आर्यभट (476–550) ने ग्रहण के लिए राहु-केतु के द्वारा सूर्य और चंद्रमा को ग्रस लिए जाने के पौराणिक मिथक को निरस्त करते हुए इसे पूरी तरह से खगोल वैज्ञानिक परिघटना बताया था। उनके अनुसार, चंद्रग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है, और सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है और पृथ्वी पर छाया डालता है।
"छादयति शशी सूर्यं शशिनं महती च भूच्छाया ॥"
~आर्यभटीयम्, गोलपाद: (४/३७)
अर्थात चंद्रमा सूर्य को ढक लेता है तो सूर्य ग्रहण, और पृथ्वी की विशाल छाया चंद्रमा को ढक लेती है तो चंद्र ग्रहण।
ठीक वही बात आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं, जो आर्यभट आज से दो हजार साल पहले कह चुके थे।
महाकवि कालिदास (चौथी/पाँचवी सदी ईस्वी) रघुवंशम् (१४.४०) में राम के मुँह से कहला रहे हैं कि चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया से कलंक (ग्रहण) लगता है। सीता परित्याग के पूर्व अपनी किम कर्तव्य विमुड़ता पर कर्तव्य परायणता को प्राथमिकता देते हुए राम कहते हैं–
"अवैमि चैनामनघेति किन्तु लोकापवादो बलवान् मतो मे।
छाया हि भूमेः शशिनो मलत्वेनारोपिता शुद्धिमतः प्रजाभिः॥"
"मैं जानता हूँ कि सीता निर्दोष है, किन्तु मेरे लिए लोक-निंदा (बदनामी) अत्यंत बलवान है, जैसे निष्कलंक चंद्रमा पर भी प्रजा पृथ्वी की छाया को कलंक (ग्रहण) मान लेती है।"
विडंबना देखिए की आर्यभट जैसे वैज्ञानिक और कालिदास जैसे विद्वान के देश में आज 2000 वर्ष बाद भी इस वैज्ञानिक तथ्य पर अविश्वास करने वाले लोग हैं। ग्रहण की तिथि से अनेक दिन पहले से ही मीडिया में ग्रहण दोष, सूतक, खाने-पीने की वर्जनाएँ आदि चर्चा के विशेष विषय होते हैं।
विचित्र बात यह है कि पढ़े-लिखे लोगों का एक बड़ा तबका भी इन अवैज्ञानिक बातों पर विश्वास ही नहीं करता, उनका प्रचार-प्रसार भी करता है। इस सब के लिए शिक्षा में वैज्ञानिक चिंतन का अभाव भी एक कारण है।
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