महँगाई डायन खाए जाति है।
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शब्द सागर के अनुसार महँगा शब्द हिंदी का (अर्थात् देशज) माना गया है। इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत के महार्घ (अर्घ=मूल्य) से भी संभव है। महार्घ > महग्घ/महग्घिअ (प्राकृत) > महँगा/महँगाई (हिंदी)। चूँकि अकाल में दाम अवश्य बढ़ते हैं, इसलिए महँगी का एक अर्थ- विस्तार 'अकाल' भी है।
महँगी विशेषण और संज्ञा दोनों रूपों में प्रयुक्त होता रहा है। अब संज्ञा के रूप में महँगी का कम, महँगाई का अधिक प्रयोग होता है।
~1857 के दौर का एक भोजपुरी लोकगीत था- महंगी के मारे फगुआ बिसर गए..
~चाय पी- पी के दूध- घी की कर दई महंगाई। (बुंदेलखंडी)
और एक शायर का नज़रिया -
"बाज़ार-ए-बोसा तेज़ से है तेज़-तर 'ज़फ़र'
उम्मीद तो नहीं कि ये महँगाई ख़त्म हो ।"
~ज़फर इकबाल
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