मित्रो!
डॉ वीरेन्द्र शुक्ल ने एक जिज्ञासा व्यक्त की उसका समाधान सार्वजनिक रूप में रख रहा हूँ कि अधिकाधिक लोग लाभान्वित हो सकें।
जिज्ञासा : संबोधन में अनुनासिक/अनुस्वार समाप्त होने के पीछे क्या तर्क है ?
समाधान : संबोधन में अनुनासिक/अनुस्वार होता ही नहीं। जो है नहीं, उसको समाप्त क्या करना! तब आगे-पीछे तर्क ढूँढ़ना भी व्यर्थ है।
फिर भी आपकी शंका निराधार नहीं है। लोगों ने जो नहीं है, उसको अपनाना शुरू कर दिया है क्योंकि हमारे परम आदरणीय भाषा में भी दखल रखते हैं और वे जो कहते हैं वह ब्रह्म वाक्य होता है। वे अपने सार्वजनिक भाषणों में सर्वत्र और सर्वदा कुछ इस प्रकार संबोधन किया करते हैं: भाइयों! बहनों! साथियों! मेरे प्यारे देशवासियों! वे चूँकि हजारों जनसभाओं के माध्यम से देश के करोड़ों नागरिकों तक पहुँचने वाले सबसे लोकप्रिय नेता हैं, मीडिया भी उनके भाषणों को बार-बार सुनाता और दिखाता है, इसलिए उनकी यह चूक जैसे शास्त्रीय प्रमाण बन गई है और संक्रामक रोग की तरह फैलती ही जा रही है। पढ़े- लिखे, लेखक-पत्रकार (फेसबुक के लेखक ही नहीं, कुछ अच्छे लेखक) भी अब इसे सही मानकर चलने लगे हैं। समस्या तब आती है जब हिंदी शिक्षक भी इसे ही सही मानने लगें। पाठ्यक्रम में निर्धारित व्याकरण की पुस्तकें चाहे सही नियम बता कर कहती हों कि संबोधन बहुवचन में अनुस्वार नहीं लगता, सही उदाहरण देती हों कि भाइयो!, बहनो!, साथियो!, बच्चो! आदि शुद्ध है, किंतु शिक्षक फिर स्वयं यही अशुद्ध प्रयोग करते है। यह अशुद्धीकरण हिंदी जानकारों के लिए चिंतनीय है।
अब उनके समर्थकों का तर्क भी देख लीजिए। कहते हैं सभी कारकों में तिर्यक रूप बनाने के लिए ओं जोड़ा जाता है तो संबोधन बहुवचन में क्यों नहीं? इसका उत्तर दो तरह से
१) अनपढ़ों-अधपढ़ों के लिए तो इतना ही समझना काफी है कि भाषा इसे नहीं स्वीकारती। हिंदी के लगभग 300 साल के इतिहास में पिछले तीसेक सालों की दो-एक सतही रचनाओं को हटा दें तो आपको कहीं संबोधन बहुवचन में अनुनासिकता नहीं मिलेगी।
२) व्याकरण में थोड़ी रुचि रखने वालों को याद करना होगा कि कारक क्रिया के साथ संबंध दिखाता है। शब्द से जुड़ने वाले -ने,-को, -से, -के द्वारा, -के लिए, -में , -पर इसी कारक संबंध को दिखाते हैं। संबोधन के लिए परंपरा से स्कूलों में रटाए जाने वाले हे!, ओ!, अरे! स्वतंत्र शब्द हैं, कारक चिह्न नहीं हैं। संबोधन इनके बिना भी हो सकता है और प्रायः इनके बिना ही होता है। वस्तुत: संबोधन तो कारक है ही नहीं, क्योंकि यह क्रिया से संबंध नहीं दिखाता।
चलिए, यदि आप व्याकरण के पचड़े में भी नहीं पड़ना चाहते तो एक सीधा-सा लिटमस परीक्षण है। तिर्यक रूपों में बहुवचन बनाने के लिए जहाँ-जहाँ भी -ओं जुड़ता है, उसके आगे एक कारक चिह्न अवश्य जुड़ता है। यों समझ लें कि "ओं" को जब बहुवचन बनाने के लिए मूल एकवचन से जोड़ते हैं तो उसे तुरंत एक साथी की भी आवश्यकता होती है, जैसे : बहनों ने, भाइयों को, बहुओं के लिए, देवताओं से ...। पर संबोधन में यह संभव नहीं होता, हो ही नहीं सकता। सीधा बहुवचन बनेगा -- भाइयो!, बहनो!, बहुओ!, देवताओ!, गुरुजनो!, सभासदो! आदि।