पहाड़ की मुख्य ऋतुएँ हैं :
१.बसंत,
२. रूड़ (ग्रीष्म),
३.चौमास (वर्षा + शरद),
४. ह्यून (हेमंत + शिशिर)
चौमास की सीमा शरत्काल तक खिंचती है और ह्यून की हेमंत से शिशिर तक।
वसंत और पतझड़ के लिए कोई स्वतंत्र शब्द कुमाउँनी में नहीं हैं। अर्थ विस्तार या लाक्षणिक शब्दों से काम चलाया जाता है। जैसे:
पौयीण/पौलीण/पौल्यार, पालूँ (पल्लवन, नई कोंपलें आना), संस्कृत पल् + लव = पल्लवन से।
पौल/पौय - पौयीण दिन, पल्लवित होने के दिन, पौल्यार अर्थात वसंत ऋतु।
झरण (झरना, गिरना, टपकना) से झऱ्यौ , पत्ते झरने के दिन। अर्थात पतझड़।
झार्य और पौय शब्द इन्हीं के आंचलिक रूप लगते हैं। कुछ सीमित क्षेत्रों को छोड़कर इन शब्दों का प्रयोग नहीं होता। व्यवहार में ये दोनों शब्द दुर्लभ हैं। इनके स्थान पर हिंदी के बसंत और पतझड़ शब्द ही अधिक प्रचलित हैं।
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