वात (= वायु) से संस्कृत में एक शब्द है वातुल जिसका अर्थ है मानसिक वायु विकार से ग्रस्त। प्राकृत में यह वाउल हो गया है। व का ब हो जाने से बाउल; बाउल से बावला, बौला।
बावला अर्थात उन्मत्त, पागल, वायुप्रकोप के कारण जिसकी बुद्धि ठिकाने न हो। विवेक या बुद्धि से रहित । (mad, crazy, insane)। हिंदी की कुछ बोलियों में इसे बावळा भी कहा जाता है। ल का र हो जाने से बावला का वैकल्पिक रूप बना बावरा, बौरा। आकारांत विशेषण होने के कारण बावला, बौरा का स्त्रीलिंग बना बावली, बावळी, बावरी, बौरी। हरियाणा में एक बहु प्रचलित विशेषण है "बावळी बूझ/ बावळी पूँछ। पागल या पगली कहना किसी के लिए कुछ अपमानजनक हो सकता है, किंतु बावली, बावरी में अपमान कम स्नेह या झिड़कने का भाव अधिक है। ब्रज, बुंदेली में महिलाएँ प्यार से कहती सुनी जाती हैं "बावरी है रई है" (पगला गई है क्या) ? बिहारी का यह प्रसिद्ध दोहा याद आ रहा है जिसमें एक बिरह बावरी को सारा गाँव बौरा दिखाई पड़ता है -
हौं ही बौरी बिरह-बस कै बौरौ सब गाँउ।
कहा जानि ये कहत हैं, ससिहिं सीतकर नाँव॥
बौरा का क्रिया रूप बौराना, अर्थात् पगला जाना।
भरतहि दोष देइ को जाए ।
जग बौराइ राजपद पाए॥
—तुलसी
(भरत अपनी सेना और दलबल के साथ राम की ओर बढ़ते आ रहे हैं तो उन्हें क्या दोष दें। अब राजा हो गए हैं राजा का पद मिलने पर तो संसार ही पगला जाता है)।