Tuesday, 3 March 2026

वैज्ञानिक चिंतन पर ग्रहण


आर्यभट (476–550) ने ग्रहण के लिए राहु-केतु के द्वारा सूर्य और चंद्रमा को ग्रस लिए जाने के पौराणिक मिथक को निरस्त करते हुए इसे पूरी तरह से खगोल वैज्ञानिक परिघटना बताया था। उनके अनुसार, चंद्रग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है, और सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है और पृथ्वी पर छाया डालता है। 
"छादयति शशी सूर्यं शशिनं महती च भूच्छाया ॥"
~आर्यभटीयम्, गोलपाद: (४/३७)
अर्थात चंद्रमा सूर्य को ढक लेता है तो सूर्य ग्रहण, और पृथ्वी की विशाल छाया चंद्रमा को ढक लेती है तो चंद्र ग्रहण।
ठीक वही बात आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं, जो आर्यभट आज से दो हजार साल पहले कह चुके थे।

महाकवि कालिदास (चौथी/पाँचवी सदी ईस्वी) रघुवंशम् (१४.४०) में राम के मुँह से कहला रहे हैं कि चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया से कलंक (ग्रहण) लगता है। सीता परित्याग के पूर्व अपनी किम कर्तव्य विमुड़ता पर कर्तव्य परायणता को प्राथमिकता देते हुए राम कहते हैं–
"अवैमि चैनामनघेति किन्तु लोकापवादो बलवान् मतो मे।
छाया हि भूमेः शशिनो मलत्वेनारोपिता शुद्धिमतः प्रजाभिः॥
"मैं जानता हूँ कि सीता निर्दोष है, किन्तु मेरे लिए लोक-निंदा (बदनामी) अत्यंत बलवान है, जैसे निष्कलंक चंद्रमा पर भी प्रजा पृथ्वी की छाया को कलंक (ग्रहण) मान लेती है।"
विडंबना देखिए की आर्यभट जैसे वैज्ञानिक और कालिदास जैसे विद्वान के देश में आज 2000 वर्ष बाद भी इस वैज्ञानिक तथ्य पर अविश्वास करने वाले लोग हैं। ग्रहण की तिथि से अनेक दिन पहले से ही मीडिया में ग्रहण दोष, सूतक, खाने-पीने की वर्जनाएँ आदि चर्चा के विशेष विषय होते हैं। 

विचित्र बात यह है कि पढ़े-लिखे लोगों का एक बड़ा तबका भी इन अवैज्ञानिक बातों पर विश्वास ही नहीं करता, उनका प्रचार-प्रसार भी करता है। इस सब के लिए शिक्षा में वैज्ञानिक चिंतन का अभाव भी एक कारण है।
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Monday, 12 January 2026

उतरते जाड़े के तीन सत्र— लोहड़ी, बसन्त और होली ...


लोग सरदी से परेशान थे। सीधे भगवान के पास गए और उनसे निवेदन किया, "भगवन्, सरदी हर लीजिए। भगवान बोले, "ठीक है। लो, हरी।" लोगों ने सोचा अब तो सरदी से छुटकारा मिला, सो झूमने-नाचने लगे— "लो हरी, लोहरी!" और घर लौटकर‌ शाम को लकड़ियाँ जलाकर लोहरी> लोहड़ी का त्यौहार मना लिया।
"सुंदर-मुंदरिए, हो
तेरा कोण विचारा, हो
दुल्ला ब'ट्टी वाला... हो-"
पर सरदी कम न हुई। 
वे फिर भगवान के पास गए और फिर प्रार्थना की। भगवान ने आश्वासन दिया, "बस, अंत है सरदी का।" लोग खुशी से नाचते हुए लौटे, "बस अंत है> बसन्त है ---> बसन्त है ---" और 'बसन्त' पंचमी का त्यौहार शुरू | 
"अइलै बसन्त कोइरिया बोराय गेलै..."
कुछ दिन बाद देखा सरदी जस की तस| अबकी बार वे कुछ रूठकर भगवान के पास गए। भगवान उन्हें देखते ही समझ गए कि अब अधिक नहीं टाला जा सकता। सो उन्हें देखते ही बोले, "भाई, भूल जाओ सरदी को; सरदी तो हो ली!" लोग लौटे और आग तापने के लिए जो लकडियाँ बच गई थीं उन्हें जला कर मस्ती में नाचने-गाने लगे, "सरदी तो हो ली, भाई होली– होली!" 
"आज बिरज में होरी रे रसिया
होरी नहीं बरजोरी रे रसिया।
उड़त अबीर गुलाल कुमकुमा, 
केशर की पिचकारी रे रसिया।"
और सरदी सचमुच दूर हो गई। सरदी के कारण लोगों को तीन त्यौहार मिल गए, जिन्हें उन्होंने आज भी सँभाल कर रखा है : लोहड़ी, बसन्त और होली।

फोटो साभार: इंडिया न्यूज़