जब तैर न रहे हों घर-भर में
असीसों के स्वर
आँचल की अनाम गंध
थम जाए अचानक
रजनीगंधा बिछी-बिखरी न मिले
दिखाई न दे किसी घोंसले में
सिकुड़ी-दुबकी चिड़िया
तो समझ लो
नहीं रही माँ ...
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मरती कभी नहीं माँ
बस हो जाती है बादलों की ओट
सात आसमानों के परे
और भेजती रहती है तरंगें
असीसों की दिन-रात
मरती नहीं है माँ।
दो
माँ स्वर है पिता व्यंजन
माँ भाषा तो पिता व्याकरण
माँ जीवन का प्रवाह
और पिता
प्रवाहित जीवन का अनुशासन !
तीन
अँधेरे के ताने-बाने सुलझाती
उम्मीदों के गीतों को दोहराती
समय के बहुत पुराने करघे पर
यादों के कपड़े बुनती है माँ।
कभी किसी खटिया पर
चिड़िया-सी दुबकी सिमटी
सुमरनी फेरती है
जैसे घड़ियाँ गिनती है
पौ फटने की
सूरज उगने की
अपने अँधेरे के बीच
औरों के उजाले के
सपने देखती है माँ।
~सुरेश