- ये परिंदे
बड़ी दूर से आए हैं
जहाँ टहनी-टहनी
बंटी नहीं थी फूल-फूल में
ताल-तलैया में
नामों की तख्तियां
लटकी नहीं थीं कोई
दानों-तिनकों की तलाश इन्हें
यहाँ खींच लाई है
भटका कर |
***
ये परिंदे थके-हारे हैं
पंख पसार
छाँह ढूँढ रहे हैं बेचारे
धूप से झुलसे
वर्षा से भीगे
आँधी से उखड़े
चुप-चुप हैं
भोंचक हैं
टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं
बदरंग आसमान को
भीड़ भरे सूने जंगल को |
*...
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