Tuesday, 17 May 2022

सोनमछरी


भोली मछलियां 'देस' की यह सोचती थीं
ताल उनका घर
यहाँ वे चैन से जीवित रहेंगी
पर अचानक ताल से उनको उलीचा यों गया है
तड़पना, मरना,  कुचलना नियति उनकी बन गया है
जो समझतीं ताल है उनका
वे ही अचानक
क्यों पराई हो गई हैं ?
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समय बदलेगा
उगेगा नया सूरज
स्वर्ण के व्यापारियों को मिलेंगे अब ताल
एक दिन वे सरोवर में बदल जाएँगे
भरेगा जल नव्य नीलम-सा चमकता
खिलेंगे कमल मनभावन
सोनमछरी की फसल लहराएगी,
कारगर की कारसाजी भी गजब है !

Tuesday, 5 April 2022

भाषा में महँगाई :

महँगाई डायन खाए जाति है।
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शब्द सागर के अनुसार महँगा शब्द हिंदी का (अर्थात् देशज) माना गया है। इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत के महार्घ (अर्घ=मूल्य) से भी संभव है। महार्घ > महग्घ/महग्घिअ (प्राकृत) > महँगा/महँगाई (हिंदी)। चूँकि अकाल में दाम अवश्य बढ़ते हैं, इसलिए महँगी का एक अर्थ- विस्तार 'अकाल' भी है। 
महँगी विशेषण और संज्ञा दोनों रूपों में प्रयुक्त होता रहा है। अब संज्ञा के रूप में महँगी का कम, महँगाई का अधिक प्रयोग होता है। 
~1857 के दौर का एक भोजपुरी लोकगीत था- महंगी के मारे फगुआ बिसर गए..
~चाय पी- पी के दूध- घी की कर दई महंगाई। (बुंदेलखंडी)
और एक शायर का नज़रिया -
"बाज़ार-ए-बोसा तेज़ से है तेज़-तर 'ज़फ़र' 
उम्मीद तो नहीं कि ये महँगाई ख़त्म हो ।"
~ज़फर इकबाल
"

Wednesday, 23 March 2022

क़सम खाना

बहुत सी भारतीय भाषाओं में क़सम खाई जाती है, जबकि क़सम कोई खाद्य पदार्थ नहीं है। 
क़सम के साथ खाना क्रिया जोड़ने का संबंध एक प्राचीन ईरानियन प्रथा से है। एक जोरास्त्रियन (पारसी) रिवाज़ था जिसके अनुसार क़सम खाने का कर्मकांड पवित्र जल के साथ रोटी खाकर संपन्न होता था। पहलवी से चलकर फ़ारसी में आते-आते इसे ''सौगंद ख़ुर्दम '' (सौगंध खाना) कहा गया। फ़ारसी से हिंदी / उर्दू में क़सम (अरबी) के साथ भी खाना क्रिया लग गई। 
देखा- देखी शपथ (संस्कृत) भी खाई जाने लगी !
शपथ के लिए एक हिंदी शब्द है "सौंह"। वीरवल्ली आर जगन्नाथन ("छात्र कोश") तथा कुछ अन्य हिंदी कोश इसे "सौगंध" से व्युत्पन्न मानते हैं किंतु यह संस्कृत शपथ से व्युत्पन्न होता है। प्राकृत में सवहो/ सवहं हिंदी में सौंह, सौं, सूँ। 
संस्कृत शब्दकोशों में सौगंध शब्द प्राप्त नहीं होता। यदि गंध से 'सु' जोड़कर किसी प्रकार (बलात्) सिद्ध कर भी लें तो गंध/ सुगंध का भाव शपथ, कसम में किसी प्रकार नहीं आता। इसे समरूपी भिन्न मूलक या भ्रामक व्युत्पत्ति का शब्द मान सकते हैं।
यह जानना रोचक होगा के सौगंध चाहे राम की खाएँ या संविधान की, यह शब्द हिंदी में फ़ारसी के समरूप बना लिया गया है। फ़ारसी में 'सौगंद' है, अर्थ है शपथ, क़सम। हिंदी में बलात् तत्समीकरण की प्रवृत्ति से सौगंद ही ढलकर सौगंध (शपथ) हो गया है। यह बात और है कि इसमें न भारतीय गंध है, न सुगंध।