Monday, 18 January 2021

माँ : कुछ रेखाएँ

एक
जब तैर न रहे हों घर-भर में
असीसों के स्वर
आँचल की अनाम गंध
थम जाए अचानक
रजनीगंधा बिछी-बिखरी न मिले 
दिखाई न दे किसी घोंसले में 
सिकुड़ी-दुबकी चिड़िया 
तो समझ लो 
नहीं रही माँ ...
•••
मरती कभी नहीं माँ
बस हो जाती है बादलों की ओट
सात आसमानों के परे
और भेजती रहती है तरंगें
असीसों की दिन-रात
मरती नहीं है माँ।

दो
माँ स्वर है पिता व्यंजन 
माँ भाषा तो पिता व्याकरण 
माँ जीवन का प्रवाह 
और पिता 
प्रवाहित जीवन का अनुशासन !

तीन
अँधेरे के ताने-बाने सुलझाती
उम्मीदों के गीतों को दोहराती
समय के बहुत पुराने करघे पर
यादों के कपड़े बुनती है माँ।
कभी किसी खटिया पर
चिड़िया-सी दुबकी सिमटी
सुमरनी फेरती है
जैसे घड़ियाँ गिनती है
पौ फटने की
सूरज उगने की
अपने अँधेरे के बीच
औरों के उजाले के
सपने देखती है माँ।
~सुरेश