फाड़ना क्रिया (√स्फुट् > स्फाटन> प्रा.फाडण> हिं. फाड़ना) चीरने, अलग करने के अर्थ में है किंतु हम बहुत कुछ और भी फाड़ लेते हैं! आँखें फाड़कर देखना, कानफाड़ू आवाज़, गला फाड़कर चिल्लाना, दूध फाड़ना, गुस्से में किसी को फाड़कर रख देते हैं या फाड़ खाते हैं- इस अमानुषिक कृत्य में किसी का शाकाहारी होना आड़े नहीं आता! 'दूध फाड़ना' क्रिया के दो प्रक्रिया-स्वरूप हैं- पहली है दूध में कुछ खट्टा डालकर फाड़ना जिससे उस की रासायनिक संरचना बदल जाती है। दूसरी प्रक्रिया में एक विशेष लोटे में गर्म दूध को ठंडा करने के लिए डेढ़ मीटर ऊँचाई तक हाथों को खोलकर दूसरे बर्तन में उँड़ेलना, ऐसे ही उलट-पलट करना भी दूध फाड़ना कहा जाता है। यह कौशल उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश के हलवाइयों में अधिक देखा है। कहीं इसे दूध खींचना भी कहा जाता है। मलेशिया में इस प्रकार खींची हुई चाय बहुत लोकप्रिय है। ऐसी "खिंची चाय" (Teh Tarik) बनाने की बाक़ायदा प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं।
भाषा, वक्ता और लेखक दोनों के व्यक्तित्व का परिधान है। उसे सँभाल-सहेज कर प्रयोग करना पसंद-नापसंद का विषय नहीं है बल्कि अनिवार्य है। इसलिए भाषा विवेक का बड़ा महत्त्व है। आजकल इसका चलन कम हो गया है जिसका प्रभाव समाज पर स्पष्ट दिखता है। जैसे 'फाड़ना' क्रिया के ग्राम्य, अश्लील, अशिष्ट प्रयोग भी चलते हैं। न भूलें कि भाषा समाज सापेक्ष होती है, व्यक्तित्व का निर्धारण करती है और बरतने वाले के व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित भी करती है। कोई शब्द अपने आप में दूषित नहीं होता, प्रयोक्ता दूषित करता है। भाषा को बरतने का अनुशासन सब नहीं जानते।
तुलसीदासजी ने फाड़ना (फारना अ.)
फारि/फाड़ का अद्भुत प्रयोग बीभत्स रस में किया है। महादेव के गण-
"लाथिन सों लोहू के प्रवाह चले जहाँ तहाँ
मानहुँ गरिन गेरु झरना झरत हैं।
सुभट सरीर नीर बारी भारी भारी तहाँ
सूरनि उछाह कूर कादर डरत हैं।
फेकरि फेकरि फेरु *फारि फारि* पेट खात
काक कंक बालक कोलाहल करत हैं।।
तुलसी का शब्द चयन औऱ काव्यकौशल अद्भुत है। यहाँ जुगुप्सा का भाव सघन हुआ है, ग्राम्यत्व का स्पर्श भी नहीं है।
भाषा समाज की शक्ति है, दर्पण और उपकरण भी। इसलिए बरतने के अनुशासन की बात की गई है। प्रदूषित भाषा प्रदूषित और रुग्ण समाज का एक लक्षण है, एक पहचान। सामाजिक मूल्यों में ह्रास का स्वाभाविक प्रतिफलन हमारी भाषा में देखा जा सकता है।