Tuesday, 22 August 2017

छाता और मेमने





चाय के साथ
अखबार सुड़कते हैं
और गटक लेते हैं
काली सुर्ख़ियों को
पेट में उतार देते हैं
एक साथ हज़ारों हज़ार समस्याओं को
मसल देते हैं
उगते धुएँ के साथ
राखदानी में झाड देते हैं
सिगरेट की राख सा.

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पाँच ठो उदघाटन
दस रिसेप्शन
बारह शिलान्यास
उफ़, कितनी सेवा करनी पड़ती है
सुबह से शाम
बढ़ते ही रहते हैं दाम
आम आदमी की बात और है
वह यों भी बहुत सस्ता है
मरना उसकी नियति है कर्मों का फल है
डूबे
बहे
न बहे
फुंके पुआल-सा
दागा जाए ज़िंदा गर्म सलाखों से  
उसकी अस्मत का क्या?

किया भी क्या जा सकता है
इतनी समस्याएँ हैं ---
पुराने सँकरे घर-द्वार में
न काया अँटती है न माया
ईंट-रोड़ी, लोहा-लक्कड़, बजरी-सीमेंट
सब जोड़-जाड़कर एक नई इमारत बनाना है
देशका कल्याण करना है
अपने ही घर में
किराएदार-सा कैसे रहा जा सकता है!

सूखे से लड़ने का उपाय
बरसात बटोरी जाए
क्या भरोसा मौसम का
बभी बरसता
कभी अटकता
कभी भटक जाता है
अचानक बरसता बरसता
कडकी के दिन कैसे बीतेंगे
छाते का क्या है
कल रहा न रहा
उड़कर दूसरे के सिर चढ़ गया अचानक
मंत्रिपद-सा




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यह शोर
दूर किसी जंगल का है
लगता है षड्यंत्र है मेमनों का
वे पानी को गंदला कर रहे हैं
छेड़ रहे हैं कहानी के सिंह को
सिंहासन हथियाना चाहते हैं  
जंगल के माहौल में
बदलाव की बातें करते हैं
लगता है बढ़ आए हैं इनके बाल
उन्हें मूडना बहुत ज़रूरी है ऊनके लिए
बहुत ज़रूरी है ऊन दस्तानों के लिए
सर्दी से जम न जाएं पोर और
 खून से सनी हथेलियाँ कोई देख भी न सके
इसलिए दस्ताने ज़रूरी हैं
मेमनों को नहीं भूलनी चाहिए अपनी औकात |
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“सूर्योदय की प्रतीक्षा में” संकलन में प्रकाशित, 1979, पृष्ठ : 62

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