"खाजा"
खाजा की व्युत्पत्ति इस प्रकार है <संस्कृत : खाद्यक, > प्राकृत : खज्जअ, > हिंदी : खाजा।
हिंदी में खाजा किसी भी खाद्य पदार्थ के लिए है। चूहा बिल्ली का खाजा है। इसके मुहावरे हैं- खाजा बनना, खाजा का अकाल पड़ना, अकाल का खाजा।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक "अंधेर नगरी" में चौपट राजा का लक्षण है: जिसके राज में भाजी और खाजा एक भाव बिकें, टके सेर।
कुमाऊँ में खाजा कच्चे चावलों को कहा जाता है जिसे सीधा बुकाया (चबाया) जाता है। बुकाए जाने के कारण ही गढ़वाल में कुमाऊँ का खाजा बुकणा कहलाता है।
भुना चावल भी खाजा हो सकता है कुमाऊँ में। तैयार करने की विधि और नाम कुछ भिन्न है।
• कच्चे धान को भूनकर कूटने के बाद प्राप्त चावल जिसे सिरौल कहा जाता है।
• एक विशेष प्रकार के धान के कच्चे चावल भूनने पर खील जैसे फूल जाते हैं जिन्हें आसानी से "बुकाया" जा सकता है। इन्हें खजिया कहा जाता है।
खाजा, खजिया, सिरौल, बुकणा सभी को अखरोट की गिरी, भाँग या भङिर साथ चबाना विशेष आनंददायक होता है।
महिलाएँ आँचल में खाजा/बुकणा रखकर सुबह ही काम पर निकल पड़ती हैं। इसकी गाढ़ी खीर 'खिरखाजा' अच्छा नाश्ता है।
बिहार, झारखंड में खाजा मैदे से बना विशेष लोकप्रिय पकवान है जिसमें मालूशाही की भाँति अनेक परतें होती हैं ।
पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उड़ीसा में भी खाजा प्रिय पकवान है। महाराष्ट्र का मालवणी खाजा और काकीनाडा (आंध्र प्रदेश) का खाजा भी बहुत लोकप्रिय व्यंजन हैं।
