Saturday, 3 April 2021

अजब मेरी दिल्ली


मेरी दिल्ली



पहाड़ी दिल्ली
दिल्ली की कुछ बस्तियों के नाम पहाड़ी सैरगाह होने के भ्रम में डाल सकते हैं:
* पहाड़ गंज
* पहाड़ी धीरज
* रायसीना पहाड़ी
* आनंद पर्वत
* पूसा हिल
इनमें रायसीना पहाड़ी को छोड़कर बाकी सब घनी आबादी वाले क्षेत्र हैं जहाँ किसी पहाड़ी का कोई नाम निशान नहीं रहा। हाँ, रायसीना की पहाड़ी सौभाग्यशाली है। यहाँ अंग्रेजों ने शानदार वायसरॉय हाउस बनवाया जो आज राष्ट्रपति निवास है। इसके पिछले भाग में 'रिज' वनक्षेत्र फैला हुआ है। रिज ही दिल्ली की पुरानी अरावली पर्वतमाला है। अब इसके कुछ भाग ही मानवीय हस्तक्षेप से बचे रह गए हैं।

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यह INA वह आई एन ए नहीं

नई दिल्ली में दो बस्तियाँ परस्पर निकट हैं:  INA कॉलोनी और INA मार्केट। इनका संबंध नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी से नहीं है। ये दोनों सफदरजंग हवाई अड्डे के निकट हैं और यह नाम एक  भारतीय विमानन कम्पनी 'इंडियन नेशनल एयरवेज़' के नाम पर है जो पहले निजी स्वामित्व की थी और बाद में अधिग्रहण से सरकारी हो गई।

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"टाइपो" की चूक

दिल्ली के एक संभ्रांत क्षेत्र का नामकरण टाइपो (टाइप की अशुद्धि) से जन्मा और अब रूढ़ हो गया है। इंद्रप्रस्थ दुर्ग अर्थात् पांडवों के किले की ओर जाने वाले प्रसिद्ध मार्ग का नाम पांडव रोड Pandava Road रखा गया था जिसे एक टाइपिस्ट ने पंडारा रोड (Pandara Road) कर दिया, (अंग्रेजी r और v की बनावट भ्रामक तो होती ही है)। आज पंडारा रोड दिग्गज नौकरशाहों की सरकारी बस्ती है।

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ल्यूटियन्स दिल्ली

इधर ल्यूटियन्स गैंग या खानमार्केट गैंग शब्द राजनीतिक भाषा में चल पड़े हैं किंतु वास्तविक ल्यूटेन्स या खान का किसी गैंग से कभी कोई संबंध नहीं रहा। ल्यूटेन वह वास्तुकार इंजीनियर था जिसने राष्ट्रपति निवास और संसद भवन सहित नई दिल्ली की परिकल्पना की। आज नई दिल्ली में सत्ता और धनसंपन्न संभ्रांत लोगों की बस्तियों वाला क्षेत्र ल्यूटियन्स दिल्ली कहा जाता है। और ल्यूटियन्स दिल्ली में स्थित अमीर बाज़ार खानमार्केट का नाम जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां के बड़े भाई डॉ जब्बार खां के नाम पर है।

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एक नाम दो बाज़ार

बटवारे के नाम से डर सबको लगता है किंतु अजब दिल्ली में एक ही व्यक्ति के नाम को दो टुकड़ों में बाँटकर दो बाज़ारों का नामकरण किया गया है। मेहरचंद खन्ना प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे जो पूर्व मंत्री होने पर भी आज़ादी के बाद पाकिस्तान में सीमांत गांधी के साथ कैद कर दिए गए। रिहा होकर भारत लौटे। नेहरू मंत्रिमंडल में पुनर्वास मंत्री भी रहे। उनके नाम का पूर्वार्ध लेकर बना मेहरचंद मार्केट और उत्तरार्ध से खन्ना मार्केट। यह बात और है कि दोनों बाज़ार पास-पास ही हैं।

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बंगाली मार्केट

यदि आप समझते हों कि बंगाली मार्केट किसी बंगाली ने बसाई होगी या यह बंगालियों की बस्ती होगी तो अपनी भूल सुधार लीजिए। यह लाला बंगाली मल लोहिया के नाम पर बसाई गई है और उनका बंगाल से कोई संबंध नहीं था। आज शहर के केंद्र में होने से बंगाली मार्केट बहुत लोकप्रिय है। संभ्रांत बंगालियों की बस्ती तो चितरंजन पार्क है जिसे नई पीढ़ी में चितरंजन पार्क से अधिक सीआर पार्क के नाम से जाना जाता है।
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 घंटाघर से खारी बावली
पुरानी दिल्ली में एक प्रसिद्ध स्थान है घंटाघर जहाँ कोई घंटा नहीं बजता न दिखाई पड़ता है। मिठाई की बहुत पुरानी और प्रसिद्ध दुकान घंटेवाला की दुकान पर या आसपास कोई घंटा/घंटी नहीं रही। नाईवालान, चूड़ीवालान, झंडेवालान में केवल नाई, चूड़ी या झंडों का ही नहीं अनेक प्रकार के व्यवसाय होते हैं। ऐसे ही फूलोंवाली गली या पतंगवाली गली। हाँ, पराठे वाली गली में पराठे अब भी मिलते हैं। नई सड़क बहुत पुरानी है। खारी बावली का कोई अतापता नहीं रहा, यहाँ अब मसालों का कारोबार होता है।

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यंग और जंग

दक्षिण दिल्ली में एक बस्ती है जंगपुरा। इसका संबंध न तो पहले या दूसरे विश्व युद्ध से है, न आज़ादी की लड़ाई से, न मोर्चा यानी ऑक्सीडेशन वाली जंग से। रायसीना पहाड़ी पर जब वाइस रॉय का आवास बना तो उसके आवागमन की सुविधा के लिए रायसीना गाँव को हटाना आवश्यक हो गया। तत्कालीन डेपुटी कमिश्नर यंग ने गाँववालों को  जहाँ बसाया वह यंगपुरा कहा गया जो आज जंगपुरा कहा जाता है।
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बोलने-सुनने के नाम
कुछ स्थानों के नाम सुनने में बड़े रोचक हो गए हैं। स्वन विज्ञानियों के लिए अकार-लोप (श्वा लोप schwa deletion) के उदाहरण:
लज्पत् नगर < लाजपत नगर
जंकपुरी < जनकपुरी
तिल्क नगर < तिलक नगर
मुख सुख और नए चलन ने भी सद्गति की है
करमपुरा
सीपी
साउथैक्स
एचके
डीयू
सियार पार्क < सीआरपार्क <चितरंजन पार्क।
आर्के पुरम < आर के पुरम (रामकृष्ण पुरम)।

मलाई मंदिर < मलै (पर्वत) मंदिर।

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भटकाने वाले नाम

गाँव और शहरी क्षेत्र में अधिकृत-अनधिकृत, नियमित-अनियमित हजारों बस्तियाँ हैं जिनमें लगभग दो करोड़ लोग रह रहे हैं। इन बस्तियों के नामों में कुछ पुनरावृति होना स्वाभाविक है किंतु कुछ ऐसी जगहें हैं जिनको अगर आप एक दूसरे से संबद्ध  या एक दूसरे के निकट मान लें तो आप अपने गंतव्य से से मीलों दूर पहुँच सकते हैं। जैसे: 

¶पटेल रोड, पटेल नगर, पटेल चेस्ट अस्पताल ;

¶विकास मार्ग, विकास पुरी, विकास नगर;

¶इंद्रप्रस्थ मार्ग, इंद्रप्रस्थ किला, इंद्रप्रस्थ अपार्टमेंट्स, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, इंद्रप्रस्थ विस्तार;

¶शालीमार बाग, शालीमार गार्डन; 

¶शकरपुर, शकूरपुर, शकूरबस्ती;

¶जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नेहरू संग्रहालय, नेहरू नगर, नेहरू स्टेडियम;

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कड़कड़डूमा

दिल्ली, भारत की भाँति ही, कभी गाँवों का शहर था। अब सभी गाँव शहरीकरण में बिला गए, उन्हें नए नाम मिल गए, फिर भी कुछ नाम बच गए हैं। पूर्वी दिल्ली में एक शहरीकृत गाँव है कड़कड़डूमा। नाम की आलंकारिक गूँज बरबस ध्यान खींचती है। कड़कड़डूमा के आगे एक कड़कड़ गाँव है। निकट ही एक और स्थान है कड़कड़ी। ये नाम अनुगूंज वाले देशज शब्द लगते हैं। आंचलिक हिंदी में इसका अर्थ खरा, ताजा है। फणीश्वरनाथ रेणु ने भी कहीं कहा है, "कड़कड़ी मिठाई।" स्टार्च लगी कड़ी पाग को "कड़कड़ी पाग" कहा जाता है।

 यमुना बाँगर क्षेत्र की कंकरीली कृषि भूमि होने से भी कंकड़ी/कड़कड़ी नाम पड़ा हो सकता है। गाँवों के नामों को विशिष्ट पहचान देने के लिए ग्राम निवासियों की जाति की पहचान से नाम पड़ना कभी आम बात थी। जैसे -- नांगल ठाकरान, माजरा डबास, बामन खेड़ा, बामनोली, नंगला पचौरी; ऐसे ही कड़कड़ डूमा।

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अजब शहर है दिल्ली। जिस ओर से भी देखें एक नया दृश्य। अजब-सी कहानियाँ। गजब के लोग।

युवा कवि पंकज राग की पंक्तियाँ याद आती हैं :

"दिल्ली को खोजना है तो 

ऐसी जगहों पर भी जाना होगा

शहर सिर्फ महामहिम ही नहीं,

बहुत से मामूली लोग भी बसाते हैं

दिल्ली

शहर दर शहर, 

सिर्फ निगहबानों की नहीं

इंसानों की भी कहानी है।"

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Thursday, 1 April 2021

नख चर्चा 💅

अब तो खुजाने-चुभाने के काम के रह गए...
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अमीर खुसरो को एक दिन जाने क्या सूझी कि सुबह-सुबह हत्याएं करने बैठ गए। एक-दो के नहीं, पूरे बीस के सिर उड़ा दिए लेकिन कानून तो कानून है; बीस सिरों को कलम करने के बाद भी कानून की नजर से साफ़ बच गए और लिख दिया कि सनद रहे:
" बीसों का सिर काट लिया 
ना मारा ना खून किया .."
अब तो हम-आप भी यह काम कर लेते हैं और साफ बच निकलते हैं। 
नाखून की व्युत्पत्ति ढूँढ़ना कठिन नहीं है। यह फ़ारसी से आया है हिंदी/उर्दू में। किंतु इसका पूर्वज यहीं का है । संस्कृत में नख की कहानी अवश्य कुछ रोचक है। इसमें वर्णों के उलटफेर का चक्कर है। नख बना है संस्कृत √खन् (खोदना) से। खोदने के उपकरणों में मनुष्य के पास प्रकृति का दिया हुआ प्राचीनतम उपकरण है, तब से जब वह वन्य पशुओं के साथ वनों में विचरण करता था। वह है उसका आदिम औजार नाखून जो मांस, फल- फूल को खोदने- नोचने के काम आता था। आपसी लड़ाई में लड़ने के भी। खन् का वर्ण विपर्यय हुआ नख में।  

यही नख पुरा - भारोपीय (PIE) *h₃nogʰ-   से प्राचीन ग्रीक में ओनख, लैटिन में उँगविस, अल्बानियाई में न्येल, अंग्रेजी में नेल,  लिथुआनियन् में नगस्, रूसी में नगा, फ़ारसी में नाखून बनकर फिरसे भारत आ गया। 
अब नाखून को विदेशी मानें या स्वदेशी?