Friday, 12 April 2013

संबोधन ...!!!

संबोधन

मैं तुम्हारे लिए
सीधे-सपाट
कुछ संबोधन ढूँढ़ रहा हूँ |
वस्तुतः वे सारे संबोधन,
वे सारे विशेषण
जो मैं तुम्हें देता रहा
दे जाते रहे बदले में
मुझे एक-एक नया छाला
अपने तन-मन पर
हज़ार अश्वत्थामाओं को ढोने की विवशता।
अब उन्हें दुहराने का
हौसला नहीं रहा
तुम्हें टेरने का
स्थान नहीं बचा 
नया जख्म पिरोने का
सँभालने का परम्परित अर्थों की सड़ांध
जो फैल-फ़ैल जाती रही
मेरे आसपास !
...   ###  ...

नांव

मैं तेरे लई
सिवे-पधरे
कुछ नां लभ रिहा हाँ
दरअसल ओह सारे नांव
ओह सारे बिशेशन
जो मैं तैनू देंदा रिहाँ हाँ
दे जांदे रैए बदले 'च
मैंनू इक-इक नवां छाला
अपने तन-मन उते
हज़ार अस्वत्थामियानु ढोंण दी मजबूरी
हुण उनानु दौराउण दा
हौसला नहीं रिहा
तैनू पुकारण दा
थां नहीं बची नवां नासूर सम्मालण दी
परम्परावां दे अर्थ्याँ दी हवाड
खिड-पुड़ जांदी रई
मेरे आले- दुआले !
#
(पंजाबी अनुवाद : टी. सी. रत्रा, कैलगरी,अल्बर्टा, कनाडा)

Thursday, 21 February 2013

ये परिंदे ...




  • ये परिंदे
    बड़ी दूर से आए हैं
    जहाँ टहनी-टहनी
    बंटी नहीं थी फूल-फूल में
    ताल-तलैया में
    नामों की तख्तियां
    लटकी नहीं थीं कोई
    दानों-तिनकों की तलाश इन्हें
    यहाँ खींच लाई है
    भटका कर |

       ***  
    ये परिंदे थके-हारे हैं
    पंख पसार
    छाँह ढूँढ रहे हैं बेचारे
    धूप से झुलसे
    वर्षा से भीगे
    आँधी से उखड़े
    चुप-चुप हैं
    भोंचक हैं
    टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं
    बदरंग आसमान को
    भीड़ भरे सूने जंगल को |

       *...

एक नया नाम


खिड़की पर झुक आई 
अर्थ भरी शाम
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !

   ***   

बदली फिर झूमी
फिर खनके कंगन 
प्यार की फुहार 
फिर बरसी एक बार 
भीग गया घर आँगन 
डूबा मन-वृन्दावन __
अनछुए रह न सके
अधरों के जाम 
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !


   ***   

केतकी के जुही के 
अटपटे-अनबोले 
प्रश्न भरी चितवन 
झेल नहीं पाई 
अलसाए भोर की
खिसियाई एक किरन  
ऋतुओं की चौखट में
कलियाँ बदनाम 
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !!


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