लोग सरदी से परेशान थे। सीधे भगवान के पास गए और उनसे निवेदन किया, "भगवन्, सरदी हर लीजिए। भगवान बोले, "ठीक है। लो, हरी।" लोगों ने सोचा अब तो सरदी से छुटकारा मिला, सो झूमने-नाचने लगे— "लो हरी, लोहरी!" और घर लौटकर शाम को लकड़ियाँ जलाकर लोहरी> लोहड़ी का त्यौहार मना लिया।
"सुंदर-मुंदरिए, हो
तेरा कोण विचारा, हो
दुल्ला ब'ट्टी वाला... हो-"
पर सरदी कम न हुई।
वे फिर भगवान के पास गए और फिर प्रार्थना की। भगवान ने आश्वासन दिया, "बस, अंत है सरदी का।" लोग खुशी से नाचते हुए लौटे, "बस अंत है> बसन्त है ---> बसन्त है ---" और 'बसन्त' पंचमी का त्यौहार शुरू |
"अइलै बसन्त कोइरिया बोराय गेलै..."
कुछ दिन बाद देखा सरदी जस की तस| अबकी बार वे कुछ रूठकर भगवान के पास गए। भगवान उन्हें देखते ही समझ गए कि अब अधिक नहीं टाला जा सकता। सो उन्हें देखते ही बोले, "भाई, भूल जाओ सरदी को; सरदी तो हो ली!" लोग लौटे और आग तापने के लिए जो लकडियाँ बच गई थीं उन्हें जला कर मस्ती में नाचने-गाने लगे, "सरदी तो हो ली, भाई होली– होली!"
"आज बिरज में होरी रे रसिया
होरी नहीं बरजोरी रे रसिया।
उड़त अबीर गुलाल कुमकुमा,
केशर की पिचकारी रे रसिया।"
और सरदी सचमुच दूर हो गई। सरदी के कारण लोगों को तीन त्यौहार मिल गए, जिन्हें उन्होंने आज भी सँभाल कर रखा है : लोहड़ी, बसन्त और होली।
फोटो साभार: इंडिया न्यूज़