Tuesday, 22 October 2024

हरसिंगार और सप्तपर्णी

हरसिंगार और सप्तपर्णी
कुछ लोग हरसिंगार (पारिजात) की गंध को शरद ऋतु की गंध मानते हैं। निःसंदेह मनभावन है, मधुर भी। मुझे जाने क्यों लगता है कि इसमें आभिजात्य की ठसक है। समुद्र मंथन में देवताओं के साथ जन्म लेने से कुलीनता का अहंकार । इंद्र की बगिया में खिलने का अभिमान। जाने कैसा कौमार्य का गर्व है कि आधी रात चुपचाप खिलो और भोर होते बिखर जाओ कि जो स्वर्ग के देवताओं के लिए बना हो उसे धरती पर कोई मनुष्य छू न ले।

 
हरसिंगार की गंध आम जन की गंध हो ही नहीं सकती।
मेरा मानना है कि छितवन (सप्तपर्णी) की गंध शरद ऋतु की गंध है- मादक। सारी रात दूर-दूर तक महका देने वाली। शयनकक्ष के गवाक्षों से भीतर पहुँच जाए तो जोड़े मचल उठें। ऐसी समर्थ कि आसपास खिले दस हरसिंगार लजा जाएँ।
देवालय के लिए हरसिंगार उपयुक्त हो सकता है लेकिन मुझ जैसे चिर श्रमिक को छितवन प्रेरणा देता है, शक्ति देता है। ललकारता है आओ, उठो मेरी ही तरह। ऐसा कुछ करो कि अंधकार भी गमक उठे। भोर हो तो लोग तुम्हें पाने के लिए ललचाएँ। ऊँची डालियों पर खिलो कि लोग ईर्ष्या करें पर तुम्हारा कुछ बिगाड़ न पाएँ। ऊँचे उठोगे तो छोटी-मोटी बाधाओं से दूर रहोगे। वरना हरसिंगार की भाँति दुर्बल बाहु रह जाओगे।


तुम पर चाहे कोई कवि एक पंक्ति न लिखे, चिंता मत करो। स्वयं अपना रास्ता बनाओ और अपना होना सिद्ध करो। 

Sunday, 20 October 2024

चौथ का चाँद

(प्रतीकात्मक फोटो गूगल से)
 भारत में विवाहित स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है। चौथ के दिन दिन भर व्रत रखकर शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद उसे अरगड़े कर ही व्रत खोला जाता है। करवा चौथ पर रीति कवि बिहारी की कल्पना बड़ी मनोरम है।
"तूँ रहि हौं ही सखि लखौं
चढ़ि न अटा बलि बाल।
सबही बिनु ससि ही उदै
दीजतु अर्घ अकाल॥
🌒
बिहारी के ही एक अन्य दोहे में सखियाँ चंद्रमुखी नायिका से कहती हैं- चाँद देख लिया, अब संकट चतुर्थी का व्रत खोलने छत से नीचे चलो ताकि और नारियाँ भी एकचित्त होकर चाँद को देख सकें। तुम छत पर रहोगी तो वे दुविधा में पड़ जाएँगी कि चाँद तुम हो या आसमान वाला। तुम्हारा चाँद-सा मुखड़ा देखकर उन्हें यह दुविधा भी हो सकती है कि चौथ का चाँद तो पतला होता है, लेकिन आज चौथ के दिन पूरी गोलाई का चाँद कैसे उग आया। इसलिए -
दियौ अरघु नीचे चलौ, संकटु भानैं जाइ।
सुचिती ह्वै औरौ सबै ससिहिं बिलोकैं आइ॥
🌒
महाकवि कालिदास ने भी एक अन्य प्रसंग में ऐसा ही कहा है। चंद्रग्रहण की वेला है। नायिका बाहर घूम रही है। ऐसे में अगर राहु ने उसे ही चंद्रमा समझकर, या चंद्रमा से भी अधिक सुंदर समझ कर उसे निगल लिया तो मुसीबत हो जायेगी।
झटिति प्रविश गेहे मा बहिस्तिष्ठ कान्ते, ग्रहणसमय बेला वर्त्तते शीतरश्मेः। तवमुखमकलङ्कं वीक्ष्य नूनं स राहुः, 
ग्रसति तब मुखेन्दुं पूर्णचन्द्रं विहाय॥
"हे सुंदरी! बाहर मत बैठो, जल्दी-जल्दी घर के अंदर घुस जाओ। चंद्रग्रहण का समय चल रहा है। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा देदीप्यमान मुखमंडल देखकर राहु चंद्रमा को छोड़कर तुम्हें ही जकड़ ले।"
♦️

और इस नायिका ने तो कमाल ही कर दिया। उसके घर के आस-पास पूरे मोहल्ले में हर रात पूनम का चांद चमकता है। लोगों को समस्या है कि पूर्णिमा तिथि किस दिन मानें। निदान उन्हें पंचांग का महत्व समझ में आया कि पूर्णिमा जाननी हो तो भाई, पत्रा-पंचांग में ढूँढ़ लो। मोहल्ले में तो उस मुखड़े की चमक-दमक से रोज़ चाँदनी ही चाँदनी है।
पत्रा ही तिथि पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पून्यौई रहै, आनन-ओप-उजास॥
🌒

*****

Friday, 18 October 2024

चेतावनी : व्याकरण न जानने से होगी दुर्गति

व्याकरण न जानने से होगी दुर्गति 
••••••••
व्याकरण न जानने वाले का विवाह होना कठिन हो सकता है। यह कथा तो सब जानते हैं कि कुछ धूर्त पंडितों ने छल करके विद्योतमा का विवाह मूर्ख कालिदास से कर दिया था जिसका उच्चारण तक शुद्ध नहीं था। इस कन्या को संभवतः मालूम था कि विद्योत्तमा के साथ धोखा हुआ, इसलिए उसने स्वयं दूल्हे की परीक्षा ली और उसे घोषणा करती पड़ी -
"यस्य षष्ठी चतुर्थी च विहस्य च विहाय च।
यस्याहं च द्वितीया स्यात् द्वितीया स्यामहं कथम्।।"
'जिसके लिए विहस्य, विहाय और अहम् पद क्रमशः षष्ठी, चतुर्थी और द्वितीया विभक्ति के रूप हों, मैं उसकी द्वितीया (पत्नी) कैसे बन सकती हूँ!'
एक पिता ने सोचा अपनी विदुषी कन्या के लिए स्वयं दूल्हे की परीक्षा लेंगे। दुर्भाग्य से व्याकरण न जानने से होने वाले जँवाईं राजा की बड़ी हँसी हो गई। परीक्षक ने घोषणा की- 
अजर्घा यो न जानाति 
यो न जानाति वर्वरी।
अचिकमत यो न जानाति 
तस्मै कन्या न दीयताम् ॥
अजर्घा, वर्वरी और अचिकमत इन पदों की सिद्धि जो लड़का न जानता हो उसे कन्या नहीं देनी चाहिए।
( न त्वम् अजर्घाः कस्यचिद् धनं बाल्ये। 
अचीकमत न त्वद्यापि ते चित्तम्।)
एक पिता अपने पुत्र से निवेदन करते हुए कहते हैं - 
यद्यपि बहुनाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
स्वजनः श्वजनः मा भूत् सकलः शकलः सकृत्छकृत्।।
बेटे, व्याकरण इसलिए भी पढ़ो कि उच्चारण में स और श का अंतर न जानने से ही अनर्थ हो सकता है। जैसे:
स्वजन – संबंधी, श्वजन – कुत्ता।
सकल – सम्पूर्ण, शकल – खण्ड। 
सकृत् – एक बार, शकृत् – विष्ठा।

राजा भोज तो बहुत शिक्षित और विद्वान था, कहते हैं उसके राज्य में सब संस्कृत बोलते-समझते थे, लेकिन एक बार व्याकरण की अशुद्धि के कारण स्वयं राजा भोज को एक लकड़हारिन से अपमानित होना पड़ा था। उसने देखा एक लकड़हारिन ने इतना भारी बोझ उठा रखा था कि बेचारी को चलना कठिन हो रहा था। प्रजा का दुख न देख पाने के स्वभाव से भोज पूछ बैठा -
"भूरिभारभराक्रान्तस्तत्र स्कन्धो न बाधति?   
न तथा बाधते राजन् यथा बाधति बाधते॥"
संवाद का आशय कुछ इस प्रकार है -
भोज~ भारी बोझ उठाते तुम्हारे कंधे नहीं दुखते?
लकड़हारिन~ महाराज, बोझसे उतना नहीं दुखते। मैंने तो अभी आपके मुँह से 'बाधते' के स्थान पर 'बाधति' सुना और व्याकरण की ऐसी अशुद्धि सुनकर मुझे सिर पर रखे बोझ से भी अधिक कष्ट हो रहा है!
*******
१८ अक्टूबर '२४

Wednesday, 16 October 2024

कोजागरी, खीर और रोटी

कोजागरी, खीर और बेड़ईं रोटी
आश्विन पूर्णिमा को कुमाऊँ, नेपाल, महाराष्ट्र में "कोजागरी" [< 'क: (को) जागर्ति' से व्युत्पन्न] के नाम से जाना जाता है! लोकविश्वास है कि इस रात को लक्ष्मी स्वयं घर-घर घूमकर देखती हैं कि कौन उनकी प्रतीक्षा में जागा हुआ है ' को जागर्ति'। बिहार में, विशेषकर मिथिला में, इसे कोजागरा के नाम से मनाते हैं। नवविवाहित जोड़ों की ओर से तांबूल (पान), बतासा और मखाना वितरित किया जाता है। इसे विवाह के बाद का पहला सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है!
मराठियों में इस पर्व को कोजागिरी कहा जाता है। चन्द्रोदय के उपरांत, श्वेत वस्त्र धारी लक्ष्मी का पूजन होता है और प्रसाद में खीर , बर्फ़ी आदि अनेक प्रकार की सफेद वस्तुओं का भोग लगाया जाता है। सबसे मज़ेदार बात यह कि परिवार में पहली (ज्येष्ठ) सन्तान की आरती उतारी जाती है और उसे परिवार के सभी बड़ों से त्योहारी मिलती है। यह प्रिविलेज छोटे भाई-बहनों के लिए ईर्ष्या और झगड़े का एक कारण बन जाता है।
कुमाऊँ में एक पुराना रिवाज़ यह था कि इस दिन रात को उड़द की पिट्ठी से बेड़ईं रोटी अवश्य बनाई जाती थी। "भाव प्रकाश" में इसे बलभद्रिका रोटी कहा गया है। उल्लेख कुछ यों है:
“चूर्णं यच्छुष्कमाषाणां चमसी साभिधीयते।
चमसीरचिता रोटी कथ्यते बलभद्रिका॥"
(शब्दकल्पद्रुमुम)
अर्थात मास की पिट्ठी को चमसी कहा जाता है और चमसी से बनी रोटी का नाम है बलभद्रिका। संकेत यह भी है कि बलभद्रिका बेड़ई रोटी बल बढ़ाने वाली होती है।


किसी कवि ने इसे "चंद्रबदनी रोटी" भी कहा है।
गोधूमचूर्णचयचारुसुधाकराभा माषप्रचूर्णलवणार्द्रकहिङ्गुगर्भा । हैयङ्गवीनकृतमार्जनकोमलाङ्गी
रोटी मुखे विशतु पुण्यवतां जनानाम् ॥
अर्थात "दाल की पिट्ठी, नमक, अदरक, हींग को अपने उदर में समेटे हुए, ताज़ा घी से चुपड़ी, कोमलांगी, चाँद-सी गोरी, गेहूँ के आटे से बनी विशेष रोटी सभी पुण्यवान लोगों के मुँह में प्रवेश करे।"
शरद पूर्णिमा को अमृत काल कहकर रात भर खुले में रखी खीर सुबह खाना कभी स्वास्थ्यवर्धक रहा होगा, किंतु आज प्रदूषण के कारण एक रात में उसमें ढेर सारा अपद्रव्य मिल जाएगा। प्रदूषित खीर खाने से अच्छा है घर के भीतर बनी ताजी बलभद्रिका (बेडमी) रोटी खाना!
रुचि और वरीयता आपकी।

Sunday, 13 October 2024

सौगंध, सौगंध

बहुत-सी भारतीय भाषाओं में क़सम खाई जाती है, जबकि क़सम कोई खाद्य पदार्थ नहीं है। क़सम के साथ खाना क्रिया जोड़ने का संबंध एक प्राचीन ईरानियन प्रथा से है। एक जोरास्त्रियन (पारसी) रिवाज़ था जिसके अनुसार कसम खाने का कर्मकांड पवित्र जल के साथ रोटी खाकर संपन्न होता था। यह ऐसे ही है जैसे भारत में हाथ में गंगाजल लेकर, जनेऊ को हाथ से पकड़ते हुए, गीता थामकर, आग को साक्षी मानकर या और किसी तरीके से कसम खाई जाती है। यह न हुआ तो राम कसम, गीता कसम, बाप कसम, माँ कसम, गौमाता कसम कहकर। सिर की कसम खाना तो आम बात है।
पहलवी से चलकर फ़ारसी में आते आते क़सम खाने के इस कर्मकांड को सौगंदख़ुर्दम" (सौगंध खाना) कहा गया। फ़ारसी से हिंदी/उर्दू में क़सम (अरबी) के साथ भी खाना क्रिया लग गई। देखा-देखी शपथ (संस्कृत) भी खाई जाने लगी।
तर्क है- "संभव है कि सौगंध (अच्छी गंध ) से किसी क्षेत्र विशेष में कोई शपथ जुड़ी ही हो जिसकी हमें जानकारी न हो। या संभव है कि किसी फूल (जैसे कमल!) से कोई शपथ जुड़ी है और शपथ के साथ उस फूल को खाया जाता हो।"
शपथ के लिए एक हिंदी शब्द है "सौंह"। वीरवल्ली आर जगन्नाथन ("छात्र कोश") तथा कुछ अन्य हिंदी कोश इसे "सौगंध" से व्युत्पन्न मानते हैं किंतु यह संस्कृत शपथ से व्युत्पन्न होता है। संस्कृत शपथ प्राकृत में सवहो/ सवहं हिंदी में सौंह, सौं, सूँ। संस्कृत शब्दकोशों में सौगंध शब्द प्राप्त नहीं होता। यदि गंध से 'सु' जोड़कर किसी प्रकार (बलात्) सिद्ध कर भी लें तो गंध/ सुगंध का भाव शपथ, कसम में किसी प्रकार नहीं आता। इसे समरूपी भिन्न मूलक या भ्रामक व्युत्पत्ति का शब्द मान सकते हैं।
यह जानना रोचक होगा के सौगंध चाहे राम की खाएँ या संविधान की, यह शब्द हिंदी में फ़ारसी से आया है। फ़ारसी में सौगंद है, अर्थ है शपथ, क़सम। बलात् तत्समीकरण की प्रवृत्ति से ढलकर सौगंध हो गया है। यह बात और है कि इसमें न गंध है, न सुगंध।
संस्कृत में सौगंधिक (सुगन्ध + ठन् + अण्) या सौगन्ध्य (सुगन्धस्य भाव:) जैसे शब्द हैं जिनमें कुछ प्रत्यय जुड़ने पर वृद्धि हो जाती है। इन्हीं के अनुकरण पर हिंदी में सौगंध शब्द सौगंध के लिए गढ़ लिया गया है।

Friday, 11 October 2024

अपराजिता

अपराजिता : एक पुष्प अनेक नाम
यों तो अपराजिता खर-पतवार की तरह उगने वाली बेल है किंतु उद्यानों की सजावट तथा छतों-बालकनियों के गमलों की शोभा भी है। आर्द्र-उष्ण जलवायु का पादप है और इसका मूल उद्गम इंडोनेशिया माना जाता है।
अपराजिता की प्राचीनता और लोकप्रियता का एक प्रमाण तो इसके अनेक नाम होना है। आकृति, रंग आदि के अनुसार लोगों ने बड़े रोचक नाम दिए हैं।
आकृति के अनुसार- गोकर्ण, शंखकर्ण, शंखपुष्पी , Clitoria ternatea (स्त्री जननांग के समान आकृति के कारण), butterfly pea (तितली फूल), Asian pigeonwings (कबूतर के पंख)। अंग्रेजी में अन्य नाम हैं - bluebellvine, blue pea, butterfly pea, cordofan pea और Darwin pea.
रंग के अनुसार- नीलपुष्प, नीलशंख, नीली।
वैष्णवों के लिए- विष्णु प्रिया, विष्णुकांता, विष्णुवल्लभा।
अपराजिता की एक दूसरी प्रजाति सफ़ेद रंग की भी होती है - जिसे शंखपुष्पी कहा जाता है। आयुर्वेद में शंखपुष्पी को बल-वीर्य वर्धक माना गया है और इससे अनेक दवाइयाँ बनती हैं।
अपराजिता का बायोलॉजिकल नामकरण- "Clitoria" १६७८ में पोलैंड के एक पादप वैज्ञानिक ने किया था। उससे सदियों पहले भावप्रकाश में कुछ यों वर्णन है 
"लताविशेष: श्वेतापराजिता । अस्य पुष्पं योन्याकारं भवति" !
 अर्थात इसका फूल योनि के आकार का होता है।
श्वेत पुष्प वाली अपराजिता को शंखपुष्पी भी कहा जाता है । इसके कुछ अन्य नाम हैं - शेफालिका, जयन्ती, असन, शङ्खिनी, हपुषा, असनपर्णी, गिरिकर्णी, अद्रिकर्णी, नगकर्णी।
अपराजिता का फूल विष्णु, काली, शनि और शिव की पूजा में विशेष रूप से प्रयुक्त होता है। स्कंद पुराण में विजयादशमी के दिन अपराजिता की पूजा का विधान है।
दशम्यां च नरैः सम्यक् पूजनीयाऽपराजिता।
ददाति विजयं देवी पूजिता जयवर्धिनी ॥
पूजा के अतिरिक्त टोने-टोटके और तंत्र साधना में अपराजिता फूल का महत्व बताया जाता है। 
आयुर्वेद में इसके विविध उपयोग हैं। इसे शीतल, कड़वी, पित्त विकार शांत करने वाली, आँख के रोग दूर करने वाली और त्रिदोष (वायु-पित्त-कफ) को शांत करने वाली कहा गया है।
गिरिकर्णी हिमा तिक्ता पित्तोपद्रवनाशिनी । 
चक्षुष्यविषदोषघ्नी त्रिदोषशमनी च सा ॥
आज के वैज्ञानिक स्रोतों के अनुसार भी अपराजिता के फूल में एंटीऑक्सीडेंट्स की भरमार बताई जाती है। इसलिए हर्बल चाय (नीली चाय )के रूप में भी इसका सेवन किया जाता है। कहीं-कहीं चावल (भात) को रँगने के काम भी आती है।

Wednesday, 9 October 2024

लफड़ा

लफड़ा (لپھڑا)
••••••
वहिद अंसारी बुरहानपुरी साहब फ़रमाते हैं:
"गधे को बाप कहती है ये दुनिया वक़्त पड़ने पर
अमल तू भी करे इस पर तो लफ़ड़ा हो नहीं सकता"
लफड़ा शब्द मुंबइया हिंदी से मुख्य धारा हिंदी, उर्दू में आया है। मुंबई वाले इसे गुजराती 'लफड़ो' (લફડો) से मानते हैं। 
झगड़ा-झमेला के लिए लफड़ा शब्द का अब बोलचाल में बहुत प्रयोग होने लगा है। लफड़ा को कुछ यों परिभाषित किया जा सकता है- विवाद, कहासुनी, टीका-टिप्पणी, गाली-गलौच, झगड़ा, झंझट, नोंक-झोंक, गरमा-गरमी से आरंभ होकर गुत्थम-गुत्था, जूतमपैजार, पत्थरबाज़ी, दंगा, मार-कूट तक पहुँच जाने वाले झगड़े को लफड़ा कहा जाता है।
~ मंदिर के पास लफड़ा हो गया था, दूसरे रास्ते से आना पड़ा। (दंगा)
~ बहस में मत पड़ो, लफड़ा हो जाएगा। (झगड़ा)

स्वजनों या समाज की अस्वीकृति के बावज़ूद हुए छिपे प्रेम संबंध के लिए भी लफड़ा शब्द है।
~ बॉस और उनकी सेक्रेटरी के बीच लफड़ा चल रहा है।
~ साफ-साफ बताओ, किसी लफड़े में तो नहीं पड़ गई?
ऐसे ही प्रयोगों के आधार पर एक लोक व्युत्पत्ति का दावा है कि इसे फ्रांसीसी शब्द l'affaire (अर्थात् अवैध यौन संबंध) से उधार लिया गया है। इस अर्थ में इसकी व्युत्पत्ति अंग्रेजी love से भी संभव है। लेकिन ये भ्रामक व्युत्पत्तियाँ लगती हैं।
इधर हल्के-फुल्के भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी फिल्मी गानों में लफड़ा का प्रयोग बहुत होने लगा है।
व्यक्तिगत जीवन में या समाज में शांति के लिए लफड़े से दूर रहना ही ठीक है। क्या आपका कोई लफड़ा चल रहा है?
*****