विश्व पुस्तक मेला, 2023 से
राह भटकी किताब का टोटका
(व्यंग्य)
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टोना-टोटका, झाड़-फूँक में कभी विश्वास नहीं किया। कालेज पढ़ाई के दिनों में एक फिरक्कड़ पंडिज्जी गाँव में आ गए थे। कहते थे हम बद्रीनाथ के पंडा हैं। हमारा हाथ जबरदस्ती खींच कर हथेली की एक रेखा पर अंगुली फिराते हुए बोले, "अरे बाबू, तुम्हारा स्त्री लोग से झगड़ा हुआ करेगा।" हम पूछे कैसे, तो वे संस्कृत का एक ठो कोटेशन फँसाते हुए बोले, यह जो रेखा देख रहे हो ना, इसका फल है जनानां विवादा। जनानां विवादा मने जनाना से झगड़ा फसाद होगा। तब से हम किसी जनाना के सामने से गुजरने में भी घबराने लगे। शादी के मंडप में भी इस आश्वासन के बाद गए कि बीच में परदा लटका रहेगा।
खैर, हम मुद्दे से भटक न जाएँ। असल में हम दूसरी बात करना चाह रहे थे। यह जो दिल्ली में तामझाम के साथ एक मेला लगा है ना। वह क्या कहते हैं कि विश्व पुस्तक मेला, इसके हम बहुत पहले से मुरीद रहे। लोगों को तो अब याद भी नहीं होगा कि पहले यह जनपथ के पीछे वाले मैदान में लगा था जहाँ अब मैदान नहीं, काला आसमान है और आसमानी इमारतें हैं। फिर बड़ी अदालत के पीछे सुनसान और वीरान से मैदान में लगने लगा जिसे प्रगति मैदान कहा गया। हम सबमें जाते रहे। फिर जाना कुछ कम हुआ। दो साल कोरोना से बंद हो गया। अबकी जी कड़ा कर के लाठी लेकर निकलने की सोचे तो सूरदास जी याद आने लगे "मन उमगत, तन नाहीं।"
पिछले पुस्तक मेलों में हम पाठक की हैसियत से जाते और झोला भर पुस्तकें खरीद लाते। जरूरी और कभी-कभी गैरजरूरी भी। इस बार कुछ ऐसी मति मारी गई कि लेखक की हैसियत से पहुँचने की ठानी। ईमानदारी से कह रहे हैं कि हमने कभी कुछ लिखा उखा नहीं, लेकिन जाने क्यों कुछ लोग बिना हमसे चाय-पानी पिए हमें पुराना साहित्यकार मानने लगे। पहली किताब कभी छपी तो उसके लेखक, संपादक, प्रकाशक, प्रचारक, वितरक और विक्रेता हम ही हम रहे। पूँजी जरूर श्रीमती जी ने लगाई थी और डूब गई। जनाना विवादा में पड़ने की डर से उस पहली उधारी का ब्याज हम आज तक चुका ही रहे हैं। बाद में जिन प्रकाशकों ने मेरी किताबें छापीं उन्हें पुस्तक मेला बकवास लगता था और प्रगति मैदान टेढ़ा आँगन लगता था जहाँ नाचा ही नहीं जा सकता। बहरहाल, बयाने इकबालिया यह कि हमारी पुस्तक कभी पुस्तक मेला नहीं पहुँची। इस बार हम इस मुगालते में थे कि अपनी नाजुक-सी उमरिया की शताब्दी पूरी होते-होते कम से कम एक किताब तो पुस्तक मेले पर पहुँचेगी और हम अपनी सिकुड़ती- सिकुड़ाती 26 इंची छाती ठोक के कह सकेंगे कि देखो, हम पुस्तक मेले में मौजूद हैं। लोगों को ललकार रहे थे। रे भैया, हिम्मत हो तो एक नजर हमारी कितबिया की ओर भी फेर लेना। लेकिन वह जो कहते हैं न कि कानी के ब्याह में नौ झंझट। तीन दिन से "शब्दों के साथ-साथ" नाम की हमारी पुस्तक प्रकाशक के कारिंदों के साथ-साथ स्टोर से चल तो पड़ी, लेकिन प्रगति मैदान तक पहुंची नहीं। खरीदार स्टाल पर पहुंचें और विक्रेता कहें अभी आएगी, पर पुस्तक थी कि बेवफा माशूका की तरह वादा तोड़ने पर कायम। नौ दिन चले अढ़ाई कोस की प्रगति भी नहीं। बड़ा गुस्सा आया पंडित नेहरू पर। उन्होंने बेकार इस मैदान का नाम प्रगति मैदान रख दिया। मेरी चले तो मैं इसका नाम बदलकर विकास मैदान या ऐसा ही कुछ कर दूँ।
तीन दिन से कोई तीन दर्जन (अब यह मत कहिए कि आदमी की नाप-जोख दर्जन में नहीं होती) अपने परिचित-अपरिचित सखा-सखी, भाई-बहन, बेटा-बिटिया लोग का संदेश आ रहा है कि मेले में हमारी पुस्तक रूपी दूतिका के दर्शन नहीं हुए। अरे भाई, होंगे कैसे! वह तो अभी चरैवेति चरैवेति का उपनिषद मंत्र जप रही है। आ जाएगी कल, कल नहीं तो परसों, जैसे अपने देस में आ रहा है वह ...। एक मित्र तो घर ही पधार गए के भाई दर्शन तो कराओ अपनी पुस्तक के। अब हमारे पास हो तो दर्शन कराएँ। हमें तो प्रकाशक ने सिर्फ फोटो भेजी थी। इधर मित्र हैं कि विश्वास करने को तैयार नहीं कि किसी की किताब छपे और वह किताब की फोटो को ही असली मान ले। बहरहाल हम विवश थे, क्या करते।
हम भाग्यशाली हैं कि हमारे कुछ हितेषी अभी हैं, मने अभी चोला बदली करके परलोक गमन नहीं किए हैं। उन्होंने सुझाया कि किसी अच्छे ज्योतिषी को जन्मपत्री दिखा लो। जरूर कोई ऊपरी बाधा है। कृपा कहीं रुक रही है । कृपा खुले तो रस्ता खुले, रस्ता खुले तो पुस्तक निकले, पुस्तक निकले तो पुस्तक मेला पहुंचेगी ही पहुंचेगी और कहां जाएगी निगोड़ी। हमने बताया अपना अख्खा जिन्नगी में जोतिशी लोगों ने बहुत कर्मकांड, टोना-टोटका, खेलन-कीलन, चाटन- उच्चाटन का बात किया। और एक बार एक जीन बुस्सट वाला तांत्रिक बाबू तो पूरे परिवार की जन्मपत्रियों के साथ ही साथ ₹5000 ऐसा झटक के ले गया कि अब तक उसका उत्तर दक्खिनै का पता नहीं। इसलिए हम कहीं नहीं जाएंगे। लेकिन वह कहते हैं न कि होनी होके रहती है। हम भितरघात के शिकार हो गए। भीतर वालों ने बिना हमारी मांग के हमारी जेब में कुछ नोट ठूँसे (ऐसा अघट आज तक नहीं घटा) और समझाया इतने दिन आँखें फोर के उस कितबिया के पीछे लगे रहे। वो कहीं अटक गई है तो जाओ और उसका कुछ उपाय करो। इतने दिन हमें छोड़कर उसे अपनी बनाए रहे तो उसकी खोज खबर कौन करेगा। हम जनाना विवाद उरझाना नहीं चाहते थे, इसलिए सिर झुकाकर चल पड़े।
अब हम सई साँझ दो घंटे से एक बड़े नामी संत महात्मा, त्रिकालदर्शी के दरबार में बैठे हैं कि अटकी हुई कृपा खोलें। उनके चेला-चाँटी, गुमाश्तों ने टिकट, भेंट, चढ़ावा, दक्षिणा के नाम पर हमारी जेब खाली कर ली है। वापसी में उधारी वाली टैक्सी करके लौटेंगे। पर किसी भी तरह से ऐसा टोटका जरूर करवाएँगे कि कृपा खुले और हमारी इकलौती चहेती (मने पुस्तक, अउर कौन) मेला में पहुँचे और हमारे प्रेमियों को दर्शन दे।
आधी रात को दरसन का समय आया तो हमसे कुछ कहते नहीं बना। पर जाने कैसे संत जी सब जानते थे। वही पूछते गए और हम हर सवाल के जवाब में हां-हां कहते चले गए। अब चलते-चलते परम संत जी ने कह तो दिया है कि बच्चा (!), कल सूर्योदय के बाद शनि महाराज दूसरे नछत्र में चले जाएँगे और तुम्हारी साढ़ेसाती कम हो जाएगी और तुम्हारी पुस्तक मेले तक पहुँच जाएगी।
हम अभी भोर बेला घर पहुँचे हैं। पूरब की ओर ताक रहे हैं कि कब सूर्योदय हो और साढ़ेसाती छूटे।