Thursday, 28 November 2024

दाढ़ी बनाना और बढ़ाना


उस्तरे या ब्लेड से गाल, होंठ, ठोड़ी पर उगे बालों को छील-छालकर साफ़ करने के लिए हिंदी में दाढ़ी 'बनाना' क्रिया है जब कि इसमें 'बनाने' जैसा कुछ भी नहीं। इसके विपरीत इसके अंग्रेजी पर्याय shaving में शाब्दिक अर्थ बना रहता है, " to remove the hair or beard off with a razor." (OED)

(फोटो सौजन्य: विकीकॉमंस)
दाढ़ी छीलने के लिए अंग्रेजी में एक पारिभाषिक शब्द है– pogonotomy (the act of cutting or shaving a beard.)  यह ग्रीक शब्द pogon (दाढ़ी) +tonia (काटना ) से व्युत्पन्न है।

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संस्कृत में दाढ़ी-मूँछ को श्मश्रु कहा जाता है और इन्हें काटने-बनाने वाले कारीगर (नाई, barber) को संस्कृत में नापित कहते हैं। नापित सेे ही हिंदी आदि अनेक भाषाओं में 'नाई' शब्द बना है।

नापित (नाई) का एक रोचक पर्याय है- 'श्मश्रुवर्धक' (आप्टे)। श्मश्रुवर्धक का शाब्दिक अर्थ है– दाढ़ी (श्मश्रु) को बढ़ाने वाला (वर्धक), दाढ़ी को पाल-पोसकर बड़ा करने वाला। यह कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे दिया बुझाने को कहा जाता है– दिया बढ़ाना। अन्य पर्याय हैं– वपन, परिवापन, भद्राकरण आदि। वपन, परिवापन भी वप् धातु से बने हैं जिसका मूल अर्थ है बोना, उगाना। वप् से ही बाप बना है! चौंकिए नहीं, कुछ भाषा प्रयोग बड़े रोचक होते हैं।

 इस काम के लिए एक अन्य शब्द क्षौर कर्म भी है। क्षौर कर्म के अंतर्गत मुंडन के साथ-साथ अनेक क्रियाएँ आ जाती हैं, केशश्मश्रुनखादीनां कर्त्तनं संप्रसाधनम् । अर्थात क्षौर के अंतर्गत केश, दाढ़ी-मूँछ, नाखून आदि काटकर सजना-सँवरना आदि क्रियाएँ मानी गई हैं। 

अरबी से हिंदी-उर्दू में आया हुआ "हजामत" भी लगभग ऐसा ही है। इसलिए "दाढ़ी बनाना" उपयुक्त है। ढूँढाड़ी में दाढ़ी बनाने के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है– सुँवार बनाना, सुँवारना। सुँवार शब्द 'सँवरने' का ही स्थानीय रूप है।


Tuesday, 12 November 2024

कुमाऊँ में बसंत और पतझड़



पहाड़ की मुख्य ऋतुएँ हैं :
१.बसंत, 
२. रूड़ (ग्रीष्म), 
३.चौमास (वर्षा + शरद), 
४. ह्यून (हेमंत + शिशिर)
चौमास की सीमा शरत्काल तक खिंचती है और ह्यून की हेमंत से शिशिर तक।
वसंत और पतझड़ के लिए कोई स्वतंत्र शब्द कुमाउँनी में नहीं हैं। अर्थ विस्तार या लाक्षणिक शब्दों से काम चलाया जाता है। जैसे:
पौयीण/पौलीण/पौल्यार, पालूँ (पल्लवन, नई कोंपलें आना), संस्कृत पल् + लव = पल्लवन से।
पौल/पौय - पौयीण दिन, पल्लवित होने के दिन, पौल्यार अर्थात वसंत ऋतु।
झरण (झरना, गिरना, टपकना) से झऱ्यौ , पत्ते झरने के दिन। अर्थात पतझड़।
झार्य और पौय शब्द इन्हीं के आंचलिक रूप लगते हैं। कुछ सीमित क्षेत्रों को छोड़कर इन शब्दों का प्रयोग नहीं होता। व्यवहार में ये दोनों शब्द दुर्लभ हैं। इनके स्थान पर हिंदी के बसंत और पतझड़ शब्द ही अधिक प्रचलित हैं।