हरसिंगार और सप्तपर्णी
कुछ लोग हरसिंगार (पारिजात) की गंध को शरद ऋतु की गंध मानते हैं। निःसंदेह मनभावन है, मधुर भी। मुझे जाने क्यों लगता है कि इसमें आभिजात्य की ठसक है। समुद्र मंथन में देवताओं के साथ जन्म लेने से कुलीनता का अहंकार । इंद्र की बगिया में खिलने का अभिमान। जाने कैसा कौमार्य का गर्व है कि आधी रात चुपचाप खिलो और भोर होते बिखर जाओ कि जो स्वर्ग के देवताओं के लिए बना हो उसे धरती पर कोई मनुष्य छू न ले।
हरसिंगार की गंध आम जन की गंध हो ही नहीं सकती।
मेरा मानना है कि छितवन (सप्तपर्णी) की गंध शरद ऋतु की गंध है- मादक। सारी रात दूर-दूर तक महका देने वाली। शयनकक्ष के गवाक्षों से भीतर पहुँच जाए तो जोड़े मचल उठें। ऐसी समर्थ कि आसपास खिले दस हरसिंगार लजा जाएँ।
देवालय के लिए हरसिंगार उपयुक्त हो सकता है लेकिन मुझ जैसे चिर श्रमिक को छितवन प्रेरणा देता है, शक्ति देता है। ललकारता है आओ, उठो मेरी ही तरह। ऐसा कुछ करो कि अंधकार भी गमक उठे। भोर हो तो लोग तुम्हें पाने के लिए ललचाएँ। ऊँची डालियों पर खिलो कि लोग ईर्ष्या करें पर तुम्हारा कुछ बिगाड़ न पाएँ। ऊँचे उठोगे तो छोटी-मोटी बाधाओं से दूर रहोगे। वरना हरसिंगार की भाँति दुर्बल बाहु रह जाओगे।
तुम पर चाहे कोई कवि एक पंक्ति न लिखे, चिंता मत करो। स्वयं अपना रास्ता बनाओ और अपना होना सिद्ध करो।