आवारा पशुओं के लिए बने बाड़े के लिए कांजी हाउस के कांजी शब्द का रास्ता बड़ा टेढ़ा-मेढ़ा है। मूलतः कांजी शब्द पुरा द्रविड़ माना जाता है और किसी भी अन्न को उबालने के बाद प्राप्त रस के लिए प्रयुक्त होता रहा। आज भी तमिल में कञ्ची, kañci; कोडगु में कंजी kañji, कन्नडा में गंजी gañji है और इसी प्रकार अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी क्योंकि यह दक्षिण भारतीयों का लोकप्रिय घरेलू पेय है। संस्कृत में यह कंजिका बना और चावल के मांड से बने पेय के लिए प्रयुक्त हुआ जिसे संस्कृत में गृहणी (गृहिणी नहीं) भी कहा जाता था क्योंकि घर में ही बना लिया जाता था।
अब इसकी कांजी हाउस वाली यात्रा। अंग्रेज बहादुर के राजकाज के शुरुआती दिनों में अंग्रेज सेना के भारतीय सैनिक जब कच्ची शराब पी लेते (पक्की तो उन्हें नसीब हो नहीं सकती थी) और उसके नशे में उद्दंडता या दुर्व्यवहार करते हुए पकड़े जाते तो उन्हें कुछ दिन के लिए अलग करके ऐसी जगह भेज दिया जाता जो उनके लिए पहले से निर्धारित होती थी। वहाँ सजा के तौर पर उन्हें केवल कंजी ही दी जाती थी। तब अंग्रेजों को पता नहीं होगा कि कंजी में बहुत पौष्टिक तत्व होते हैं। दंड के लिए निर्धारित उस घर को कांजी हाउस (congee house) कहा जाने लगा क्योंकि वहाँ केवल कांजी ही खाने-पीने को मिलती थी।
आगे चलकर कांजी हाउस में पृथक्करण और सजा वाला भाव रह गया और आवारा पशुओं के पृथक्करण के लिए कांजी हाउस शब्द का प्रयोग होने लगा। नगर पालिकाओं पंचायतों आदि के द्वारा अनारक्षित आवारा मवेशियों के लिए काजी हाउसों की व्यवस्था की जाती है।
उत्तर भारत में प्रचलित गाजर, राई, सरसों आदि के किण्वन से बने पेय को भी कंजी कहा जाता है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में "कांजी बड़ा" बड़े स्वाद से खाया जाता है। खट्टे दही के पानी को भी उत्तराखंड और नेपाल में कंजी, काँजी कहा जाता है।