Monday, 13 December 2021

राम सरीखा राम है


राम सरीखा राम है


हमारे अमुक मित्र केवल सुबह की सैर के मित्र नहीं हैं, जरा-बौद्धिक कही जाने वाली समय बिताऊ चर्चाओं के, राजनीति की नासमझ बहसों के भी मित्र हैं। अब की बार बात तो कुछ ख़ास भी नहीं थी लेकिन बात तो थी और साधारण से असाधारण बन गई।

 रामराज्य के संदर्भ में हमारे मुँह से निकल गया, "राम सरीखा राजा ...।"
हम वाक्य पूरा कर पाते उससे पहले ही देखा मित्र का चेहरा कुछ कच्चे करेले खाए-सा हो गया। तुरंत बोले, "जमा नहीं..."
"क्या?"
"भगवान राम के नाम के साथ आप ' श्रीराम के समान राजा', 'रामचंद्र जी जैसा राजा', 'श्रीराम के समतुल्य राजा' कहते। 'राम सरीखा राजा' जम नहीं रहा।"
"क्यों?"
"उर्दू का है।"
लगा अब करेले खाने की बारी हमारी है। निवेदन किया,"नहीं भगवन, यह सौ फ़ीसदी हिंदी का है।"
हम अपने मोटे चश्मे से उनकी कनपटियों पर गहराता लाल रंग देख पा रहे थे। अपने आवेश को शिष्टता से दबाकर मित्र बोले, "आपसे बहस नहीं करनी। आप तो उर्दू को ही हिंदी बताते हैं।"
बहस तो हमें भी नहीं करनी थी लेकिन बताना अवश्य चाहते थे कि उर्दू हिंदी ही है और सरीखा शब्द फ़ारसी-अरबी-तुर्की (FAT) वाली उर्दू का नहीं है, देवभाषा संस्कृत वाली उर्दू-हिंदी का है। थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि उर्दू का है, तो राम के साथ क्यों न आए। पर हम न पूछ पाए, न बता पाए कि सुबह की सैर का आनंद ही न जाता रहे।

उन्हें तो नहीं बता पाए, पर यहाँ बताना चाहेंगे। सरीखा शब्द संस्कृत के "सदृक्ष" से व्युत्पन्न है। शौरसेनी प्राकृत में यह सरिक्खा 𑀲𑀭𑀺𑀓𑁆𑀔  बना और हिंदी तथा अन्य अनेक भाषाओं में सरीखा। गुजराती में  સરખું , मराठी में सारखे । उर्दू में है तो सरीखा ही पर उर्दू की नास्तालिक लिपि में लिखा जाता है  سریکھا । बोला जाएगा - सरीखा।
हिंदी में (संभवतः संस्कृत में भी) सदृक्ष की अपेक्षा सदृश का प्रयोग अधिक मिलता है, यद्यपि दोनों पर्याय हैं। अमरकोश के अनुसार:
"समस्तुल्यः सदृक्षः सदृशः सदृक्.।"
काश मेरे वे मित्र मुझे बोलने देते।

"सरीखा" के बहाने भवानी भाई (भवानीप्रसाद मिश्र) की कुछ पंक्तियाँ याद आ गईं -
" कल सरीखे दिन सदा बीतें प्रभो
कल सरीखे सतपुड़ा की गोद वाले दिन
कल सरीखे पुण्यवर्षी मोद वाले दिन
गानवाले-छंदवाले दिन
स्वर्ण सुरभित मंजरी की गंध वाले दिन
धूल से निखरे हुए
आकाश तक बिखरे हुए
कल सरीखे दिन सदा जीतें प्रभो
कल सरीखे दिन सदा बीतें प्रभो। "

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Saturday, 16 October 2021

"फाड़ना'' के बहाने भाषा चर्चा

फाड़ना क्रिया (√स्फुट् > स्फाटन> प्रा.फाडण> हिं. फाड़ना) चीरने, अलग करने के अर्थ में है किंतु हम बहुत कुछ और भी फाड़ लेते हैं! आँखें फाड़कर देखना, कानफाड़ू आवाज़, गला फाड़कर चिल्लाना, दूध फाड़ना, गुस्से में किसी को फाड़कर रख देते हैं या फाड़ खाते हैं- इस अमानुषिक कृत्य में किसी का शाकाहारी होना आड़े नहीं आता! 'दूध फाड़ना' क्रिया के दो प्रक्रिया-स्वरूप हैं- पहली है दूध में कुछ खट्टा डालकर फाड़ना जिससे उस की रासायनिक संरचना बदल जाती है। दूसरी प्रक्रिया में एक विशेष लोटे में गर्म दूध को ठंडा करने के लिए डेढ़ मीटर ऊँचाई तक हाथों को खोलकर दूसरे बर्तन में उँड़ेलना, ऐसे ही उलट-पलट करना भी दूध फाड़ना कहा जाता है। यह कौशल उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश के हलवाइयों में अधिक देखा है। कहीं इसे दूध खींचना भी कहा जाता है। मलेशिया में इस प्रकार खींची हुई चाय बहुत लोकप्रिय है। ऐसी "खिंची चाय" (Teh Tarik) बनाने की बाक़ायदा प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं।
भाषा, वक्ता और लेखक दोनों के व्यक्तित्व का परिधान है। उसे सँभाल-सहेज कर प्रयोग करना पसंद-नापसंद का विषय नहीं है बल्कि अनिवार्य है। इसलिए भाषा विवेक का बड़ा महत्त्व है। आजकल इसका चलन कम हो गया है जिसका प्रभाव समाज पर स्पष्ट दिखता है। जैसे 'फाड़ना' क्रिया के ग्राम्य, अश्लील, अशिष्ट प्रयोग भी चलते हैं। न भूलें कि भाषा समाज सापेक्ष होती है, व्यक्तित्व का निर्धारण करती है और बरतने वाले के व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित भी करती है। कोई शब्द अपने आप में दूषित नहीं होता, प्रयोक्ता दूषित करता है। भाषा को बरतने का अनुशासन सब नहीं जानते।
तुलसीदासजी ने फाड़ना (फारना अ.)  
फारि/फाड़ का अद्भुत प्रयोग बीभत्स रस में किया है। महादेव के गण-
"लाथिन सों लोहू के प्रवाह चले जहाँ तहाँ
मानहुँ गरिन गेरु झरना झरत हैं।
सुभट सरीर नीर बारी भारी भारी तहाँ
सूरनि उछाह कूर कादर डरत हैं।
फेकरि फेकरि फेरु *फारि फारि* पेट खात
काक कंक बालक कोलाहल करत हैं।।
तुलसी का शब्द चयन औऱ काव्यकौशल अद्भुत है। यहाँ जुगुप्सा का भाव सघन हुआ है, ग्राम्यत्व का स्पर्श भी नहीं है। 
भाषा समाज की शक्ति है, दर्पण और उपकरण भी। इसलिए बरतने के अनुशासन की बात की गई है। प्रदूषित भाषा प्रदूषित और रुग्ण समाज का एक लक्षण है, एक पहचान। सामाजिक मूल्यों में ह्रास का स्वाभाविक प्रतिफलन हमारी भाषा में देखा जा सकता है।

Saturday, 25 September 2021

खाजा

"खाजा"
खाजा की व्युत्पत्ति इस प्रकार है <संस्कृत : खाद्यक, > प्राकृत : खज्जअ, > हिंदी : खाजा। 
हिंदी में खाजा किसी भी खाद्य पदार्थ के लिए है। चूहा बिल्ली का खाजा है। इसके मुहावरे हैं- खाजा बनना, खाजा का अकाल पड़ना, अकाल का खाजा।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक "अंधेर नगरी" में चौपट राजा का लक्षण है: जिसके राज में भाजी और खाजा एक भाव बिकें, टके सेर।
कुमाऊँ में खाजा कच्चे चावलों को कहा जाता है जिसे सीधा बुकाया (चबाया) जाता है। बुकाए जाने के कारण ही गढ़वाल में कुमाऊँ का खाजा बुकणा कहलाता है।
भुना चावल भी खाजा हो सकता है कुमाऊँ में। तैयार करने की विधि और नाम कुछ भिन्न है। 
• कच्चे धान को भूनकर कूटने के बाद प्राप्त चावल जिसे सिरौल कहा जाता है।
• एक विशेष प्रकार के धान के कच्चे चावल भूनने पर खील जैसे फूल जाते हैं जिन्हें आसानी से "बुकाया" जा सकता है। इन्हें खजिया कहा जाता है।
खाजा, खजिया, सिरौल, बुकणा सभी को अखरोट की गिरी, भाँग या भङिर साथ चबाना विशेष आनंददायक होता है।
महिलाएँ आँचल में खाजा/बुकणा रखकर सुबह ही काम पर निकल पड़ती हैं। इसकी गाढ़ी खीर 'खिरखाजा' अच्छा नाश्ता है।
बिहार, झारखंड में खाजा मैदे से बना विशेष लोकप्रिय पकवान है जिसमें मालूशाही की भाँति अनेक परतें होती हैं । 
पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उड़ीसा में भी खाजा प्रिय पकवान है। महाराष्ट्र का मालवणी खाजा और काकीनाडा (आंध्र प्रदेश) का खाजा भी बहुत लोकप्रिय व्यंजन हैं।

Saturday, 11 September 2021

अपनी हिंदी सबकी हिंदी

• कोई भी जीवित भाषा नदी की भाँति निरंतर बहती है, वह व्याकरण की चिंता नहीं करती. उसके प्रयोक्ता उसे आगे बढ़ाते हैं. व्याकरण तो उसका पीछा करता है. इसलिए व्याकरण के नियम जब तक स्थिर होते हैं तब तक भाषा आगे निकल जाती है.

• हिंदी संस्कृत से भले ही विकसित हुई हो किंतु आज वह प्राकृत, अपभ्रंश के पड़ावों को पार करती हुई संस्कृत से दूर निकल आई है और एक स्वतंत्र भाषा है। उसका अपना व्याकरण है। इसलिए उस पर संस्कृत व्याकरण को थोपा नहीं जा सकता। हाँ, जहाँ तक संगत हो, उससे दिशा-निर्देश लिया जा सकता है। हिंदी व्याकरण वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) है, इसलिए बाध्यकारक नहीं। संस्कृत व्याकरण निर्देशात्मक (प्रेस्क्रिप्टिव) है, पाणिनीय नियमों का उल्लंघन स्वीकार नहीं करता। हिंदी में व्याकरण से भिन्न लोकस्वीकृत भाषा रूप भी स्वीकारे जाने चाहिए, किंतु इसका आशय यह नहीं कि मनमानेपन की छूट हो।

• हिंदी का सौभाग्य है कि उसे अलग अलग राज्यों-देशों के लोग अपने-अपने ढंग से बोलते हैं. हरयाणवी हिंदी या हैदराबादी हिंदी या ‘गोरों’ की हिंदी हमारी अपनी हिंदी भाषा की शोभा बढाती हैं, उसकी व्यापकता और अपरिहार्यता को रेखांकित करती हैं.

• हिंदी कैसी हो, उसकी वर्तनी, प्रयोग आदि पर बहसों में हिंदी-भाषी का मत ही ग्राह्य हो, यह ज़रूरी नहीं. ज़रूरी है सबका सबसे संवाद.

• हम हिंदी भाषी लोग तो हिंदी वर्तनी के अनेक रूपों से परिचित है, इसलिए हमें हिंदी आसान लगती है पर जो चेन्नई, दीमापुर, कवरत्ती या न्युयार्क, बीजिंग, तोक्यो, केपटाउन जैसे दूरदराज के स्थानों  से हिंदी सीख रहे है उनके लिए हिंदी बहुत कठिन भाषा है और एक ही शब्द को लिखने-बोलने के अलग-अलग तरीकों से वे भ्रमित होते हैं. मानकीकरण एकरूपता के लिए होता है, जिससे सीखने-पढ़ने में आसानी होती है. उससे नाक-भौंह सिकोड़ना हिंदी के व्यापक हित में नहीं है।

Thursday, 9 September 2021

गोरखधंधा वर्जित शब्द

"रब्ब इक्क गुंझलदार बुझारत,
रब्ब इक्क गोरखधंधा।
खोल्हण लग्गेयाँ पेच एस दे,
काफ़र हो जाय बंदा।"
       ~मोहन सिंह, पंजाबी कवि
 सामान्य जन को अपने अंतर की खोज के लिए आवश्यक अनुशासन और योग साधना में प्रवृत्त करने के उद्देश्य से गुरु गोरखनाथ जी (११-वीं सदी) ने जितना प्रयत्न किया उतना शायद किसी ने भी नहीं किया। मानसिक रूप से सक्षम व्यक्ति को ही शिष्य रूप में चुनने के लिए उन्होंने इतनी विधियाँ दीं कि लोग उलझ गए की कौन-सी ठीक है, कौन-सी गलत; कौन-सी करें, कौन-सी छोड़ें। यह उलझाव इस सीमा तक जा पहुँचा कि लोग हताश होने लगे तथा गोरखधंधा शब्द प्रचलन में आ गया। जो समझ में न आ सके वह गोरखधंधा कहा जाने लगा।
यह भी कहा जाता है कि गोरखपंथी साधु लोहे या लकड़ी की सलाइयों के हेर-फेर से एक चक्र बनाते हैं। उस चक्र के बीच में एक छेद करते हैं। इस छेद में से कौड़ी या माला के धागे को डालते हैं और फिर मंत्र पढ़कर उसे निकाला करते हैं। इसी को गोरखधंधा या धंधारी कहते हैं। इस गोरखधंधे का उल्लेख योगियों के संदर्भ में प्रायः मिल जाता है। गोरखधंधा या धंधारी में से सही विधि जाने बिना कौड़ी या डोरी निकालना बहुत उलझन भरा कठिन कार्य होता है। इसीलिए गोरखधंधा शब्द का प्रचलन उलझन और झंझट वाले कार्यों के लिए होता रहा है।
कालांतर में इन विधियों का दुरुपयोग नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को छलने में भी होने लगा जिसके कारण समय के साथ -साथ यह शब्द नकारात्मक होता चला गया।
मध्यकाल के व्याख्याता पंडित हजारी प्रसाद द्विदेवी को नाथपंथी धारा का अध्येता समझा जाता है। उन्होंने लिखा है कि ‘गोरखधंधा’ एक किस्म की जटिल मस्तिष्क क्रीड़ा या दिमागी खेल होता था जिसे स्वयं गुरु गोरखनाथ ने आविष्कृत किया था। इस क्रीड़ा के माध्यम से वे अपने घुमंतू अनुयायियों की मानसिक और शारीरिक क्षमताओं को निखारने का काम करते थे। उन्होंने अपने इन अनुयायियों को समाज में जाति रहित समुदायों की स्थापना का उपदेश दिया था।

अब यह शब्द अचानक चर्चा में आया है, इस आरोप के साथ कि यह समाज के कुछ लोगों की भावनाओं को आहत करता है। हिंदी शब्दकोशों के अनुसार गोरखधंधा शब्द का अर्थ- 'जल्दी समझ में न वाली बात, पहेली, कोई जटिल कार्य जिसका निराकरण सहज न हो, अनियमितता या घपला' होता है। ये सब अर्थ लाक्षणिक (मुहावरे के रूप में) हैं। किसी वर्ग को आहत करने की बात इनसे नहीं जुड़ती।
गोरखधंधा शब्द का प्रयोग कबीर, तुलसी आदि मध्यकालीन कवियों ने भी किया है। आज उसके लाक्षणिक अर्थ के कारण कुछ लोग आहत हो रहे हैं तो इसमें बेचारे निरपराध शब्द को सजा क्यों? ऐसे धंधे रुकें जो गोरखधंधे कहलाते हों, शब्द पर रोक लगाने से वे नहीं रुकेंगे।


Friday, 25 June 2021

कल किसी का ...


कल
किसी का हो सका क्या ?
और अगला कल -
क्या किसी का हो सकेगा?
•••
मुट्ठीबंद सूखी रेत-सा 
है फिसलता काल
हर विकल पल को बनाता कल
आज का चल बिंदु ही अपना 
है लिए कुछ साँस के पल
तो बढ़ाएँ हाथ
जिएँ हम 
इन पलों के साथ,
ऐसा न हो -
कल वे बनें  
फिर वही
सूने विफल पल 
कल के विकल पल !
कल किसी का हो सका क्या ?
•••     •••
©सुरेशपन्त

Friday, 18 June 2021

लोल, बकलोल और लोलवा

लोल और लोलवा

मैं जब "लोलवा" से परिचित नहीं था तो इसे आंचलिक प्रयोग समझता था। मित्रों ने बताया कि यह अंग्रेजी LOL का प्रतिरूप है। कुछ इसे  Lots of Love का द्योतक भी मानते।कहीं इसे अंग्रेजी के "Lively Objective Lonesome Warm-Hearted Ambitious" का संक्षिप्त रूप कहा है। राम जाने क्या है, मैं हँसी वाले LOL का संक्षेप "लोपो" (लोटपोट) मानता रहा हूँ।
आंचलिक हिन्दी या अंग्रेजी में कुछ भी हो, किन्तु संस्कृत में "लोल" का अर्थ है- "चञ्चल"। चपल बालक, मूर्ख व लालची के लिए भी "लोल" शब्द का प्रयोग मिलता है-
"मूर्खेऽर्भकेऽपि बालः स्याल्लोलश्चलसतृष्णयोः"
जो सीधा हो, बेकार या किसी काम नहीं हो उसके लिए अवधी क्षेत्र में लोल और लुल्ल शब्द विशेषण के रूप में चलते हैं। 
"मुला, उसकी तो बात न करो, ऊ तो एकदंमे लुल्ल है।"


Saturday, 12 June 2021

शिक्षा, अनुशासन और उपदेश

उपदेश का अर्थ है- शिक्षा, सीख, नसीहत, हित की बात का कहना, दीक्षा। तैत्तिरीय आरण्यक के आचार्य 11 वें अनुवाक में अनुशासन (शिक्षा) देते हैं – सत्यं वद। धर्मं चर । और अंत में "एतदनुशासनम्"। यह तब की प्रत्यक्ष प्रणाली थी जिसमें गुरु का एक आदरणीय स्थान था और उसके उपदेशों को मानना कर्तव्य समझा जाता था।वही शिक्षा थी, वही अनुशासन था।

शिक्षा के कुछ उद्देश्य सनातन और स्थिर होते हैं तो कुछ देश, काल तथा परिस्थिति के अनुसार बदलते भी रहते हैं। इसलिए कुछ लोग शिक्षा, शिक्षण और उपदेश के बीच का अंतर ज्ञान प्रदान करने (शिक्षण) की विधि में मानते हैं। 

माता-पिता द्वारा पुत्र-पुत्री को दी गई शिक्षा को हम क्या कहेंगे? इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि शिक्षा कैसे दी जा रही है। आचरण से, अनुभव से, अपरोक्ष रूप में या कथा, कहानी, प्रवचन आदि के माध्यम से विधि-निषेध बताते हुए उपदेश रूप में। कथा-कहानी रोचक विधा हैं किंतु जब हम कथा के अंत में, "इससे क्या शिक्षा मिली?" से समाप्त करते हैं तो इसे नई पौध उपदेशात्मक मान लेती है। बिदकती है।
आज की पीढ़ी प्रत्यक्ष शिक्षण (करो-मत करो) को उबाऊ मानती है। इसलिए आप ही निर्णय कीजिए के उसे क्या शीर्षक दिया जा सकता है।
       (अपूर्ण)
     

बात अधिक, अधिकांश और अधिकतर की

अधिक, अधिकांश और अधिकतर
   •••    •••    •••

चूँकि अधिकांश और अधिकतर दोनों ही अधिक से बने हैं,  इसलिए पहले अधिक की ही चर्चा की जाए। अधिक परिमाण, मात्रा और संख्या बताने वाला विशेषण है। बहुत, ज़्यादा (much) के अर्थ में; जैसे आपको अधिक कष्ट नहीं होगा।
तुलना (more) के अर्थ में:  मुझे आप से अधिक वेतन नहीं मिलता।
मात्रा (quantity): अधिक वर्षा से फसल नष्ट हो गई।

'अधिकांश' दो शब्दों (अधिक+अंश) से बना हुआ यौगिक शब्द है और 'अधिकतर' अधिक के साथ तुलनार्थक '-तर' प्रत्यय जुड़ने से बना है। 'अधिकांश' गणनीय इकाइयों के साथ प्रयुक्त नहीं होगा क्योंकि 'अंश' का अर्थ भाग है जिसे गणित से नहीं समझाया जा सकता। अर्थात् अंश की इकाइयों को एक-एक कर व्यक्त नहीं किया जाता; जैसे,
"अधिकांश विधायक असंतुष्ट बताए जाते हैं" कहना ठीक नहीं होगा। "अधिकतर विधायक" ठीक है क्योंकि विधायक गिने जा सकते हैं।
"अधिकांश रेलें समय पर चल रही हैं" कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि रेलें गिनी जा सकती हैं। इसलिए अधिकतर रेलें। 
इसी प्रकार अधिकांश खेत, अधिकांश गेहूँ, अधिकांश बजट, अधिकांश कपड़ा, अधिकांश समय, अधिकांश संपत्ति, अधिकांश शक्ति, अधिकांश भीड़ कहना ठीक है।
खेतों, कपड़ों आदि की कभी गणना संकेतित हो तो अधिकतर भी संभव है। जैसे:
पहाड़ों में अधिकतर खेत सीढ़ीदार हैं, खेत का अधिकांश उपजाऊ है।
अधिकतर कपड़े सूख गए, इस कपड़े का अधिकांश गीला है।
"अधिकांश भाग" भी कहा, लिखा जा रहा है किंतु यह भी व्यर्थ की द्विरुक्ति है, जो अंश है वही भाग भी है।

'अधिकांश' प्राय: एकवचन रहता है किंतु 'अधिकतर' में चूँकि एकाधिक इकाइयाँ होती हैं, इसलिए वह बहुवचन; जैसे:
अधिकांश मैदान खाली पड़ा था, अधिकतर लोग जा चुके थे।
अधिकांश वन काटा जा चुका, अधिकतर पेड़ बिक गए।
अधिकांश फिल्म बेकार थी, अधिकतर संवाद उबाऊ थे।


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Thursday, 10 June 2021

श्री, श्रीमती और सुश्री से अनंत श्री तक

श्री, श्रीमती और सुश्री

"श्री" का मुख्य प्रचलित अर्थ है लक्ष्मी। यह प्रतिष्ठा, धन-दौलत, सम्मान आदि का वाचक भी है। है तो स्त्रीलिंग, किंतु पुरुषों ने इसे अपने नाम से पहले शोभा के रूप में धारण कर लिया है। पहले अपने देवताओं को अर्पित किया - श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री गणेश; और उसके बाद नैवेद्य के रूप में स्वयं ग्रहण कर लिया। अब यह पुरुष सामान्य के लिए विशेषण बन गया है। यह बात और है कि सौजन्य वश या शिष्टता के कारण (दिखावे की ही सही) व्यक्ति स्वयं अपने नाम के आगे श्री नहीं लगाता किंतु अपेक्षा करता है कि दूसरा उसे श्री अवश्य कहे। अब जिसके नाम का अंग ही श्री हो उन्हें एक श्री और उपहार में मिल जाता है - जैसे श्री श्रीलाल, श्री श्रीनाथ। अंग्रेजी के 'मिस्टर' के लिए यह हिंदी समानार्थी बन गया है। सामाजिक न्याय  कुछ ऐसा है कि आप किसी सामान्य भिखारी को तो श्री भिखारी जी नहीं कहेंगे किंतु किसी सम्मानित पदधारी को आप श्री अशर्फीलाल ही नहीं, श्री भिखारी दास भी कह सकते हैं! हाँ, एक बात और। श्री आप एक व्यक्ति के लिए लगा रहे हैं तो भी क्रिया बहुवचन की ही लगेगी।

पुरुषों ने स्वयं को प्रतिष्ठित, धनसंपन्न, सम्मानित बताने के लिए अपने नाम के साथ श्री जोड़ा तो महिलाओं ने श्रीमती जोड़ लिया। अंततः धन-दौलत की चाबी तो उनके पास ही रहती है ना! वे श्रीमती होंगी, तभी आप श्रीमान होंगे; वरना ठन-ठन गोपाल। धीरे-धीरे श्रीमती विवाहिता महिला के लिए रूढ़ बन गया। केवल और केवल विवाहित महिला ही श्रीमती कही जाती है। यहां उसकी रुचि-अरुचि की अपेक्षा सामाजिक नियंत्रण अधिक समर्थ है। संपन्न किंतु अविवाहित महिला को श्रीमती कहे जाने का अधिकार नहीं।
याद आता है एक बार संसद में भी बहस हुई थी कि श्री विशेषण पर पुरुषों का वर्चस्व कैसे? महिलाओं के साथ भी श्री क्यों न लगे? यह पुरुषों का एकाधिकार कैसे हो सकता है? हम देवियों को तो श्री कहते हैं - श्री राधा जी, श्री सीता जी। याद नहीं कि बहस का क्या परिणाम निकला था किंतु पुरुष को श्री और विवाहिता महिला को श्रीमती कहने की यह परंपरा चल रही है आज भी और संभवत: आगे भी। पुरुषों ने रहस्य यहाँ भी बनाए रखा। विवाहित होने अथवा न होने के बारे में 'श्री' से कुछ पता नहीं चलता। श्री "अमुक" विवाहित भी हो सकते हैं, कुँवारे भी और विधुर भी। श्रीमती "अमुक" विवाहित ही होगी, विधवा होने पर भी श्रीमती। संबंध विच्छेद हो जाने पर उनकी इच्छा पर है कि वे 'सुश्री' ठीक समझती हैं या श्रीमती।

अपनी पत्नी को "श्रीमती जी!" संबोधन बिल्कुल सही है किंतु सामान्यतः किसी अन्य के लिए नहीं। पूछताछ वाली खिड़की पर बैठा कर्मचारी जब विनम्रता से किसी महिला से पूछता है, "मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ श्रीमती जी", तो उसका आशय अंग्रेजी के "मैडम" शब्द से होता है, कुछ और नहीं।

अविवाहित कन्याओं को "कुमारी" कहा जाने लगा किंतु कुमारी के साथ जो कौमार्य की अर्थ संकल्पना है वह नारी समाज के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण की भी द्योतक है और आवश्यक नहीं कि सबको स्वीकार्य हो। जो महिलाएँ उम्र में बड़ी हैं और विवाहित होने- न -होने के बारे में नहीं बताना चाहतीं या इस बारे में आपको नहीं पता है, तो?  तब उनके नाम के पहले सम्मान व्यक्त करने के लिए "सुश्री" जोड़ने का चलन चला, अर्थात श्री को तो महिलाओं के लिए भी अपना लिया गया किंतु एक सुंदर सा प्रविशेषण "-सु" और जोड़ दिया गया। गोपनीयता की रक्षा भी हो गई।

श्री की सांस्कृतिक जड़ें बड़ी पुरानी और व्यापक रही हैं। पहले जब पत्र लेखन और औपचारिक संबोधन के नियम निर्धारित थे, तब सिखाया जाता था:
"श्री लिखिए षट् गुरुन को, स्वामि पाँच, रिपु चार।
तीन मित्र, दो भृत्य को, एक शिष्य सुत नार॥ "
अर्थात परिवार के बड़े लोगों, गुरुजनों को श्री ६, स्वामी अथवा राजा को श्री ५, शत्रु को श्री ४, मित्र को श्री ३,  सेवक को श्री २, और शिष्य, पुत्र और पत्नी को श्री १ लिखा जाना चाहिए ।

कोई संत श्रीजी हों तो उन्हें श्री श्रीजी कहा जा सकता है, किंतु संत और साधुओं के समाज में श्री को लेकर बड़ी उथल-पुथल रही है और नियमों को ठीक ठीक नहीं समझा जा सकता। यहाँ तो कम से कम "श्री १०८" से संबोधन प्रारंभ होता है और "श्री १००८", "श्री १००००८" से होता हुआ "अनंत श्री" तक जा पहुँचता है। वे इतने समर्थ होते हैं कि अपने लिए स्वयं चुनाव कर सकते हैं कि उन्हें श्री १०८ कहा जाए या अनंतश्री विभूषित।

•••    •••    ••• ©suresh pant •••    •••

Wednesday, 9 June 2021

परात


परात پرات‎)


पीतल, काँसा, ताँबा, स्टील से बना थाली के आकार का एक बड़ा बरतन परात कहलाता है, जिसका किनारा थाली के किनारे से ऊँचा होता है । यह मुख्य रूप से आटा गूँधने के, रसोई में छुटपुट संग्रह के काम आता है। कभी-कभी हाथ-पैर धोने, शादी-ब्याह या किसी और सामूहिक भोज में सामग्री संग्रह या वितरण आदि के काम में भी लाया जाता है ।

—कोउ परात कोउ लोटा लाई ।
साह सभा सब हाथ धोवाई । (जायसी)
— पानी परात को हाथ छुयौ नहिं,   नैनन के जल सों पग धोये। (नरोत्तमदास)

यह शब्द हिंदी, हिंदी क्षेत्र की सभी भाषाओं-बोलियों, नेपाली, पंजाबी, सिंधी, गुजराती, मराठी, कन्नड़ सहित अनेक भाषाओं में विद्यमान है। "परात" शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत पात्र से सहज लगती है। पात्र > परात।

कुछ इसे पुर्तगाली के pratt प्राट से भी व्युत्पन्न मानते हैं और कुछ देशज अर्थात् अज्ञात व्युत्पत्तिक मानते हैं।

Monday, 7 June 2021

अर्थ, आशय, अभिप्राय, तात्पर्य और भावार्थ

अर्थ, आशय, अभिप्राय, तात्पर्य और भावार्थ

 ये पाँचों शब्द प्रायः समानार्थी माने जाते हैं। शब्दकोश भी इनके अर्थ मिलते-जुलते देते हैं किंतु सूक्ष्म रूप से देखें तो इनमें निश्चय ही कुछ अंतर है । अर्थ से तात्पर्य सामान्यतः शब्दार्थ से होता है। आप किसी उक्ति , कथन में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ जानते हैं तो आप उक्ति का सामान्य अर्थ भी जानते हैं। उस अर्थ को बता भी सकते हैं। आशय और अर्थ में बस इतना ही अंतर है कि शब्दों का अलग-अलग अर्थ जाने बिना भी आप संदर्भ समझते हुए बात का आशय ग्रहण कर लेते हैं।
तात्पर्य इससे कहीं आगे हैं। यह तत्परता का दूसरा रूप है। तत्पर अर्थात उसके बाद आने वाला (तत् परम्)। जब आप किसी बात के गूढ़ अर्थ समझाने लगते हैं, एक के बाद एक उसकी परतें खोलने लगते हैं, तब आप तात्पर्य समझा रहे होते हैं और दूसरा भी तात्पर्य ग्रहण कर रहा होता है।
अभिप्राय मैं अभि उपसर्ग है और इसका आशय गति करने के निकट है (संस्कृत √इ धातु, अभि और प्र उपसर्ग) अर्थात आप अगले के भावों तक पहुंचते हैं। अपना अभिप्राय स्पष्ट करते हैं तो उसमें आपकी राय, आपकी धारणा भी दूसरे तक पहुंचती है क्योंकि आप अभिप्राय समझा रहे होते हैं। यह बहुत कुछ अंग्रेजी के इंटेंडेड मीनिंग सा है । (ध्यान रहे कि अंग्रेजी के मोटिफ़ शब्द को भी हिंदी में अभिप्राय कहा गया है।) तात्पर्य का संबंध विषय या वस्तु से होता है लेकिन अभिप्राय प्रायः व्यक्ति का होता है।
भावार्थ इन तीनों से थोड़ा हटकर है और थोड़ा तीनों के समान भी। तात्पर्य या अभिप्राय में आपको अपनी बात समझाने के लिए अधिक बातों, वाक्यों का सहारा लेना पड़ सकता है किंतु भाव समझाने में आप संक्षिप्तता का आश्रय लेते हैं। जो कथन या आशय है उसको आप केंद्रीय भाव मानकर समझाते हैं। आप भावार्थ समझा रहे होते हैं और दूसरा भावार्थ ग्रहण कर रहा होता है।
पुरानी किंतु शास्त्रीय शब्दावली का प्रयोग करें तो कह सकते हैं कि अर्थ और आशय में अभिधा अर्थ देखा जाता है तथा अभिप्राय, तात्पर्य और भावार्थ के लिए हमें लक्षणा और व्यंजना को भी समझना,स्पष्ट करना होता है।

Thursday, 3 June 2021

दारुहल्दी

दारुहरिद्रा बनाम किलमोड़ा


वैश्विक महामारी के कारण हल्दी  को मिली व्यापक स्वीकृति के दौर में क्या दारुहल्दी (लकड़ी की हल्दी, tree turmeric) Berberis aristata को आप जानते हैं? उत्तराखंड में यह रसीला मौसमी जंगली फल "किलमोड़ा" नाम से जाना जाता है। भारत, नेपाल, भूटान में हिमालयी क्षेत्र में  इसकी झाड़ियाँ  प्राकृतिक रूप से उगी मिलती हैं। कुर्ग (कर्नाटक) और केंडी (श्रीलंका) की पहाड़ियों में भी मैंने इसे देखा है। हम पहाड़ के लोग इसके फल-फूलों पर ही मुग्ध रहे और वन-दोहकों ने इसकी जड़ें भी खोदकर महँगे दामों में बेच डालीं।

दारुहरिद्रा के फल, फूल, पत्तियाँ, छाल, लकड़ी, जड़ें सब कुछ उपयोगी है। इधर कुछ वर्षों से इसके फलों का रस बाज़ार में दिखाई देने लगा है जो बहुत सीमित मात्रा में कुटीर उद्योग के रूप में तैयार किया जाता है और कुछ दिनों में ही ख़राब हो जाता है।


जानकार लोग जड़ों को उबालकर बहुमूल्य रसौंत बनाते हैं जो आयुर्वेद में अनेक योग, रस, रसायन बनाने के काम आता है। चर्म उद्योग में तने की लकड़ी तथा जड़ें प्राकृतिक रूप से शोधन और रंजन के काम आती हैं।

दारुहल्दी को संस्कृत में दार्वी, पर्जन्या, पीता, पचम्पचा, कालियक, हरिद्रु, पीतदारु, पीतक आदि नामों से भी जाना जाता है। यह आयुर्वेद में एक महाऔषधि है। भावप्रकाश निघंटु में दारुहल्दी के गुणों का अद्भुत वर्णन मिलता है।


हृदय, पित्त, मधुमेह, रक्तचाप, जीर्ण ज्वर, खाँसी, दमा, मूत्रमार्ग की पथरी, रक्ताल्पता आदि अनेक रोगों में अपने गाँव में पितृ, पितृव्य, बांधवों को (जो परंपरा से वैद्य व्यवसायी थे) इसके योग बनाकर देते हुए देखा है।

Saturday, 3 April 2021

अजब मेरी दिल्ली


मेरी दिल्ली



पहाड़ी दिल्ली
दिल्ली की कुछ बस्तियों के नाम पहाड़ी सैरगाह होने के भ्रम में डाल सकते हैं:
* पहाड़ गंज
* पहाड़ी धीरज
* रायसीना पहाड़ी
* आनंद पर्वत
* पूसा हिल
इनमें रायसीना पहाड़ी को छोड़कर बाकी सब घनी आबादी वाले क्षेत्र हैं जहाँ किसी पहाड़ी का कोई नाम निशान नहीं रहा। हाँ, रायसीना की पहाड़ी सौभाग्यशाली है। यहाँ अंग्रेजों ने शानदार वायसरॉय हाउस बनवाया जो आज राष्ट्रपति निवास है। इसके पिछले भाग में 'रिज' वनक्षेत्र फैला हुआ है। रिज ही दिल्ली की पुरानी अरावली पर्वतमाला है। अब इसके कुछ भाग ही मानवीय हस्तक्षेप से बचे रह गए हैं।

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यह INA वह आई एन ए नहीं

नई दिल्ली में दो बस्तियाँ परस्पर निकट हैं:  INA कॉलोनी और INA मार्केट। इनका संबंध नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी से नहीं है। ये दोनों सफदरजंग हवाई अड्डे के निकट हैं और यह नाम एक  भारतीय विमानन कम्पनी 'इंडियन नेशनल एयरवेज़' के नाम पर है जो पहले निजी स्वामित्व की थी और बाद में अधिग्रहण से सरकारी हो गई।

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"टाइपो" की चूक

दिल्ली के एक संभ्रांत क्षेत्र का नामकरण टाइपो (टाइप की अशुद्धि) से जन्मा और अब रूढ़ हो गया है। इंद्रप्रस्थ दुर्ग अर्थात् पांडवों के किले की ओर जाने वाले प्रसिद्ध मार्ग का नाम पांडव रोड Pandava Road रखा गया था जिसे एक टाइपिस्ट ने पंडारा रोड (Pandara Road) कर दिया, (अंग्रेजी r और v की बनावट भ्रामक तो होती ही है)। आज पंडारा रोड दिग्गज नौकरशाहों की सरकारी बस्ती है।

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ल्यूटियन्स दिल्ली

इधर ल्यूटियन्स गैंग या खानमार्केट गैंग शब्द राजनीतिक भाषा में चल पड़े हैं किंतु वास्तविक ल्यूटेन्स या खान का किसी गैंग से कभी कोई संबंध नहीं रहा। ल्यूटेन वह वास्तुकार इंजीनियर था जिसने राष्ट्रपति निवास और संसद भवन सहित नई दिल्ली की परिकल्पना की। आज नई दिल्ली में सत्ता और धनसंपन्न संभ्रांत लोगों की बस्तियों वाला क्षेत्र ल्यूटियन्स दिल्ली कहा जाता है। और ल्यूटियन्स दिल्ली में स्थित अमीर बाज़ार खानमार्केट का नाम जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां के बड़े भाई डॉ जब्बार खां के नाम पर है।

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एक नाम दो बाज़ार

बटवारे के नाम से डर सबको लगता है किंतु अजब दिल्ली में एक ही व्यक्ति के नाम को दो टुकड़ों में बाँटकर दो बाज़ारों का नामकरण किया गया है। मेहरचंद खन्ना प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे जो पूर्व मंत्री होने पर भी आज़ादी के बाद पाकिस्तान में सीमांत गांधी के साथ कैद कर दिए गए। रिहा होकर भारत लौटे। नेहरू मंत्रिमंडल में पुनर्वास मंत्री भी रहे। उनके नाम का पूर्वार्ध लेकर बना मेहरचंद मार्केट और उत्तरार्ध से खन्ना मार्केट। यह बात और है कि दोनों बाज़ार पास-पास ही हैं।

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बंगाली मार्केट

यदि आप समझते हों कि बंगाली मार्केट किसी बंगाली ने बसाई होगी या यह बंगालियों की बस्ती होगी तो अपनी भूल सुधार लीजिए। यह लाला बंगाली मल लोहिया के नाम पर बसाई गई है और उनका बंगाल से कोई संबंध नहीं था। आज शहर के केंद्र में होने से बंगाली मार्केट बहुत लोकप्रिय है। संभ्रांत बंगालियों की बस्ती तो चितरंजन पार्क है जिसे नई पीढ़ी में चितरंजन पार्क से अधिक सीआर पार्क के नाम से जाना जाता है।
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 घंटाघर से खारी बावली
पुरानी दिल्ली में एक प्रसिद्ध स्थान है घंटाघर जहाँ कोई घंटा नहीं बजता न दिखाई पड़ता है। मिठाई की बहुत पुरानी और प्रसिद्ध दुकान घंटेवाला की दुकान पर या आसपास कोई घंटा/घंटी नहीं रही। नाईवालान, चूड़ीवालान, झंडेवालान में केवल नाई, चूड़ी या झंडों का ही नहीं अनेक प्रकार के व्यवसाय होते हैं। ऐसे ही फूलोंवाली गली या पतंगवाली गली। हाँ, पराठे वाली गली में पराठे अब भी मिलते हैं। नई सड़क बहुत पुरानी है। खारी बावली का कोई अतापता नहीं रहा, यहाँ अब मसालों का कारोबार होता है।

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यंग और जंग

दक्षिण दिल्ली में एक बस्ती है जंगपुरा। इसका संबंध न तो पहले या दूसरे विश्व युद्ध से है, न आज़ादी की लड़ाई से, न मोर्चा यानी ऑक्सीडेशन वाली जंग से। रायसीना पहाड़ी पर जब वाइस रॉय का आवास बना तो उसके आवागमन की सुविधा के लिए रायसीना गाँव को हटाना आवश्यक हो गया। तत्कालीन डेपुटी कमिश्नर यंग ने गाँववालों को  जहाँ बसाया वह यंगपुरा कहा गया जो आज जंगपुरा कहा जाता है।
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बोलने-सुनने के नाम
कुछ स्थानों के नाम सुनने में बड़े रोचक हो गए हैं। स्वन विज्ञानियों के लिए अकार-लोप (श्वा लोप schwa deletion) के उदाहरण:
लज्पत् नगर < लाजपत नगर
जंकपुरी < जनकपुरी
तिल्क नगर < तिलक नगर
मुख सुख और नए चलन ने भी सद्गति की है
करमपुरा
सीपी
साउथैक्स
एचके
डीयू
सियार पार्क < सीआरपार्क <चितरंजन पार्क।
आर्के पुरम < आर के पुरम (रामकृष्ण पुरम)।

मलाई मंदिर < मलै (पर्वत) मंदिर।

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भटकाने वाले नाम

गाँव और शहरी क्षेत्र में अधिकृत-अनधिकृत, नियमित-अनियमित हजारों बस्तियाँ हैं जिनमें लगभग दो करोड़ लोग रह रहे हैं। इन बस्तियों के नामों में कुछ पुनरावृति होना स्वाभाविक है किंतु कुछ ऐसी जगहें हैं जिनको अगर आप एक दूसरे से संबद्ध  या एक दूसरे के निकट मान लें तो आप अपने गंतव्य से से मीलों दूर पहुँच सकते हैं। जैसे: 

¶पटेल रोड, पटेल नगर, पटेल चेस्ट अस्पताल ;

¶विकास मार्ग, विकास पुरी, विकास नगर;

¶इंद्रप्रस्थ मार्ग, इंद्रप्रस्थ किला, इंद्रप्रस्थ अपार्टमेंट्स, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, इंद्रप्रस्थ विस्तार;

¶शालीमार बाग, शालीमार गार्डन; 

¶शकरपुर, शकूरपुर, शकूरबस्ती;

¶जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नेहरू संग्रहालय, नेहरू नगर, नेहरू स्टेडियम;

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कड़कड़डूमा

दिल्ली, भारत की भाँति ही, कभी गाँवों का शहर था। अब सभी गाँव शहरीकरण में बिला गए, उन्हें नए नाम मिल गए, फिर भी कुछ नाम बच गए हैं। पूर्वी दिल्ली में एक शहरीकृत गाँव है कड़कड़डूमा। नाम की आलंकारिक गूँज बरबस ध्यान खींचती है। कड़कड़डूमा के आगे एक कड़कड़ गाँव है। निकट ही एक और स्थान है कड़कड़ी। ये नाम अनुगूंज वाले देशज शब्द लगते हैं। आंचलिक हिंदी में इसका अर्थ खरा, ताजा है। फणीश्वरनाथ रेणु ने भी कहीं कहा है, "कड़कड़ी मिठाई।" स्टार्च लगी कड़ी पाग को "कड़कड़ी पाग" कहा जाता है।

 यमुना बाँगर क्षेत्र की कंकरीली कृषि भूमि होने से भी कंकड़ी/कड़कड़ी नाम पड़ा हो सकता है। गाँवों के नामों को विशिष्ट पहचान देने के लिए ग्राम निवासियों की जाति की पहचान से नाम पड़ना कभी आम बात थी। जैसे -- नांगल ठाकरान, माजरा डबास, बामन खेड़ा, बामनोली, नंगला पचौरी; ऐसे ही कड़कड़ डूमा।

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अजब शहर है दिल्ली। जिस ओर से भी देखें एक नया दृश्य। अजब-सी कहानियाँ। गजब के लोग।

युवा कवि पंकज राग की पंक्तियाँ याद आती हैं :

"दिल्ली को खोजना है तो 

ऐसी जगहों पर भी जाना होगा

शहर सिर्फ महामहिम ही नहीं,

बहुत से मामूली लोग भी बसाते हैं

दिल्ली

शहर दर शहर, 

सिर्फ निगहबानों की नहीं

इंसानों की भी कहानी है।"

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Thursday, 1 April 2021

नख चर्चा 💅

अब तो खुजाने-चुभाने के काम के रह गए...
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अमीर खुसरो को एक दिन जाने क्या सूझी कि सुबह-सुबह हत्याएं करने बैठ गए। एक-दो के नहीं, पूरे बीस के सिर उड़ा दिए लेकिन कानून तो कानून है; बीस सिरों को कलम करने के बाद भी कानून की नजर से साफ़ बच गए और लिख दिया कि सनद रहे:
" बीसों का सिर काट लिया 
ना मारा ना खून किया .."
अब तो हम-आप भी यह काम कर लेते हैं और साफ बच निकलते हैं। 
नाखून की व्युत्पत्ति ढूँढ़ना कठिन नहीं है। यह फ़ारसी से आया है हिंदी/उर्दू में। किंतु इसका पूर्वज यहीं का है । संस्कृत में नख की कहानी अवश्य कुछ रोचक है। इसमें वर्णों के उलटफेर का चक्कर है। नख बना है संस्कृत √खन् (खोदना) से। खोदने के उपकरणों में मनुष्य के पास प्रकृति का दिया हुआ प्राचीनतम उपकरण है, तब से जब वह वन्य पशुओं के साथ वनों में विचरण करता था। वह है उसका आदिम औजार नाखून जो मांस, फल- फूल को खोदने- नोचने के काम आता था। आपसी लड़ाई में लड़ने के भी। खन् का वर्ण विपर्यय हुआ नख में।  

यही नख पुरा - भारोपीय (PIE) *h₃nogʰ-   से प्राचीन ग्रीक में ओनख, लैटिन में उँगविस, अल्बानियाई में न्येल, अंग्रेजी में नेल,  लिथुआनियन् में नगस्, रूसी में नगा, फ़ारसी में नाखून बनकर फिरसे भारत आ गया। 
अब नाखून को विदेशी मानें या स्वदेशी?

Monday, 18 January 2021

माँ : कुछ रेखाएँ

एक
जब तैर न रहे हों घर-भर में
असीसों के स्वर
आँचल की अनाम गंध
थम जाए अचानक
रजनीगंधा बिछी-बिखरी न मिले 
दिखाई न दे किसी घोंसले में 
सिकुड़ी-दुबकी चिड़िया 
तो समझ लो 
नहीं रही माँ ...
•••
मरती कभी नहीं माँ
बस हो जाती है बादलों की ओट
सात आसमानों के परे
और भेजती रहती है तरंगें
असीसों की दिन-रात
मरती नहीं है माँ।

दो
माँ स्वर है पिता व्यंजन 
माँ भाषा तो पिता व्याकरण 
माँ जीवन का प्रवाह 
और पिता 
प्रवाहित जीवन का अनुशासन !

तीन
अँधेरे के ताने-बाने सुलझाती
उम्मीदों के गीतों को दोहराती
समय के बहुत पुराने करघे पर
यादों के कपड़े बुनती है माँ।
कभी किसी खटिया पर
चिड़िया-सी दुबकी सिमटी
सुमरनी फेरती है
जैसे घड़ियाँ गिनती है
पौ फटने की
सूरज उगने की
अपने अँधेरे के बीच
औरों के उजाले के
सपने देखती है माँ।
~सुरेश