पिथौरागढ़ से युवा मित्र प्रशांत उप्रेती ने आज एक ऐतिहासिक और बड़े रोचक शब्द की याद दिलाई। शब्द है "लादौ"! उन्होंने अपनी वृद्धा दादी के मुँह से सुना था। सुनकर मैं तो उस स्थिति में पहुँच गया जिसको अंग्रेजी में नॉस्टैल्जिक कहते हैं। लगा जैसे स्मृतियों की पुरवा का झोंका आ गया।
कोई बारह बरस का था जब अपने मामा जी के मुँह से यह शब्द सुना था। संस्कृत के आचार्य थे और कोर्ट कचहरी के शब्दों से भी परिचित थे। उस ज़माने तक अदालत की भाषा में अरबी-फ़ारसी के शब्द सर्वाधिक थे, जिन्हें आजकल उर्दू के शब्द कहा जाता है।
कहीं आप लादौ को लादना क्रिया का विध्यर्थक रूप न समझ लें । लादना क्रिया से इसका दूर-दूर का संबंध नहीं है। यह कानूनी प्रक्रिया का शब्द है और इसका संबंध पारिवारिक कानून से अधिक है। यह शब्द पुराने ज़माने में (लगभग एक सदी पहले तक) कुमाऊँ में तलाक के अर्थ में सुना जाता था। लादौ अर्थात पति और पत्नी का विधि या नियम के अनुसार वैवाहिक संबंधों का पूर्ण विच्छेद। चूँकि तब तलाक की घटनाएँ बहुत कम होती थीं, इसलिए यह शब्द भी लगभग अप्रचलित था। कानाबाती में कभी ज़िक्र किया जाता था, "फलाणोंक् लादौ हैगो बल"! (फलाने का लादौ हो गया ")।
आज लादौ शब्द सुनते ही जिज्ञासा हुई कि आखिर शब्द बना कैसे, आया कहाँ से और कुमाउँनी में कैसे पहुँचा। कुछ देर सिर खुजाते हुए जो खोज-बीन की गई उसका परिणाम आपके सामने है।
'दावा' (دَعْویٰ) शब्द को तो आप जानते हैं। अरबी से आया हुआ, कानून का शब्द है। दावा का अर्थ है किसी व्यक्ति अथवा वस्तु पर अपना वैध अधिकार चाहना, इस बात के लिए न्याय की शरण में जाना।
दावा से बनता है 'ला-दावा' (لا دَعْوٰی), वह दस्तावेज़ जिसमें किसी स्वामित्व से हट जाने की प्रतिज्ञा हो। 'ला-दावा देना' अर्थात दावा न होने का दस्तावेज़ लिख देना, अधिकार छोड़ देना, दावे से हाथ उठा लेना (relinquish one's claim upon)।
रही बात कि यह अरबी शब्द सुदूर कुमाऊँ में कैसे आ गया। इसके उत्तर में पहले तो यह बात ध्यान में रखने की है कि शब्दों के लिए भौतिक या भौगोलिक दूरियां कोई महत्व नहीं रखती। हमें पहाड़ी सामाजिक जीवन की पृष्ठभूमि को थोड़ा समझना पड़ेगा। पहाड़ की प्रारंभिक न्याय व्यवस्था में प्रमुख थी दैवी न्याय की। किसी स्वनामधन्य स्थानीय देवता के पास तक अपनी शिकायत पहुँचा देना, उसके मंदिर में जाकर ऊँचे स्वर में अन्याय की पूरी बात सुनाकर फैसला उसी देवता पर छोड़ देना। दूसरी व्यवस्था गाँव के बड़े-बूढों से मामले का निपटारा करवाना। आजकल की पंचायती व्यवस्था से इसकी तुलना कर सकते हैं। तीसरी व्यवस्था थी राजा तक अपनी शिकायत पहुँचाना जो सर्व सुलभ नहीं थी। इसलिए आम लोग दैवी न्याय पर अधिक विश्वास करते थे। जैसे गोलू देवता को आज भी न्याय का देवता माना जाता है।
दिल्ली दरबार में मुसलमान शासकों के आ जाने और उनकी व्यापक स्वीकार्यता के बाद कुमाऊँ-गढ़वाल के राजा भी समय समय पर उनके करदाता होते गए और उनकी शासन व्यवस्था की ख़ास-ख़ास बातें अपना ली गई। परिणाम स्वरूप राजकाज और न्याय की अधिकांश शब्दावली पर फ़ारसी-अरबी का प्रभाव होता गया जो उस समय राजकाज की भाषा थी। अंग्रेजों के आने के बाद भी उन्होंने उस व्यवस्था से अधिक छेड़छाड़ नहीं की। अंग्रेजों के शासनकाल में भी वे ही शब्द चलते रहे और बहुत से तो आज अंग्रेजी का बोलबाला हो जाने के बाद भी प्रचलित हैं।
जैसे वाद अर्थात दावा को कुमाऊँ में आज भी ''दौ'' कहा जाता है।
~ "उनर झकड़ आब अदालत पुजि ग्यो। दौ करि हालौ बल। (उनका झगड़ा अब अदालत पहुँच गया है। सुना है दावा कर दिया है)।
इस प्रकार जब दावा "दौ" बन गया तो "लादावा" को लादौ बनना ही था। अब समय के अनुसार लादौ के मामले बढ़ने लगे तो इसके स्थान पर तलाक और डिवोर्स शब्द चल पड़े हैं ।
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