तुलसीदास (रामबोला दुबे) को गरियाने के मौसम में इतना तो स्वीकार करना पड़ेगा कि उन्हें गरियाने वाले भी उनकी एक छोटी सी लोकप्रिय रचना हनुमान चालीसा से सुपरिचित हैं और, छिपकर ही सही, उसका पाठ भी अवश्य करते होंगे। हनुमान चालीसा में गिनाए गए हनुमान जी के नामों की सूची में एक है, "शंकर सुवन"। गणपति के एक प्रसिद्ध भजन में भी यह शब्द आया है "शंकर सुवन भवानी के नंदन।"
विश्वास कीजिए यह सुवन शब्द बड़ा घुमक्कड़ भी है। प्रचलित कहानियों के अनुसार शंकर सुवन केसरी नंदन तो एक ही रात में लंका से हिमालय पहुंच गए और वहां से द्रोणगिरि को उठाकर वापस युद्ध भूमि में लौट भी आए। दूसरे शंकर सुवन भवानी नंदन ने माता-पिता की परिक्रमा की और उसे संपूर्ण विश्व की परिक्रमा मान लिया गया।
अब घुमक्कड़ी या यात्रा प्रेम इस सुवन शब्द का प्रभाव है या इन व्यक्तित्वों का, यह सोचने की बात है। पहले तो यह जान लें कि "सुवन" का मूल शब्द क्या है। यह परिपाटी ही बन गई है कि हम आर्य भाषा के शब्दों का मूल ढूंढने के लिए सबसे पहले संस्कृत की ओर बढ़ते हैं। इस परिपाटी को निभाते हुए हम पाते हैं कि सूनु/सुवन शब्द भी संस्कृत के सूनु से विकसित हुआ है।
संस्कृत में √सू धातु उत्पन्न करने, जन्म देने (to procreate, to give birth) के अर्थ में है। सू से नु प्रत्यय जोड़कर बनेगा सूनु => सुवन, सुअन, सूनु। ब्रज और अवधी साहित्य में इसका बहुत प्रयोग हुआ है।
"सूनु वसुदेव कौ, पै नंद सुत कहायौ है।"
यह तो हम जानते हैं कि पुत्र (सूनु) के लिए अंग्रेजी में सन (son) शब्द है और यह नाम साम्य अकारण ही नहीं है। इन्हें जोड़ने वाली प्रकल्पनात्मक कड़ी है पुरा भारोपीय मूल PIE *su(e)-nu- (सूनु) जो संस्कृत के sunus सूनु: से जुड़ता है। सूनु से विकसित रूप लगभग सभी आधुनिक और प्राचीन भारोपीय भाषाओं में विद्यमान हैं। संस्कृत से निकट संबंध वाली अवेस्ता में इसे हुनुश कहा जाता है क्योंकि वहां स का ह हो जाता है। ग्रीक में यह हुइओस है और लिथुआनियाई में सूनुस। प्राचीन अंग्रेजी में भी सन, पुरा जर्मनिक में सुनुस, जिससे प्राचीन सेक्शन और फ्रिसियन में सोनू बना, पुरानी नॉर्स में sonr, डेनिश, स्वीडिश में सन, गोथिक और प्राचीन जर्मन में सूनूस। स्लाव भाषाओं में यह सिन् या सिनु है।
कुल मिलाकर यह कि भाषाओं के शब्द अंतर्देशीय, अंतर महाद्वीपीय यात्राएं करते रहते हैं। उनके स्वरूप और अर्थ में परिवर्तन हो सकता है किंतु गुणसूत्र बना रहता है। यह उन लोगों को विशेष रूप से समझना चाहिए जो शब्दों को पराया या विधर्मी मानकर अपनी भाषा से उन्हें बहिष्कृत करना चाहते हैं।
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