Thursday, 6 March 2014

बेचारी फगुनहट

आज सुबह
फगुनहट मिल गई अचानक
कनखियों से मुस्काई और बोली –
'ए – ए - ए--
कुछ ठहरो तब बढ़ो आगे
अभी -अभी ताल में नहाई है  किशोरी धरती और-
बेपरदा बैठी है धूप में
सुखा रही है लक-दक पीली ओढनी
सरसों के खेत में ...

'...उधर बौराने लगे हैं आम
चम्पा का बरन और गोरा हो आया है
गदरा गया है अंग-अंग कलियों का
कल तक खिल जाएंगी टेसू की कलियाँ
बरस पडेगा दहकता रंग क्षितिज के आर-पार
भोर से ही घूमने लगेंगी फगुआ गाती टोलियाँ ...

'... पर कोयल का कहीं अता-पता नहीं है
न सेमल के गाछ में है, न आम की डाल में
न टेसू के वन में है, न महुए के पेड़ में
न जाने कहाँ चली गई पगली
चलती हूँ, ढूँढ लाती हूँ उसे ...’

बेचारी फगुनहट
आगे निकल गई !

मैं कैसे कहता—वह नहीं मिलेगी तुम्हें |
उसे अब क्या पता
कि कब गंधाती है मंजरी
कब बौराते हैं आम
कब कोसाता है महुआ
कब घूमते हैं मदमाते-फगवाते होरिहार...
कोयल तो अब शहर में बस गई है !
मैं कैसे कहता
मैं किसे कहता ?
भोली फगुनहट
अब भी ढूँढती फिर रही है
कोयल को, उसकी बोली को ...   ... |