Thursday, 21 February 2013

एक नया नाम


खिड़की पर झुक आई 
अर्थ भरी शाम
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !

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बदली फिर झूमी
फिर खनके कंगन 
प्यार की फुहार 
फिर बरसी एक बार 
भीग गया घर आँगन 
डूबा मन-वृन्दावन __
अनछुए रह न सके
अधरों के जाम 
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !


   ***   

केतकी के जुही के 
अटपटे-अनबोले 
प्रश्न भरी चितवन 
झेल नहीं पाई 
अलसाए भोर की
खिसियाई एक किरन  
ऋतुओं की चौखट में
कलियाँ बदनाम 
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !!


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