क़सम के साथ खाना क्रिया जोड़ने का संबंध एक प्राचीन ईरानियन प्रथा से है। एक जोरास्त्रियन (पारसी) रिवाज़ था जिसके अनुसार क़सम खाने का कर्मकांड पवित्र जल के साथ रोटी खाकर संपन्न होता था। पहलवी से चलकर फ़ारसी में आते-आते इसे ''सौगंद ख़ुर्दम '' (सौगंध खाना) कहा गया। फ़ारसी से हिंदी / उर्दू में क़सम (अरबी) के साथ भी खाना क्रिया लग गई।
देखा- देखी शपथ (संस्कृत) भी खाई जाने लगी !
शपथ के लिए एक हिंदी शब्द है "सौंह"। वीरवल्ली आर जगन्नाथन ("छात्र कोश") तथा कुछ अन्य हिंदी कोश इसे "सौगंध" से व्युत्पन्न मानते हैं किंतु यह संस्कृत शपथ से व्युत्पन्न होता है। प्राकृत में सवहो/ सवहं हिंदी में सौंह, सौं, सूँ।
संस्कृत शब्दकोशों में सौगंध शब्द प्राप्त नहीं होता। यदि गंध से 'सु' जोड़कर किसी प्रकार (बलात्) सिद्ध कर भी लें तो गंध/ सुगंध का भाव शपथ, कसम में किसी प्रकार नहीं आता। इसे समरूपी भिन्न मूलक या भ्रामक व्युत्पत्ति का शब्द मान सकते हैं।
यह जानना रोचक होगा के सौगंध चाहे राम की खाएँ या संविधान की, यह शब्द हिंदी में फ़ारसी के समरूप बना लिया गया है। फ़ारसी में 'सौगंद' है, अर्थ है शपथ, क़सम। हिंदी में बलात् तत्समीकरण की प्रवृत्ति से सौगंद ही ढलकर सौगंध (शपथ) हो गया है। यह बात और है कि इसमें न भारतीय गंध है, न सुगंध।