poor parents, people used to say.
Anyways, marriage was fixed. It was sensational news in all the neighborhood. Not that people didn't have a second marriage, but the age difference of about 40+ years was the concern. However none could dare to tell him.
Finally people approached one sayana (village elder) to persuade him, to which he agreed reluctantly. Sayana ji went to the house of the bridegroom and told him:
~ देखो बेटे, तुम ठीक नहीं कर रहे हो। अपनी उमर देखो। तुम्हारे लड़की-दामाद हैं, नाती-नातिन हैं। सोचो, लोग क्या कहेंगे?
~ ताऊ जी, लोग जो भी कहें, शादी तो मैं करूंगा। जो मना कर रहे हैं, उन्हें न्योता नहीं दूंगा।
~ लड़का सयाना हो गया है, उसके लिए बहू ढूँढ़ो।
~ उसकी बहू आए और मैं अकेला बाहर ओबरी में सोऊँ! कैसी बात कर रहे हैं आप?
Obviously Sayana ji didn't succeed.
Fortunately this marriage could not happen. Later we heard that the girl had run out of her home to jump into Ramganga to commit suicide. A soldier on his way home saw her jumping from the bridge and ultimately saved her.
Friday, 19 April 2024
अपना बन्ना फूल गुलाबी...
Wednesday, 20 March 2024
नान, नानवाई और हलवाई
Friday, 15 March 2024
बॉन्ड Bond
Monday, 26 February 2024
संस्कृति
📌शब्द विवेक
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💡संस्कार (सम्+√कृ) - सुधारने का कार्य, माँजना, सुधारना , व्याकरण की दृष्टि से ठीक करना, धार्मिक अनुष्ठान।
💡संस्कृत - सुधारा, माँजा हुआ, संस्कार किया हुआ।
💡सुसंस्कृत - सभ्य, अच्छे संस्कारों वाला।
💡संस्कृति - संस्कार की हुई (सुधारी हुई) स्थिति; किसी समाज के विचार-व्यवहार, खानपान, रहन-सहन, आचार-विचार , भाषा-साहित्य, कलात्मक चेतना, परंपरा, चिंतन और अभिव्यक्ति आदि का समग्र।