Sunday, 13 October 2024

सौगंध, सौगंध

बहुत-सी भारतीय भाषाओं में क़सम खाई जाती है, जबकि क़सम कोई खाद्य पदार्थ नहीं है। क़सम के साथ खाना क्रिया जोड़ने का संबंध एक प्राचीन ईरानियन प्रथा से है। एक जोरास्त्रियन (पारसी) रिवाज़ था जिसके अनुसार कसम खाने का कर्मकांड पवित्र जल के साथ रोटी खाकर संपन्न होता था। यह ऐसे ही है जैसे भारत में हाथ में गंगाजल लेकर, जनेऊ को हाथ से पकड़ते हुए, गीता थामकर, आग को साक्षी मानकर या और किसी तरीके से कसम खाई जाती है। यह न हुआ तो राम कसम, गीता कसम, बाप कसम, माँ कसम, गौमाता कसम कहकर। सिर की कसम खाना तो आम बात है।
पहलवी से चलकर फ़ारसी में आते आते क़सम खाने के इस कर्मकांड को सौगंदख़ुर्दम" (सौगंध खाना) कहा गया। फ़ारसी से हिंदी/उर्दू में क़सम (अरबी) के साथ भी खाना क्रिया लग गई। देखा-देखी शपथ (संस्कृत) भी खाई जाने लगी।
तर्क है- "संभव है कि सौगंध (अच्छी गंध ) से किसी क्षेत्र विशेष में कोई शपथ जुड़ी ही हो जिसकी हमें जानकारी न हो। या संभव है कि किसी फूल (जैसे कमल!) से कोई शपथ जुड़ी है और शपथ के साथ उस फूल को खाया जाता हो।"
शपथ के लिए एक हिंदी शब्द है "सौंह"। वीरवल्ली आर जगन्नाथन ("छात्र कोश") तथा कुछ अन्य हिंदी कोश इसे "सौगंध" से व्युत्पन्न मानते हैं किंतु यह संस्कृत शपथ से व्युत्पन्न होता है। संस्कृत शपथ प्राकृत में सवहो/ सवहं हिंदी में सौंह, सौं, सूँ। संस्कृत शब्दकोशों में सौगंध शब्द प्राप्त नहीं होता। यदि गंध से 'सु' जोड़कर किसी प्रकार (बलात्) सिद्ध कर भी लें तो गंध/ सुगंध का भाव शपथ, कसम में किसी प्रकार नहीं आता। इसे समरूपी भिन्न मूलक या भ्रामक व्युत्पत्ति का शब्द मान सकते हैं।
यह जानना रोचक होगा के सौगंध चाहे राम की खाएँ या संविधान की, यह शब्द हिंदी में फ़ारसी से आया है। फ़ारसी में सौगंद है, अर्थ है शपथ, क़सम। बलात् तत्समीकरण की प्रवृत्ति से ढलकर सौगंध हो गया है। यह बात और है कि इसमें न गंध है, न सुगंध।
संस्कृत में सौगंधिक (सुगन्ध + ठन् + अण्) या सौगन्ध्य (सुगन्धस्य भाव:) जैसे शब्द हैं जिनमें कुछ प्रत्यय जुड़ने पर वृद्धि हो जाती है। इन्हीं के अनुकरण पर हिंदी में सौगंध शब्द सौगंध के लिए गढ़ लिया गया है।

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