खिड़की पर झुक आई
अर्थ भरी शाम
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !
***
बदली फिर झूमी
फिर खनके कंगन
प्यार की फुहार
फिर बरसी एक बार
भीग गया घर आँगन
डूबा मन-वृन्दावन __
अनछुए रह न सके
अधरों के जाम
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !
***
केतकी के जुही के
अटपटे-अनबोले
प्रश्न भरी चितवन
झेल नहीं पाई
अलसाए भोर की
खिसियाई एक किरन
ऋतुओं की चौखट में
कलियाँ बदनाम
पलकों से उलझ गया
एक नया नाम !!
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