Thursday, 19 December 2024

महर्षि पाणिनि का अपवाद सूत्र

॥ महर्षि पाणिनि का अपवाद सूत्र ॥
एक मित्र हैं युवा मन, वृद्ध तन। वृद्ध बोले तो वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध , अनुभव वृद्ध। आज उन्होंने फोन पर बताया संस्कृत व्याकरण में एक अव्यय जुड़ गया है। हम चौंक गए कि यह कैसे हो सकता है।
पूछा, कौन सा अव्यय जुड़ गया जिसे पाणिनि बताना भूल गए?
बोले- इदानीम्, तदानीम् को जानते हैं?
~ जानते क्यों नहीं है। इदानीम् इस समय, तदानीम् उस समय...!
~बिल्कुल ठीक इसी तरह से अदानीम् पढ़े हैं कभी?
~ऐसा कोई शब्द हइयै नहीं है तो पढ़ेंगे कैसे?
~वोई तो! अब आ गया है, पढ़ना पड़ेगा।
~यह कोई यूनिवर्सिटी का सिलेबस है क्या कि सरकार बदली तो बदल जाएगा। यह है क्या बला?
~अव्यय है, क्योंकि यह व्यय नहीं करता, इसके लिए सरकार व्यय करती है। सफल अव्यय है अर्थात सबके उपक्रमों और कर्मों का फल इसी को मिलता है।
~पल्ला छुड़ाने के लिए हमने निवेदन किया संस्कृत व्याकरण की गठड़ी तो पाणिनि पक्की गाँठ लगाकर सौंप गए। अब उसको न कोई खोल सकता है, न उसमें कुछ बढ़ा-घटा सकता है। सॉरी, आपकी मेहनत बेकार जाएगी।
बस फिर क्या था, वे आपसे तुम पर आगए।
~तुम संस्कृत वाले नहीं समझोगे। रट-रट के दो अक्षर पढ़ लेते हो, अकल तो है नहीं। तुम्हें मालूम है पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी में सवा-सात अध्याय के बाद क्या कहा है? उन्होंने कहा है "पूर्वत्रासिद्धम्"। अर्थात आगे आने वाले सूत्रों पर अभी तक बताई गई बातें लागू नहीं होंगी।
~ जी, कहा तो है किंतु
~ कोई किंतु-परंतु नहीं। इसी को ध्यान में रखकर कहा है। वे होते तो एक अपवाद सूत्र और बना देते, "राजमित्राय ईमव्ययादेश:", अर्थात् राजा के मित्र को अव्यय बनाने के लिए ईम् आदेश होगा, या ऐसा ही कोई सूत्र।
"हो ही नहीं सकता, आचार्य," हमने पीछा छुड़ाने की नीयत से कहा।
"अरे! (हमें लगा वे अरे मूर्ख! कहना चाहते हैं किंतु अरे के बाद रुक गए) राजा चाहे तो सब कुछ हो सकता है। देखा नहीं तुमने कि धर्मक्षेत्र के एक आश्रम में प्रोफेसर को इस्तीफा देना पड़ा था। इंद्रप्रस्थ के एक विश्वविद्यालय को टुकड़े-टुकड़े करना पड़ा। और भी बहुत से उदाहरण हैं।"
हमने सोचा वे आपसे तुम पर तो आ ही गए थे , अब शीघ्र ही तू तड़ाक वाला रिश्ता बन जाएगा। इसलिए आसमान की ओर हाथ जोड़कर कहा, "आपको मान गए श्रीमान। हमको क्षमा कीजिए"।
उन्होंने सुर बदलते हुए कहा क्षमा बाद में करेंगे, पहले आप इन अव्यय वाक्यों को रट लीजिए -
इदानीम् पश्य।
तदानीम् पश्य।
अदानीम् पश्य।
और हम रट रहे हैं-
अदानीम् पश्य। अदानीम् पश्य। अदानीम् पश्य।

Sunday, 15 December 2024

शतरंज के भारतीय विश्व चैंपियन का नाम

कुछ लोगों ने शतरंज के विश्व चैंपियन गुकेश के नाम की व्युत्पत्ति पूछी है। सामान्यतः नाम और ग्राम की व्युत्पत्ति पर विचार नहीं किया जाता, नामग्रामयोर्व्युत्पत्तिर्नास्ति। नाम जो है, वही ठीक है। अर्थ भी वही है जो नामधारक स्वयं है।

फिर भी यदि गुकेश की व्युत्पत्ति बताना आवश्यक हो तो मेरे विचार से उसे "गुडाकेश" का मिश्रित शब्द (portmanteu) कहा जा सकता है! ( पोर्टमेंट्यू कााअर्थ है दो शब्दों की ध्वनियों को मिलाकर बनाया हुआ नया शब्द। जैसे अंग्रेजी में स्मोक और फॉग से स्मॉग)

गुडाकेश अर्जुन का प्रसिद्ध नाम है और शिव का भी। गुडाकेश की व्युत्पत्ति दो प्रकार से की जाती है। गुडाका+ईश, अर्थात् गुडाका (=नींद और आलस्य) को जिसने जीत लिया है। किसी भी कौशल में विश्व प्रसिद्ध बनने के लिए गुडाका (नींद और आलस्य) को जीतना पड़ता है, और साधना करनी पड़ती है जो इस खिलाड़ी ने भी की होगी। इसलिए गुडाकेश।

गुडाकेश का दूसरा अर्थ है गुडा+केश। गोल गुच्छेदार , काले, चमकीले बालों वाला, जटायुक्त केश वाला।
इसलिए भी यह नाम उपयुक्त है, निरर्थक नहीं। 
महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि हम हिंदी या संस्कृत के दृष्टिकोण से व्युत्पत्ति ढूँढ रहे हैं। खिलाड़ी की मातृभाषा में इसकी भिन्न व्युत्पत्ति संभव है।

जैसा कि प्रारंभ में ही कहा गया, नाम की कोई व्युत्पत्ति या अर्थ अवश्य हो, यह आवश्यक नहीं है। नाम तो "मुकेश" भी व्याकरण सिद्ध नहीं, लोक सिद्ध है। मुकेश का कोई शाब्दिक अर्थ नहीं होता लेकिन यह नाम पूरे भारत में मिलेगा। 
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Thursday, 28 November 2024

दाढ़ी बनाना और बढ़ाना


उस्तरे या ब्लेड से गाल, होंठ, ठोड़ी पर उगे बालों को छील-छालकर साफ़ करने के लिए हिंदी में दाढ़ी 'बनाना' क्रिया है जब कि इसमें 'बनाने' जैसा कुछ भी नहीं। इसके विपरीत इसके अंग्रेजी पर्याय shaving में शाब्दिक अर्थ बना रहता है, " to remove the hair or beard off with a razor." (OED)

(फोटो सौजन्य: विकीकॉमंस)
दाढ़ी छीलने के लिए अंग्रेजी में एक पारिभाषिक शब्द है– pogonotomy (the act of cutting or shaving a beard.)  यह ग्रीक शब्द pogon (दाढ़ी) +tonia (काटना ) से व्युत्पन्न है।

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संस्कृत में दाढ़ी-मूँछ को श्मश्रु कहा जाता है और इन्हें काटने-बनाने वाले कारीगर (नाई, barber) को संस्कृत में नापित कहते हैं। नापित सेे ही हिंदी आदि अनेक भाषाओं में 'नाई' शब्द बना है।

नापित (नाई) का एक रोचक पर्याय है- 'श्मश्रुवर्धक' (आप्टे)। श्मश्रुवर्धक का शाब्दिक अर्थ है– दाढ़ी (श्मश्रु) को बढ़ाने वाला (वर्धक), दाढ़ी को पाल-पोसकर बड़ा करने वाला। यह कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे दिया बुझाने को कहा जाता है– दिया बढ़ाना। अन्य पर्याय हैं– वपन, परिवापन, भद्राकरण आदि। वपन, परिवापन भी वप् धातु से बने हैं जिसका मूल अर्थ है बोना, उगाना। वप् से ही बाप बना है! चौंकिए नहीं, कुछ भाषा प्रयोग बड़े रोचक होते हैं।

 इस काम के लिए एक अन्य शब्द क्षौर कर्म भी है। क्षौर कर्म के अंतर्गत मुंडन के साथ-साथ अनेक क्रियाएँ आ जाती हैं, केशश्मश्रुनखादीनां कर्त्तनं संप्रसाधनम् । अर्थात क्षौर के अंतर्गत केश, दाढ़ी-मूँछ, नाखून आदि काटकर सजना-सँवरना आदि क्रियाएँ मानी गई हैं। 

अरबी से हिंदी-उर्दू में आया हुआ "हजामत" भी लगभग ऐसा ही है। इसलिए "दाढ़ी बनाना" उपयुक्त है। ढूँढाड़ी में दाढ़ी बनाने के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है– सुँवार बनाना, सुँवारना। सुँवार शब्द 'सँवरने' का ही स्थानीय रूप है।


Tuesday, 12 November 2024

कुमाऊँ में बसंत और पतझड़



पहाड़ की मुख्य ऋतुएँ हैं :
१.बसंत, 
२. रूड़ (ग्रीष्म), 
३.चौमास (वर्षा + शरद), 
४. ह्यून (हेमंत + शिशिर)
चौमास की सीमा शरत्काल तक खिंचती है और ह्यून की हेमंत से शिशिर तक।
वसंत और पतझड़ के लिए कोई स्वतंत्र शब्द कुमाउँनी में नहीं हैं। अर्थ विस्तार या लाक्षणिक शब्दों से काम चलाया जाता है। जैसे:
पौयीण/पौलीण/पौल्यार, पालूँ (पल्लवन, नई कोंपलें आना), संस्कृत पल् + लव = पल्लवन से।
पौल/पौय - पौयीण दिन, पल्लवित होने के दिन, पौल्यार अर्थात वसंत ऋतु।
झरण (झरना, गिरना, टपकना) से झऱ्यौ , पत्ते झरने के दिन। अर्थात पतझड़।
झार्य और पौय शब्द इन्हीं के आंचलिक रूप लगते हैं। कुछ सीमित क्षेत्रों को छोड़कर इन शब्दों का प्रयोग नहीं होता। व्यवहार में ये दोनों शब्द दुर्लभ हैं। इनके स्थान पर हिंदी के बसंत और पतझड़ शब्द ही अधिक प्रचलित हैं।

Tuesday, 22 October 2024

हरसिंगार और सप्तपर्णी

हरसिंगार और सप्तपर्णी
कुछ लोग हरसिंगार (पारिजात) की गंध को शरद ऋतु की गंध मानते हैं। निःसंदेह मनभावन है, मधुर भी। मुझे जाने क्यों लगता है कि इसमें आभिजात्य की ठसक है। समुद्र मंथन में देवताओं के साथ जन्म लेने से कुलीनता का अहंकार । इंद्र की बगिया में खिलने का अभिमान। जाने कैसा कौमार्य का गर्व है कि आधी रात चुपचाप खिलो और भोर होते बिखर जाओ कि जो स्वर्ग के देवताओं के लिए बना हो उसे धरती पर कोई मनुष्य छू न ले।

 
हरसिंगार की गंध आम जन की गंध हो ही नहीं सकती।
मेरा मानना है कि छितवन (सप्तपर्णी) की गंध शरद ऋतु की गंध है- मादक। सारी रात दूर-दूर तक महका देने वाली। शयनकक्ष के गवाक्षों से भीतर पहुँच जाए तो जोड़े मचल उठें। ऐसी समर्थ कि आसपास खिले दस हरसिंगार लजा जाएँ।
देवालय के लिए हरसिंगार उपयुक्त हो सकता है लेकिन मुझ जैसे चिर श्रमिक को छितवन प्रेरणा देता है, शक्ति देता है। ललकारता है आओ, उठो मेरी ही तरह। ऐसा कुछ करो कि अंधकार भी गमक उठे। भोर हो तो लोग तुम्हें पाने के लिए ललचाएँ। ऊँची डालियों पर खिलो कि लोग ईर्ष्या करें पर तुम्हारा कुछ बिगाड़ न पाएँ। ऊँचे उठोगे तो छोटी-मोटी बाधाओं से दूर रहोगे। वरना हरसिंगार की भाँति दुर्बल बाहु रह जाओगे।


तुम पर चाहे कोई कवि एक पंक्ति न लिखे, चिंता मत करो। स्वयं अपना रास्ता बनाओ और अपना होना सिद्ध करो। 

Sunday, 20 October 2024

चौथ का चाँद

(प्रतीकात्मक फोटो गूगल से)
 भारत में विवाहित स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है। चौथ के दिन दिन भर व्रत रखकर शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद उसे अरगड़े कर ही व्रत खोला जाता है। करवा चौथ पर रीति कवि बिहारी की कल्पना बड़ी मनोरम है।
"तूँ रहि हौं ही सखि लखौं
चढ़ि न अटा बलि बाल।
सबही बिनु ससि ही उदै
दीजतु अर्घ अकाल॥
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बिहारी के ही एक अन्य दोहे में सखियाँ चंद्रमुखी नायिका से कहती हैं- चाँद देख लिया, अब संकट चतुर्थी का व्रत खोलने छत से नीचे चलो ताकि और नारियाँ भी एकचित्त होकर चाँद को देख सकें। तुम छत पर रहोगी तो वे दुविधा में पड़ जाएँगी कि चाँद तुम हो या आसमान वाला। तुम्हारा चाँद-सा मुखड़ा देखकर उन्हें यह दुविधा भी हो सकती है कि चौथ का चाँद तो पतला होता है, लेकिन आज चौथ के दिन पूरी गोलाई का चाँद कैसे उग आया। इसलिए -
दियौ अरघु नीचे चलौ, संकटु भानैं जाइ।
सुचिती ह्वै औरौ सबै ससिहिं बिलोकैं आइ॥
🌒
महाकवि कालिदास ने भी एक अन्य प्रसंग में ऐसा ही कहा है। चंद्रग्रहण की वेला है। नायिका बाहर घूम रही है। ऐसे में अगर राहु ने उसे ही चंद्रमा समझकर, या चंद्रमा से भी अधिक सुंदर समझ कर उसे निगल लिया तो मुसीबत हो जायेगी।
झटिति प्रविश गेहे मा बहिस्तिष्ठ कान्ते, ग्रहणसमय बेला वर्त्तते शीतरश्मेः। तवमुखमकलङ्कं वीक्ष्य नूनं स राहुः, 
ग्रसति तब मुखेन्दुं पूर्णचन्द्रं विहाय॥
"हे सुंदरी! बाहर मत बैठो, जल्दी-जल्दी घर के अंदर घुस जाओ। चंद्रग्रहण का समय चल रहा है। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा देदीप्यमान मुखमंडल देखकर राहु चंद्रमा को छोड़कर तुम्हें ही जकड़ ले।"
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और इस नायिका ने तो कमाल ही कर दिया। उसके घर के आस-पास पूरे मोहल्ले में हर रात पूनम का चांद चमकता है। लोगों को समस्या है कि पूर्णिमा तिथि किस दिन मानें। निदान उन्हें पंचांग का महत्व समझ में आया कि पूर्णिमा जाननी हो तो भाई, पत्रा-पंचांग में ढूँढ़ लो। मोहल्ले में तो उस मुखड़े की चमक-दमक से रोज़ चाँदनी ही चाँदनी है।
पत्रा ही तिथि पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पून्यौई रहै, आनन-ओप-उजास॥
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Friday, 18 October 2024

चेतावनी : व्याकरण न जानने से होगी दुर्गति

व्याकरण न जानने से होगी दुर्गति 
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व्याकरण न जानने वाले का विवाह होना कठिन हो सकता है। यह कथा तो सब जानते हैं कि कुछ धूर्त पंडितों ने छल करके विद्योतमा का विवाह मूर्ख कालिदास से कर दिया था जिसका उच्चारण तक शुद्ध नहीं था। इस कन्या को संभवतः मालूम था कि विद्योत्तमा के साथ धोखा हुआ, इसलिए उसने स्वयं दूल्हे की परीक्षा ली और उसे घोषणा करती पड़ी -
"यस्य षष्ठी चतुर्थी च विहस्य च विहाय च।
यस्याहं च द्वितीया स्यात् द्वितीया स्यामहं कथम्।।"
'जिसके लिए विहस्य, विहाय और अहम् पद क्रमशः षष्ठी, चतुर्थी और द्वितीया विभक्ति के रूप हों, मैं उसकी द्वितीया (पत्नी) कैसे बन सकती हूँ!'
एक पिता ने सोचा अपनी विदुषी कन्या के लिए स्वयं दूल्हे की परीक्षा लेंगे। दुर्भाग्य से व्याकरण न जानने से होने वाले जँवाईं राजा की बड़ी हँसी हो गई। परीक्षक ने घोषणा की- 
अजर्घा यो न जानाति 
यो न जानाति वर्वरी।
अचिकमत यो न जानाति 
तस्मै कन्या न दीयताम् ॥
अजर्घा, वर्वरी और अचिकमत इन पदों की सिद्धि जो लड़का न जानता हो उसे कन्या नहीं देनी चाहिए।
( न त्वम् अजर्घाः कस्यचिद् धनं बाल्ये। 
अचीकमत न त्वद्यापि ते चित्तम्।)
एक पिता अपने पुत्र से निवेदन करते हुए कहते हैं - 
यद्यपि बहुनाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
स्वजनः श्वजनः मा भूत् सकलः शकलः सकृत्छकृत्।।
बेटे, व्याकरण इसलिए भी पढ़ो कि उच्चारण में स और श का अंतर न जानने से ही अनर्थ हो सकता है। जैसे:
स्वजन – संबंधी, श्वजन – कुत्ता।
सकल – सम्पूर्ण, शकल – खण्ड। 
सकृत् – एक बार, शकृत् – विष्ठा।

राजा भोज तो बहुत शिक्षित और विद्वान था, कहते हैं उसके राज्य में सब संस्कृत बोलते-समझते थे, लेकिन एक बार व्याकरण की अशुद्धि के कारण स्वयं राजा भोज को एक लकड़हारिन से अपमानित होना पड़ा था। उसने देखा एक लकड़हारिन ने इतना भारी बोझ उठा रखा था कि बेचारी को चलना कठिन हो रहा था। प्रजा का दुख न देख पाने के स्वभाव से भोज पूछ बैठा -
"भूरिभारभराक्रान्तस्तत्र स्कन्धो न बाधति?   
न तथा बाधते राजन् यथा बाधति बाधते॥"
संवाद का आशय कुछ इस प्रकार है -
भोज~ भारी बोझ उठाते तुम्हारे कंधे नहीं दुखते?
लकड़हारिन~ महाराज, बोझसे उतना नहीं दुखते। मैंने तो अभी आपके मुँह से 'बाधते' के स्थान पर 'बाधति' सुना और व्याकरण की ऐसी अशुद्धि सुनकर मुझे सिर पर रखे बोझ से भी अधिक कष्ट हो रहा है!
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१८ अक्टूबर '२४

Wednesday, 16 October 2024

कोजागरी, खीर और रोटी

कोजागरी, खीर और बेड़ईं रोटी
आश्विन पूर्णिमा को कुमाऊँ, नेपाल, महाराष्ट्र में "कोजागरी" [< 'क: (को) जागर्ति' से व्युत्पन्न] के नाम से जाना जाता है! लोकविश्वास है कि इस रात को लक्ष्मी स्वयं घर-घर घूमकर देखती हैं कि कौन उनकी प्रतीक्षा में जागा हुआ है ' को जागर्ति'। बिहार में, विशेषकर मिथिला में, इसे कोजागरा के नाम से मनाते हैं। नवविवाहित जोड़ों की ओर से तांबूल (पान), बतासा और मखाना वितरित किया जाता है। इसे विवाह के बाद का पहला सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है!
मराठियों में इस पर्व को कोजागिरी कहा जाता है। चन्द्रोदय के उपरांत, श्वेत वस्त्र धारी लक्ष्मी का पूजन होता है और प्रसाद में खीर , बर्फ़ी आदि अनेक प्रकार की सफेद वस्तुओं का भोग लगाया जाता है। सबसे मज़ेदार बात यह कि परिवार में पहली (ज्येष्ठ) सन्तान की आरती उतारी जाती है और उसे परिवार के सभी बड़ों से त्योहारी मिलती है। यह प्रिविलेज छोटे भाई-बहनों के लिए ईर्ष्या और झगड़े का एक कारण बन जाता है।
कुमाऊँ में एक पुराना रिवाज़ यह था कि इस दिन रात को उड़द की पिट्ठी से बेड़ईं रोटी अवश्य बनाई जाती थी। "भाव प्रकाश" में इसे बलभद्रिका रोटी कहा गया है। उल्लेख कुछ यों है:
“चूर्णं यच्छुष्कमाषाणां चमसी साभिधीयते।
चमसीरचिता रोटी कथ्यते बलभद्रिका॥"
(शब्दकल्पद्रुमुम)
अर्थात मास की पिट्ठी को चमसी कहा जाता है और चमसी से बनी रोटी का नाम है बलभद्रिका। संकेत यह भी है कि बलभद्रिका बेड़ई रोटी बल बढ़ाने वाली होती है।


किसी कवि ने इसे "चंद्रबदनी रोटी" भी कहा है।
गोधूमचूर्णचयचारुसुधाकराभा माषप्रचूर्णलवणार्द्रकहिङ्गुगर्भा । हैयङ्गवीनकृतमार्जनकोमलाङ्गी
रोटी मुखे विशतु पुण्यवतां जनानाम् ॥
अर्थात "दाल की पिट्ठी, नमक, अदरक, हींग को अपने उदर में समेटे हुए, ताज़ा घी से चुपड़ी, कोमलांगी, चाँद-सी गोरी, गेहूँ के आटे से बनी विशेष रोटी सभी पुण्यवान लोगों के मुँह में प्रवेश करे।"
शरद पूर्णिमा को अमृत काल कहकर रात भर खुले में रखी खीर सुबह खाना कभी स्वास्थ्यवर्धक रहा होगा, किंतु आज प्रदूषण के कारण एक रात में उसमें ढेर सारा अपद्रव्य मिल जाएगा। प्रदूषित खीर खाने से अच्छा है घर के भीतर बनी ताजी बलभद्रिका (बेडमी) रोटी खाना!
रुचि और वरीयता आपकी।

Sunday, 13 October 2024

सौगंध, सौगंध

बहुत-सी भारतीय भाषाओं में क़सम खाई जाती है, जबकि क़सम कोई खाद्य पदार्थ नहीं है। क़सम के साथ खाना क्रिया जोड़ने का संबंध एक प्राचीन ईरानियन प्रथा से है। एक जोरास्त्रियन (पारसी) रिवाज़ था जिसके अनुसार कसम खाने का कर्मकांड पवित्र जल के साथ रोटी खाकर संपन्न होता था। यह ऐसे ही है जैसे भारत में हाथ में गंगाजल लेकर, जनेऊ को हाथ से पकड़ते हुए, गीता थामकर, आग को साक्षी मानकर या और किसी तरीके से कसम खाई जाती है। यह न हुआ तो राम कसम, गीता कसम, बाप कसम, माँ कसम, गौमाता कसम कहकर। सिर की कसम खाना तो आम बात है।
पहलवी से चलकर फ़ारसी में आते आते क़सम खाने के इस कर्मकांड को सौगंदख़ुर्दम" (सौगंध खाना) कहा गया। फ़ारसी से हिंदी/उर्दू में क़सम (अरबी) के साथ भी खाना क्रिया लग गई। देखा-देखी शपथ (संस्कृत) भी खाई जाने लगी।
तर्क है- "संभव है कि सौगंध (अच्छी गंध ) से किसी क्षेत्र विशेष में कोई शपथ जुड़ी ही हो जिसकी हमें जानकारी न हो। या संभव है कि किसी फूल (जैसे कमल!) से कोई शपथ जुड़ी है और शपथ के साथ उस फूल को खाया जाता हो।"
शपथ के लिए एक हिंदी शब्द है "सौंह"। वीरवल्ली आर जगन्नाथन ("छात्र कोश") तथा कुछ अन्य हिंदी कोश इसे "सौगंध" से व्युत्पन्न मानते हैं किंतु यह संस्कृत शपथ से व्युत्पन्न होता है। संस्कृत शपथ प्राकृत में सवहो/ सवहं हिंदी में सौंह, सौं, सूँ। संस्कृत शब्दकोशों में सौगंध शब्द प्राप्त नहीं होता। यदि गंध से 'सु' जोड़कर किसी प्रकार (बलात्) सिद्ध कर भी लें तो गंध/ सुगंध का भाव शपथ, कसम में किसी प्रकार नहीं आता। इसे समरूपी भिन्न मूलक या भ्रामक व्युत्पत्ति का शब्द मान सकते हैं।
यह जानना रोचक होगा के सौगंध चाहे राम की खाएँ या संविधान की, यह शब्द हिंदी में फ़ारसी से आया है। फ़ारसी में सौगंद है, अर्थ है शपथ, क़सम। बलात् तत्समीकरण की प्रवृत्ति से ढलकर सौगंध हो गया है। यह बात और है कि इसमें न गंध है, न सुगंध।
संस्कृत में सौगंधिक (सुगन्ध + ठन् + अण्) या सौगन्ध्य (सुगन्धस्य भाव:) जैसे शब्द हैं जिनमें कुछ प्रत्यय जुड़ने पर वृद्धि हो जाती है। इन्हीं के अनुकरण पर हिंदी में सौगंध शब्द सौगंध के लिए गढ़ लिया गया है।

Friday, 11 October 2024

अपराजिता

अपराजिता : एक पुष्प अनेक नाम
यों तो अपराजिता खर-पतवार की तरह उगने वाली बेल है किंतु उद्यानों की सजावट तथा छतों-बालकनियों के गमलों की शोभा भी है। आर्द्र-उष्ण जलवायु का पादप है और इसका मूल उद्गम इंडोनेशिया माना जाता है।
अपराजिता की प्राचीनता और लोकप्रियता का एक प्रमाण तो इसके अनेक नाम होना है। आकृति, रंग आदि के अनुसार लोगों ने बड़े रोचक नाम दिए हैं।
आकृति के अनुसार- गोकर्ण, शंखकर्ण, शंखपुष्पी , Clitoria ternatea (स्त्री जननांग के समान आकृति के कारण), butterfly pea (तितली फूल), Asian pigeonwings (कबूतर के पंख)। अंग्रेजी में अन्य नाम हैं - bluebellvine, blue pea, butterfly pea, cordofan pea और Darwin pea.
रंग के अनुसार- नीलपुष्प, नीलशंख, नीली।
वैष्णवों के लिए- विष्णु प्रिया, विष्णुकांता, विष्णुवल्लभा।
अपराजिता की एक दूसरी प्रजाति सफ़ेद रंग की भी होती है - जिसे शंखपुष्पी कहा जाता है। आयुर्वेद में शंखपुष्पी को बल-वीर्य वर्धक माना गया है और इससे अनेक दवाइयाँ बनती हैं।
अपराजिता का बायोलॉजिकल नामकरण- "Clitoria" १६७८ में पोलैंड के एक पादप वैज्ञानिक ने किया था। उससे सदियों पहले भावप्रकाश में कुछ यों वर्णन है 
"लताविशेष: श्वेतापराजिता । अस्य पुष्पं योन्याकारं भवति" !
 अर्थात इसका फूल योनि के आकार का होता है।
श्वेत पुष्प वाली अपराजिता को शंखपुष्पी भी कहा जाता है । इसके कुछ अन्य नाम हैं - शेफालिका, जयन्ती, असन, शङ्खिनी, हपुषा, असनपर्णी, गिरिकर्णी, अद्रिकर्णी, नगकर्णी।
अपराजिता का फूल विष्णु, काली, शनि और शिव की पूजा में विशेष रूप से प्रयुक्त होता है। स्कंद पुराण में विजयादशमी के दिन अपराजिता की पूजा का विधान है।
दशम्यां च नरैः सम्यक् पूजनीयाऽपराजिता।
ददाति विजयं देवी पूजिता जयवर्धिनी ॥
पूजा के अतिरिक्त टोने-टोटके और तंत्र साधना में अपराजिता फूल का महत्व बताया जाता है। 
आयुर्वेद में इसके विविध उपयोग हैं। इसे शीतल, कड़वी, पित्त विकार शांत करने वाली, आँख के रोग दूर करने वाली और त्रिदोष (वायु-पित्त-कफ) को शांत करने वाली कहा गया है।
गिरिकर्णी हिमा तिक्ता पित्तोपद्रवनाशिनी । 
चक्षुष्यविषदोषघ्नी त्रिदोषशमनी च सा ॥
आज के वैज्ञानिक स्रोतों के अनुसार भी अपराजिता के फूल में एंटीऑक्सीडेंट्स की भरमार बताई जाती है। इसलिए हर्बल चाय (नीली चाय )के रूप में भी इसका सेवन किया जाता है। कहीं-कहीं चावल (भात) को रँगने के काम भी आती है।

Wednesday, 9 October 2024

लफड़ा

लफड़ा (لپھڑا)
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वहिद अंसारी बुरहानपुरी साहब फ़रमाते हैं:
"गधे को बाप कहती है ये दुनिया वक़्त पड़ने पर
अमल तू भी करे इस पर तो लफ़ड़ा हो नहीं सकता"
लफड़ा शब्द मुंबइया हिंदी से मुख्य धारा हिंदी, उर्दू में आया है। मुंबई वाले इसे गुजराती 'लफड़ो' (લફડો) से मानते हैं। 
झगड़ा-झमेला के लिए लफड़ा शब्द का अब बोलचाल में बहुत प्रयोग होने लगा है। लफड़ा को कुछ यों परिभाषित किया जा सकता है- विवाद, कहासुनी, टीका-टिप्पणी, गाली-गलौच, झगड़ा, झंझट, नोंक-झोंक, गरमा-गरमी से आरंभ होकर गुत्थम-गुत्था, जूतमपैजार, पत्थरबाज़ी, दंगा, मार-कूट तक पहुँच जाने वाले झगड़े को लफड़ा कहा जाता है।
~ मंदिर के पास लफड़ा हो गया था, दूसरे रास्ते से आना पड़ा। (दंगा)
~ बहस में मत पड़ो, लफड़ा हो जाएगा। (झगड़ा)

स्वजनों या समाज की अस्वीकृति के बावज़ूद हुए छिपे प्रेम संबंध के लिए भी लफड़ा शब्द है।
~ बॉस और उनकी सेक्रेटरी के बीच लफड़ा चल रहा है।
~ साफ-साफ बताओ, किसी लफड़े में तो नहीं पड़ गई?
ऐसे ही प्रयोगों के आधार पर एक लोक व्युत्पत्ति का दावा है कि इसे फ्रांसीसी शब्द l'affaire (अर्थात् अवैध यौन संबंध) से उधार लिया गया है। इस अर्थ में इसकी व्युत्पत्ति अंग्रेजी love से भी संभव है। लेकिन ये भ्रामक व्युत्पत्तियाँ लगती हैं।
इधर हल्के-फुल्के भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी फिल्मी गानों में लफड़ा का प्रयोग बहुत होने लगा है।
व्यक्तिगत जीवन में या समाज में शांति के लिए लफड़े से दूर रहना ही ठीक है। क्या आपका कोई लफड़ा चल रहा है?
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Tuesday, 24 September 2024

प्यार का एक कूट शब्द

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प्यार प्रकृति की ओर से मनुष्य को दी गई संभवतः पहली और सबसे अनूठी सौगात है। यह एक ऐसी भावना है जो आदिम युग से लेकर आज तक जीवित है, न केवल मानवों में, बल्कि प्रकृति के अन्य जीवों में भी। प्यार का यह बंधन जीवन को संजीवनी प्रदान करता है और समाज को जोड़ने का कार्य करता है। इसके बिना, जीवन की कल्पना करना भी कठिन है। आधुनिक युग में, तकनीकी विकास के साथ-साथ यांत्रिक मनुष्य में भी प्यार के भावों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा लगता है कि चाहे कितनी भी प्रगति कर लें, प्यार की गहराई और उसकी महत्ता कभी कम नहीं होगी। यह हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हमारे संबंधों का अभिन्न हिस्सा बना रहेगा। इसलिए, प्यार का यह रूप और उसकी संवेदनशीलता हमें सिखाती है कि हम अपनी भावनाओं को कैसे व्यक्त करें और एक-दूसरे के प्रति कितने संवेदनशील रहें।


विश्व की सभी ज्ञात और अज्ञात भाषाओं में प्यार अभिव्यक्त करने के लिए कोई न कोई विशेष शब्द या वाक्यांश होता है, जो इस गहन भावना को व्यक्त करता है। हालांकि वाचिक भाषा सबसे आम विधि है, लेकिन प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए कई अन्य रचनात्मक तरीके भी हैं। जैसे, प्रेमपत्र लिखना, कविता के माध्यम से भावनाओं को व्यक्त करना, चित्र या कला के जरिए अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करना, या प्रेम गीत गाना। इन सभी माध्यमों से हम अपने हृदय की कोमलतम भावनाओं को खूबसूरती से व्यक्त कर सकते हैं, जो प्यार की गहराई और जटिलता को समझने में मदद करते हैं।


सौभाग्य से आज एक आंकिक अभिव्यक्ति ज्ञात हुई जिसका उपयोग प्यार का इजहार करने के लिए किया जा रहा है। इस कूट शब्द से कितने लोग इज़हार-ए-'आशिक़ी कर रहे हैं,  यह सांख्यिकी विभाग का विषय है और जैसा कि आप जानते हैं, मैं गणित में बहुत पैदल हूँ।मैं इस दुविधा में भी हूँ कि इसे शब्द कहूँ या संख्या! यहाँ एक विशेष संख्या शब्द की बात की जा रही है जो कूट भाषा का-सा लगता है:
शब्द है १४३ (= ILU) !!


इलू तक तो अपनी समझ अपने प्राचीन काल में बन गई थी, (फिल्म सौदागर दिलीप कुमार, राजकुमार)। भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से इलू एक परिवर्णी शब्द है जो अंग्रेजी अभिव्यक्ति "आई लव यू" के आद्यक्षरों से बना है, लेकिन यह १४३ एकदम नया लगा। हो सकता है अपन यहाँ पहुँचने में भी लेट हो गए हों। ऐसे मौकों के लिए प्रसिद्ध शायर मुनीर नियाज़ी साहब कह तो गए हैं:
"बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं"।


जो भी हो, प्रत्येक ज्ञात शब्द से इलू कहने वाले मुझ-जैसे दिलफेंक के सामने समस्या यह है कि आने वाले समय में यदि इसे कोई शब्दकोश में स्थान देना चाहे, तो अकारादि क्रम निर्धारण करने में बड़ी कठिनाई होगी। किसी कोष विज्ञानी के पास संभवतः इसका कोई व्यावहारिक उपाय हो। तब तक इसे फुटकर प्रविष्टि समझ लीजिए। आम खाने वाले गुठलियाँ नहीं गिना करते।
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©सुरेश पंत 

(सितंबर 24, 2024)

Sunday, 22 September 2024

तिजोरी से बटुवे तक

तिजोरी से बटुवे तक 
तिजोरी' अंग्रेजी के treasury का हिंदीकरण है जो फ़्रांसिसी मूल का शब्द है जिसका अर्थ है ख़ज़ाने के लिए कमरा।
'गल्ला' अरबी से आगत शब्द है। अर्थ है अन्न, अनाज, धन धान्य। अर्थ विस्तार से नकदी, cash, कोष, भंडार, खाता भी गल्ला हो गए।
गुल्लक अरबी भाषा से नहीं, संभवतः संस्कृत 'गोलक' से है। संस्कृत में इसका अर्थ काठ की गोलाकृत गेंद या गोला है।
हिंदी में गुल्लक वह संदूक या थैली जिसमें बिक्री द्वारा या और किसी प्रकार आई हुई आमदनी या बचत रखी जाती है। लगता है पहले इस थैली/संदूकची की बनावट गोल होगी, इसलिए गुल्लक।
इसी वर्ग का एक अन्य शब्द बटुवा, संस्कृत वर्तुल (गोल) से विकसित है। जेबी थैली; कपड़े, चमड़े या किसी और वस्तु से बनी जिसके भीतर छोटी जेबें बनी होती हैं। इनमें पैसे, अन्य छोटी-छोटी चीज़ें रखी जाती हैं। प्रायः इनके खोलने-बंद करने के लिए दो डोरियाँ नाड़े के समान फँसाई होती हैं।
मेहमानों को देने के लिए भी बटुवा विशेष उपहार हुआ करता था।भोपाल में सोने-चाँदी के तारों से इन्हें तैयार किया जाता था। रंग-रूप, बनावट के साथ इसके विविध नाम भी हैं- जैसे इजिप्शियन पोटली, पॉकेट कॉस्मेटिक बैग, वेल्वेट पाउच, यूटिलिटी पाउच, डोमेस्टिक कैरी बैग, वैनिटी बैग।


Tuesday, 20 August 2024

बुझते शब्द "लादौ" का सफ़र

बुझते शब्द "लादौ" का सफ़र 

पिथौरागढ़ से युवा मित्र प्रशांत उप्रेती ने आज एक ऐतिहासिक और बड़े रोचक शब्द की याद दिलाई। शब्द है "लादौ"! उन्होंने अपनी वृद्धा दादी के मुँह से सुना था। सुनकर मैं तो उस स्थिति में पहुँच गया जिसको अंग्रेजी में नॉस्टैल्जिक कहते हैं। लगा जैसे स्मृतियों की पुरवा का झोंका आ गया। 

कोई बारह बरस का था जब अपने मामा जी के मुँह से यह शब्द सुना था। संस्कृत के आचार्य थे और कोर्ट कचहरी के शब्दों से भी परिचित थे। उस ज़माने तक अदालत की भाषा में अरबी-फ़ारसी के शब्द सर्वाधिक थे, जिन्हें आजकल उर्दू के शब्द कहा जाता है। 

कहीं आप लादौ को लादना क्रिया का विध्यर्थक रूप न समझ लें । लादना क्रिया से इसका दूर-दूर का संबंध नहीं है। यह कानूनी प्रक्रिया का शब्द है और इसका संबंध पारिवारिक कानून से अधिक है। यह शब्द पुराने ज़माने में (लगभग एक सदी पहले तक) कुमाऊँ में तलाक के अर्थ में सुना जाता था। लादौ अर्थात पति और पत्नी का विधि या नियम के अनुसार वैवाहिक संबंधों का पूर्ण विच्छेद। चूँकि तब तलाक की घटनाएँ बहुत कम होती थीं, इसलिए यह शब्द भी लगभग अप्रचलित था। कानाबाती में कभी ज़िक्र किया जाता था, "फलाणोंक् लादौ हैगो बल"! (फलाने का लादौ हो गया ")।

आज लादौ शब्द सुनते ही जिज्ञासा हुई कि आखिर शब्द बना कैसे, आया कहाँ से और कुमाउँनी में कैसे पहुँचा। कुछ देर सिर खुजाते हुए जो खोज-बीन की गई उसका परिणाम आपके सामने है।
'दावा' (دَعْویٰ) शब्द को तो आप जानते हैं। अरबी से आया हुआ, कानून का शब्द है। दावा का अर्थ है किसी व्यक्ति अथवा वस्तु पर अपना वैध अधिकार चाहना, इस बात के लिए न्याय की शरण में जाना। 
दावा से बनता है 'ला-दावा' (لا دَعْوٰی), वह दस्तावेज़ जिसमें किसी स्वामित्व से हट जाने की प्रतिज्ञा हो। 'ला-दावा देना' अर्थात दावा न होने का दस्तावेज़ लिख देना, अधिकार छोड़ देना, दावे से हाथ उठा लेना (relinquish one's claim upon)।

रही बात कि यह अरबी शब्द सुदूर कुमाऊँ में कैसे आ गया। इसके उत्तर में पहले तो यह बात ध्यान में रखने की है कि शब्दों के लिए भौतिक या भौगोलिक दूरियां कोई महत्व नहीं रखती। हमें पहाड़ी सामाजिक जीवन की पृष्ठभूमि को थोड़ा समझना पड़ेगा। पहाड़ की प्रारंभिक न्याय व्यवस्था में प्रमुख थी दैवी न्याय की। किसी स्वनामधन्य स्थानीय देवता के पास तक अपनी शिकायत पहुँचा देना, उसके मंदिर में जाकर ऊँचे स्वर में अन्याय की पूरी बात सुनाकर फैसला उसी देवता पर छोड़ देना। दूसरी व्यवस्था गाँव के बड़े-बूढों से मामले का निपटारा करवाना। आजकल की पंचायती व्यवस्था से इसकी तुलना कर सकते हैं। तीसरी व्यवस्था थी राजा तक अपनी शिकायत पहुँचाना जो सर्व सुलभ नहीं थी। इसलिए आम लोग दैवी न्याय पर अधिक विश्वास करते थे। जैसे गोलू देवता को आज भी न्याय का देवता माना जाता है।
दिल्ली दरबार में मुसलमान शासकों के आ जाने और उनकी व्यापक स्वीकार्यता के बाद कुमाऊँ-गढ़वाल के राजा भी समय समय पर उनके करदाता होते गए और उनकी शासन व्यवस्था की ख़ास-ख़ास बातें अपना ली गई। परिणाम स्वरूप राजकाज और न्याय की अधिकांश शब्दावली पर फ़ारसी-अरबी का प्रभाव होता गया जो उस समय राजकाज की भाषा थी। अंग्रेजों के आने के बाद भी उन्होंने उस व्यवस्था से अधिक छेड़छाड़ नहीं की। अंग्रेजों के शासनकाल में भी वे ही शब्द चलते रहे और बहुत से तो आज अंग्रेजी का बोलबाला हो जाने के बाद भी प्रचलित हैं।

जैसे वाद अर्थात दावा को कुमाऊँ में आज भी ''दौ'' कहा जाता है। 
~ "उनर झकड़ आब अदालत पुजि ग्यो। दौ करि हालौ बल। (उनका झगड़ा अब अदालत पहुँच गया है। सुना है दावा कर दिया है)।
इस प्रकार जब दावा "दौ" बन गया तो "लादावा" को लादौ बनना ही था। अब समय के अनुसार लादौ के मामले बढ़ने लगे तो इसके स्थान पर तलाक और डिवोर्स शब्द चल पड़े हैं ।
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Sunday, 18 August 2024

भला और भद्दा

राखी और भद्रा 
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ज्योतिषियों के द्वारा प्रायः हर साल राखी पर भद्रा के नाम से डरा दिया जाता है। जहाँ तक नाम का प्रश्न है भद्र शब्द की व्युत्पत्ति भद् धातु से है (भदि कल्याणे ) । अमरकोश के अनुसार भद्र के कुछ पर्याय हैं - श्रेय, शिव,कल्याण, मङ्गल, शुभ, भव्य, कुशल । इनमें कोई भी अशुभ या डरावना अर्थ देने वाला शब्द नहीं है। भद्र से ही आ (टाप्) प्रत्यय जुड़ने से बना भद्रा। तो भद्रा में डर या अशुभ अर्थ कैसे आ गया।

भद्र से तो भला होना चाहिए था किंतु ज्योतिषी उससे बचने की राय देते हैं। (हमारे वाले कह रहे थे इस साल भद्रा पाताल लोक में है लेकिन फिर भी दोपहर तक असर करेगी।) लगता है भद्रा न हुई, हमारे सरकारी "अच्छे दिन" हो गए।

वह्नि पुराण के अनुसार भद्रा छाया के गर्भ से उत्पन्न सूर्य की कन्या थी। शनिदेव और भद्रा जुड़वा भाई बहन थे।
“यमलौ तु ततस्तस्यां जनयामास भास्करः।
शनैश्चरञ्च भद्राञ्च छायायाममितद्युतिः॥"
लगता है भद्रा से डरने-डराने का कारण यही है। शनि देव को चूँकि ज्योतिषियों ने किन्हीं कारणों से डरावना बना दिया है, इसलिए उसकी जुड़वा बहन छाया को भद्रा होते हुए भी डरावना अर्थ मिलना ही था।

जहाँ तक भाषा का प्रश्न है, एक ही मूल शब्द 'भद्र' से हिंदी के दो परस्पर विलोम शब्द बने हैं- भला और भद्दा! 
~भद्र > भद्रक >भल्लअ > भला;
~भद्र > भद्रक > भद्दअ> भद्दा।
यह है भाषा की महिमा।
  

Thursday, 18 July 2024

प्रेत चर्चा

किसी ने पूछी है प्रेत की व्युत्पत्ति।

(फोटो सौजन्य Wikicommons)


प्रेत [प्र+√इ(जाना)+क्त], परेत [परा+√इ+क्त]; इस संसार से गया हुआ, मृत, और्ध्वदेहिक क्रिया (मरणोत्तर कर्म) संपन्न किए जाने से पूर्व जीव की अवस्था। नरकस्थ प्राणी। (The departed spirit, the spirit before obsequial rites are performed, deceased).
नरकस्थ प्राणी पर शंका आई कि प्रेत को "नरकस्थ प्राणी" कैसे कहा गया, जब कि यह तो भटकने वाली योनि मानी गई है जिसकी कतिपय कारणों से मुक्ति न हो सकी हो !'
दरअसल प्रेतावस्था एक प्रकार से मुक्ति से पहले का ठिकाना कही जा सकती है। सनातन विश्वास के अनुसार मृत्यु के बाद सपिण्डीकरण या लोकाचार के अनुसार अन्य विहित कर्म सम्पन्न होने के बाद उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और कर्मानुसार 'स्थान' भी। अमरकोष में उल्लिखित प्रेत के अनेक पर्यायों में से एक "नरकस्थप्राणी" भी है।
जानना रोचक होगा कि हमारे पुराणों और अन्य अनेक ग्रंथों में प्रेत की पारलौकिक  व्याख्या से अधिक इहलौकिक लक्षण गिनाए गए हैं। जीवित प्रेत के बारे में बहुत सामग्री है। उन लक्षणों के अनुसार तो हम सब भी किसी ने किसी रूप में जीवित प्रेत ही हैं।

Tuesday, 4 June 2024

पाखंड

पाखंड (hypocrisy)
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"पालनाच्च त्रयीधर्म्मः पाशब्देन निगद्यते।
तं खण्डयन्ति ते यस्मात् पाखण्डास्तेन हेतुना॥"
त्रयीधर्म का अर्थ है तीनों वेदों द्वारा निर्धारित आचरण न करना, धर्म का खंडन करना अर्थात वेद विरुद्ध आचरण। इसे ही पाखंड कहा गया है।
मॉनियर विलियम्स के अनुसार वह धर्म विरुद्ध आचरण करने वाला हिंदू पाखंडी है जो बाहरी धार्मिक चिह्न तो धारण करता है किंतु कार्य वेद विरुद्ध करता है। (a heretic, heterodox Hindū, adopting the exterior marks of the classes, but not respecting the ordinances of the
Vedas.)
भक्ति या उपासना जो केवल दूसरों के दिखाने के लिये की जाय और जिसमें कर्ता की वास्तविक निष्ठा अथवा श्रद्धा न हो,  बुरे हेतु से ऐसा काम करना जो अच्छे इरादे से किया हुआ जान पड़े। ढोंग, आडंबर, ढकोसला, बगुलाभक्ति, यह सब लक्षण पाखंड के अंतर्गत आते हैं ।
श्रीमद्भागवत में एक कथा आती है कि एक विमुक्त संन्यासी बनकर देवराज इंद्र महाराज पृथु के घोड़े को चुरा कर ले जा रहा था तो भगवान अत्रि ने भगवा वस्त्र और नकली जटाजूट पहने इंद्र के पाखंड को पहचान लिया।
संन्यासी जैसी भगवा वेशभूषा धारणकर वेद विरुद्ध कर्म करना भी पाखंड है। पाखंड का भाँडा एक दिन फूटता ज़रूर है, चाहे इंद्र का ही क्यों न हो।
सुरेश,
४जून, २०२४

Thursday, 16 May 2024

Pleasures of Old Age

Episode 01
You needed something. Go to the washroom. You enter and forget why you came in. Come out, sit on the dining table to have your breakfast, try to have a bite... Oh shit, you needed dentures lying in the washroom!
 🤥 🤥 
Episode 02
My friend is 85. Independent, can help himself in daily chore s. His hands tremble a little, has a mild ET. Has been advised by the neurologist to practice tying and untying things. Yesterday he decided to tie his shoelaces himself. He did it and came down to tell me about his success. Stood barefoot, holding the pair of shoes tied together strongly! 
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 Episode 03
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Happened about fifteen years ago. A learned lady, in her sixties, was in my team in a week-long workshop: was beautiful, frank, and witty too. You could find her pulling down whomever she confronted with, with sarcasm and lively wit. 
One afternoon, she tried to pull me into the trap, bantering , "You look so handsome Sir..." 
I said, "Yes, but where were you when I was in my twenties?"
Apt came the reply, "Well, mind you Sir, my father was a police officer, won't have allowed us to befriend!"
"But, in any case, you would have run away with me, wouldn't you?"
The whole group burst into wild laughter.
🤣😂

Episode 04
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विशाखापत्तनम्। लगभग बीस साल पहले की बात। 
फैकल्टी इंप्रूवमेंट कार्यक्रम में कुछ चुने हुए स्कूलों के शिक्षक-शिक्षिकाओं की कार्यशाला आयोजित की गई थी। दूसरे दिन मेरे सत्र के बाद चाय अंतराल में एक प्रतिभागी शिक्षिका मेरे पास आई।
~ सर आपका एक फ़ोटोग्राफ़ चाहिए।
~बच्चों को डराने के लिए? मैंने चुहल की।
~ नहीं सर, बुजुर्गों को समझाने के लिए।
~ क्या मैं इतना डरावना दिखाई देता हूँ?
उसने समझाना शुरू किया- सर मेरे ससुर और पिताजी दिन भर शतरंज या ताश खेलते रहते हैं। कुछ कहो तो कह देते हैं हम रिटायर हो चुके, कुछ काम की उम्मीद मत करो।
~तो मेरा फ़ोटो क्या कर सकता है?
~सर, उन्हें दिखाकर कहूँगी, लोग इस उम्र में भी सक्रिय रहते हैं और ..
बात मेरी समझ में आती, तब तक फ़ोटो खिंच चुका था। फिर भी मैंने कहा, फोटो से कुछ नहीं होगा, उन्हें मिलने कम दिया कीजिए।
संभव नहीं है, सर। सटा हुआ घर-आँगन है, बचपन के दोस्त हैं और आपस में समधी भी!

संबंधों की इस अबूझ पहेली को बाद में किसी ने बुझाया कि यहाँ हिंदुओं में भी ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों में विवाह हो जाते हैं।
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 Episode 04
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I have arithmophobia, a fear of numbers, right from my childhood. I never had a good score in mathematics. Throughout my life I have faced many awkward situations due to this handicap. This is one among several.
A few years back, I was coming back from the CBSE after a day-long sitting. I took an autorickshaw. Reaching at my society gate the autowala asked for ₹120. I gave him a 200 ₹note that I had put separately in my pocket for the purpose. 
"Chhutta 80 nahin hai sab", he said.
Searching for my other pockets for ''chhutta", I tried to help him. 
Finally, working smartly on mental mathematics and some loose cash in my hand, I found the solution. 
"Okay, ye lo chhutta 80, aur apne 20 rupaye kat ke mujhe 100 lauta do."
He precisely did that and drove off happily.
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Episode 05
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This is about my most esteemed friend, a respected journalist of the bygone era, sadly no more now. This is s penned for me by his darling daughter.]
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“One morning after his hour or so of yoga, followed by meditation and breakfast, my father read a little and then took a little pre-lunch snooze. My sister and I were at work and my mother was in the pooja room.
At lunch time our house help woke my father and told him to freshen up for lunch. He sat up and looked down to find his slippers missing. He immediately complained that while cleaning the floor, she had again pushed them under the bed. She looked under the bed to no avail, and then, equally unsuccessfully, searched the whole room. Now two of them were puzzled.
Then, my father decided to get up without the slippers and shook off the sheet he had draped over himself and lo and behold, the slippers were snug on his feet. The house help, who was very fond of my parents and could growl at them at times like this, growled and sputtered with laughter, “Uncle!!!”.
And in his unique style my father replied, “Arey! Ye yahan kaise aa gai?”

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 Episode 06

 Old age: Episode 06

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Decades ago a not-so-distant relative of mine, in his sixties, lost his wife. He had two married daughters with their kids. One of his grandchildren was just about two years younger to me.

After a couple of months of bereavement, he started looking for a bride. Finally he got one in her teens, from a very poor family in a far off village. He allegedly offered some money to the poor parents, people used to say. 

Anyways, marriage was fixed. It was sensational news in all the neighborhood. Not that people didn't have a second marriage, but the age difference of about 40+ years was the concern. However none could dare to tell him. 

Finally people approached one sayana (village elder) to persuade him, to which he agreed reluctantly. Sayana ji went to the house of the bridegroom and told him:

~ देखो बेटे, तुम ठीक नहीं कर रहे हो। अपनी उमर देखो। तुम्हारे लड़की-दामाद हैं, नाती-नातिन हैं। सोचो, लोग क्या कहेंगे?

~ ताऊ जी, लोग जो भी कहें, शादी तो मैं करूंगा। जो मना कर रहे हैं, उन्हें न्योता नहीं दूंगा।

~ लड़का सयाना हो गया है, उसके लिए बहू ढूँढ़ो। 

~ उसकी बहू आए और मैं अकेला बाहर ओबरी में सोऊँ! कैसी बात कर रहे हैं आप?

Obviously Sayana ji didn't succeed.

Fortunately this marriage could not happen. Later we heard that the girl had run out of her home to jump into Ramganga to commit suicide. A soldier on his way home saw her jumping from the bridge and ultimately saved her.

Friday, 19 April 2024

अपना बन्ना फूल गुलाबी...

"अपना बन्ना फूल गुलाबी, बन्नो चम्पे की कली"
बन्ना शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में एकाधिक विचार हो सकते हैं।
एक विचार से यह शब्द संस्कृत √वन् (याचने) से संभव है। वन् + शानच् = वन्वानः (माँगता हुआ) >वन्ना > बन्ना; अथवा (वन् + तुमुन् = वनितुम्) वनितुम् इच्छति। जो माँगना चाहता है।
वन्ना/बन्ना, बनड़ा, bridegroom: कन्या को माँगने वाला। स्त्रीलिंग बन्नी, बनड़ी, बन्नो , bride.
एक अन्य विचार से बन्ना संस्कृत √वृ ल्युट्; वरणम् varaṇam (वरण करना, चुनना) से भी संभव है। वर (दूल्हा ) इसी √वृ से बना है। संस्कृत वरणक > हिंदी बरना > बन्ना । इसी से स्त्रीलिंग बन्नी / बन्नो = वधू, दुलहिन।
राल्फ लिली टर्नर बन्ना को *वन्व (चाहना) से मानता है और वन्वति (बनना, बनाव-सिंगार करना) से भी संभावना व्यक्त करता है।
विवाह के अवसर पर स्त्रियों के द्वारा, प्राय: वर-पक्ष की स्त्रियों केद्वारा, गाए जाने वाले एक प्रकार के लोकगीत को भी बन्ना कहा जाता है। 

Wednesday, 20 March 2024

नान, नानवाई और हलवाई

नान फ़ारसी मूल का शब्द है। तंदूर में पकाई जाने वाली मोटी खमीरी रोटी। नानवाई नान रोटी पकाने, बेचने का व्यवसाय करने वाला, नान-फ़रोश। मध्य पूर्व के देशों में रोटियों की दुकानें बहुत दिखाई पड़ती हैं। नान खताई एक प्रकार के 'कुकीज़' होते हैं जो भारत और पाकिस्तान में बहुत लोकप्रिय हैं।
नानमाश उरद के आटे की छोटी और फूली हुई रोटी, कचौरी को कहते हैं। डबल रोटी को नान पाव भी कहा जाता है।
(चित्र लद्दाख में एक नानबाई।
सौजन्य: विकीकॉमंस)

हलवा, हलुआ अरबी मूल का शब्द है। सामान्यतः आटा, मैदा, सूजी, मूँग आदि दालों की पिट्ठी या गाजर आदि को भूनकर बनाया जाने वाला विशेष मीठा पकवान 'हलवा' कहा जाता है। अर्थ विस्तार से खोवा, घी, शक्कर, मेवा और मैदा , बेसन आदि से बने वे सारे खाद्य पदार्थ हलवे की अर्थ परिधि में आ जाते हैं जिन्हें मिठाई कहा जाता है। 
हलवाई हलवा बनाने-बेचने वाला, मिठाई वाला। 
(चित्र सौजन्य: विकीकॉमंस)

आजकल नानबाई शब्द के कम व्यवहार का कारण नान और मिठाई की लोकप्रियता में अंतर मान सकते हैं। नान के नाम पर अब दो ही खाद्य पदार्थों को लोग जानते हैं नान रोटी और नान खताई । विशेष कर जम्मू कश्मीर, पंजाब और आसपास के क्षेत्र के लोगों में अधिकतर इसके शौकीन मिलेंगे। नान का व्यवसाय अलग से नहीं रहा। जिन्हें नान रोटी प्रिय लगती है वे लोग अपने-अपने घरों में बना लेते हैं या तंदूर, ढाबे से ले आते हैं। होटलों में ग्राहक के अनुरोध पर बना दी जाती है किंतु उसके लिए कोई अलग से नानबाई नहीं रखा जाता। तंदूरी रोटी बनाने वाला रसोईया नान भी बना लेता है। नानखताई भी बिस्किट बनाने वाली बेकरी से मिल जाती है। 
नानवाई व्यवसाय नहीं रहा, इसलिए नानवाई शब्द खो गया। हलवा और मीठा सबको प्रिय है, इसलिए हलवा (मिठाई) वाले हलवाई का बोलबाला है।

Friday, 15 March 2024

बॉन्ड Bond

बौंड•••Bond के लिए नवनिर्मित 'बंधपत्र' शब्द √बन्ध् से बनता है। वाचस्पत्यम् के अनुसार "ऋणशोधनविश्वासाय स्थापिते द्रव्ये.."(ऋण वसूली का आश्वासन)। 

अंग्रेजी शब्दकोशों के अनुसार बौंड है दो पक्षों को बाँधने या जोड़ने वाली शक्ति, ऋणपत्र। 
 किसी रासायनिक मिश्रण में अणुओं के संयोजित होने की विधि।

Etymonline (Oxford) ने इसे PIE के प्रकल्पनात्मक मूल *bheue- to be, to exist, to grow से माना है जिसका संबंध संस्कृत √भू > भव, भवति या भूमि से हो सकता है।

Cambridge Dictionary के अनुसार:
"a close connection joining two or more people, written agreement or promise:to develop a close and lasting relationship, an amount of money that an organization or government borrows and promises to pay back on an agreed date with an agreed amount of interest, or the document that contains this agreement."

Monday, 26 February 2024

संस्कृति

📌शब्द विवेक
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💡संस्कार (सम्+√कृ) - सुधारने का कार्य, माँजना, सुधारना , व्याकरण की दृष्टि से ठीक करना, धार्मिक अनुष्ठान।

💡संस्कृत - सुधारा, माँजा हुआ, संस्कार किया हुआ।

💡सुसंस्कृत - सभ्य, अच्छे संस्कारों वाला।

💡संस्कृति - संस्कार की हुई (सुधारी हुई) स्थिति; किसी समाज के विचार-व्यवहार, खानपान, रहन-सहन, आचार-विचार ,  भाषा-साहित्य, कलात्मक चेतना, परंपरा, चिंतन और अभिव्यक्ति आदि का समग्र।

Saturday, 10 February 2024

मेरी नफ़रत और मेरा प्यार

नफ़रत और प्यार पहले ही नज़र में एक दूसरे के विलोम है। हम जिससे नफ़रत करते हैं, उसे अपने पास नहीं फटकने देना चाहते और इसके विपरीत जिससे प्यार करते हैं, उसे अपनी नज़रों से दूर नहीं करना चाहते। ऐसा संभव नहीं है कि हम एक ही समय किसी को प्यार भी करते हों और नफ़रत भी। लेकिन ऐसा हो रहा है, कम से कम मेरे साथ तो कुछ वर्षों से हो रहा है। वो कहते हैं ना कि बुढ़ापे का इश्क़ गजब का होता है।

आत्म नियंत्रण की परख के लिए सरदार खुशवंत सिंह ने कहीं लिखा था- कोई मूँगफली की एक पुड़िया लेकर जेब में रख ले। एक-दो मूँगफलियाँ खा लेने के बाद तय करे कि अब नहीं खाएगा। यदि वह ऐसा कर पाया तो सचमुच दृढ़ इच्छा शक्ति वाला माना जाएगा, लेकिन कोई ऐसा कर नहीं पाता। मुझे लगता है यह परीक्षण मोबाइल और हमारे संबंधों पर भी लागू होता है।

मोबाइल फ़ोन अभिशाप भी है और वरदान भी। निस्संदेह इसमें बीसियों बुराइयाँ हैं। ऐसा गुरुत्वाकर्षण है कि पूछिए मत। यह जानना असंभव हो जाता है कि आप इससे चिपके हैं या यह आपसे। समय का पता ही नहीं लगता। मुवे को एक बार छू लिया तो गए दीन से भी और दुनिया से भी। मैं व्यक्तिगत तौर पर इसकी आशिक़ी का सताया हुआ हूँ। जीवन में कभी मादक द्रव्यों का सेवन नहीं किया फिर भी कह सकता हूँ कि मोबाइल का नशा सबसे तीखा नशा है और मैं इसका नशेड़ी हूँ। मेरे एक मित्र नशे में टुन्न होकर शाम को मेरे पास आते थे तो रोते हुए, कसमें खा-खाकर कहते थे कि कल से बिल्कुल नहीं पियूँगा और अगली शाम को फिर बोतल के पास। यही हाल हम मोबाइल वालों का भी है। अगली शाम तो क्या, हम अगले घंटे तक रुक नहीं सकते बिना निगोड़े को छुए।

लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। यह आज के जीवन का अपरिहार्य अंग बन गया है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए, उसकी आवश्यकतानुसार। अपना ही उदाहरण दूँ। उम्र के इस पड़ाव पर कलम से लिखने में मुझे बड़ी असुविधा होती है। अधिक देर तक मेज़ पर बैठ नहीं पाता और लिखावट टेढ़ी-मेढ़ी होती है। पिछले चार-पाँच वर्षों में मैंने जो भी लिखा है (ब्लॉग ,यूट्यूब की स्क्रिप्टें, अखबारों के लिए लेख और पुस्तकें) मोबाइल पर डिक्टेट करके ही लिखा है। दूसरी बात, भाषाओं और शब्द व्युत्पत्तियों पर अपनी रुचि होने के कारण मुझे संदर्भ के लिए प्रायः अनेक शब्दकोश देखने पड़ते हैं। भारी-भरकम कोशों को उठाने और बरतने में कष्ट होता है। अब बीसियों कोश मेरी हथेली पर हैं, वे भी जो अन्यथा अनुपलब्ध हैं। एक-दो क्लिक और वांछित सामग्री सामने होती है। मेरी पठनगति और जानकारी  में बहुत विस्तार हुआ है। सोचता हूँ इसके बिना तो अब मेरा काम ही नहीं चल सकता।

धन्यवाद मेरे सहायक। मैं तुमसे परेशान हूँ, तुमसे नफ़रत करता हूँ, लेकिन मैं तुम्हें प्यार भी करता हूँ। हरदम हथेली पर रखता हूँ और आँखों से दूर नहीं होने देता।