Saturday, 25 September 2021

खाजा

"खाजा"
खाजा की व्युत्पत्ति इस प्रकार है <संस्कृत : खाद्यक, > प्राकृत : खज्जअ, > हिंदी : खाजा। 
हिंदी में खाजा किसी भी खाद्य पदार्थ के लिए है। चूहा बिल्ली का खाजा है। इसके मुहावरे हैं- खाजा बनना, खाजा का अकाल पड़ना, अकाल का खाजा।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक "अंधेर नगरी" में चौपट राजा का लक्षण है: जिसके राज में भाजी और खाजा एक भाव बिकें, टके सेर।
कुमाऊँ में खाजा कच्चे चावलों को कहा जाता है जिसे सीधा बुकाया (चबाया) जाता है। बुकाए जाने के कारण ही गढ़वाल में कुमाऊँ का खाजा बुकणा कहलाता है।
भुना चावल भी खाजा हो सकता है कुमाऊँ में। तैयार करने की विधि और नाम कुछ भिन्न है। 
• कच्चे धान को भूनकर कूटने के बाद प्राप्त चावल जिसे सिरौल कहा जाता है।
• एक विशेष प्रकार के धान के कच्चे चावल भूनने पर खील जैसे फूल जाते हैं जिन्हें आसानी से "बुकाया" जा सकता है। इन्हें खजिया कहा जाता है।
खाजा, खजिया, सिरौल, बुकणा सभी को अखरोट की गिरी, भाँग या भङिर साथ चबाना विशेष आनंददायक होता है।
महिलाएँ आँचल में खाजा/बुकणा रखकर सुबह ही काम पर निकल पड़ती हैं। इसकी गाढ़ी खीर 'खिरखाजा' अच्छा नाश्ता है।
बिहार, झारखंड में खाजा मैदे से बना विशेष लोकप्रिय पकवान है जिसमें मालूशाही की भाँति अनेक परतें होती हैं । 
पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उड़ीसा में भी खाजा प्रिय पकवान है। महाराष्ट्र का मालवणी खाजा और काकीनाडा (आंध्र प्रदेश) का खाजा भी बहुत लोकप्रिय व्यंजन हैं।

Saturday, 11 September 2021

अपनी हिंदी सबकी हिंदी

• कोई भी जीवित भाषा नदी की भाँति निरंतर बहती है, वह व्याकरण की चिंता नहीं करती. उसके प्रयोक्ता उसे आगे बढ़ाते हैं. व्याकरण तो उसका पीछा करता है. इसलिए व्याकरण के नियम जब तक स्थिर होते हैं तब तक भाषा आगे निकल जाती है.

• हिंदी संस्कृत से भले ही विकसित हुई हो किंतु आज वह प्राकृत, अपभ्रंश के पड़ावों को पार करती हुई संस्कृत से दूर निकल आई है और एक स्वतंत्र भाषा है। उसका अपना व्याकरण है। इसलिए उस पर संस्कृत व्याकरण को थोपा नहीं जा सकता। हाँ, जहाँ तक संगत हो, उससे दिशा-निर्देश लिया जा सकता है। हिंदी व्याकरण वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) है, इसलिए बाध्यकारक नहीं। संस्कृत व्याकरण निर्देशात्मक (प्रेस्क्रिप्टिव) है, पाणिनीय नियमों का उल्लंघन स्वीकार नहीं करता। हिंदी में व्याकरण से भिन्न लोकस्वीकृत भाषा रूप भी स्वीकारे जाने चाहिए, किंतु इसका आशय यह नहीं कि मनमानेपन की छूट हो।

• हिंदी का सौभाग्य है कि उसे अलग अलग राज्यों-देशों के लोग अपने-अपने ढंग से बोलते हैं. हरयाणवी हिंदी या हैदराबादी हिंदी या ‘गोरों’ की हिंदी हमारी अपनी हिंदी भाषा की शोभा बढाती हैं, उसकी व्यापकता और अपरिहार्यता को रेखांकित करती हैं.

• हिंदी कैसी हो, उसकी वर्तनी, प्रयोग आदि पर बहसों में हिंदी-भाषी का मत ही ग्राह्य हो, यह ज़रूरी नहीं. ज़रूरी है सबका सबसे संवाद.

• हम हिंदी भाषी लोग तो हिंदी वर्तनी के अनेक रूपों से परिचित है, इसलिए हमें हिंदी आसान लगती है पर जो चेन्नई, दीमापुर, कवरत्ती या न्युयार्क, बीजिंग, तोक्यो, केपटाउन जैसे दूरदराज के स्थानों  से हिंदी सीख रहे है उनके लिए हिंदी बहुत कठिन भाषा है और एक ही शब्द को लिखने-बोलने के अलग-अलग तरीकों से वे भ्रमित होते हैं. मानकीकरण एकरूपता के लिए होता है, जिससे सीखने-पढ़ने में आसानी होती है. उससे नाक-भौंह सिकोड़ना हिंदी के व्यापक हित में नहीं है।

Thursday, 9 September 2021

गोरखधंधा वर्जित शब्द

"रब्ब इक्क गुंझलदार बुझारत,
रब्ब इक्क गोरखधंधा।
खोल्हण लग्गेयाँ पेच एस दे,
काफ़र हो जाय बंदा।"
       ~मोहन सिंह, पंजाबी कवि
 सामान्य जन को अपने अंतर की खोज के लिए आवश्यक अनुशासन और योग साधना में प्रवृत्त करने के उद्देश्य से गुरु गोरखनाथ जी (११-वीं सदी) ने जितना प्रयत्न किया उतना शायद किसी ने भी नहीं किया। मानसिक रूप से सक्षम व्यक्ति को ही शिष्य रूप में चुनने के लिए उन्होंने इतनी विधियाँ दीं कि लोग उलझ गए की कौन-सी ठीक है, कौन-सी गलत; कौन-सी करें, कौन-सी छोड़ें। यह उलझाव इस सीमा तक जा पहुँचा कि लोग हताश होने लगे तथा गोरखधंधा शब्द प्रचलन में आ गया। जो समझ में न आ सके वह गोरखधंधा कहा जाने लगा।
यह भी कहा जाता है कि गोरखपंथी साधु लोहे या लकड़ी की सलाइयों के हेर-फेर से एक चक्र बनाते हैं। उस चक्र के बीच में एक छेद करते हैं। इस छेद में से कौड़ी या माला के धागे को डालते हैं और फिर मंत्र पढ़कर उसे निकाला करते हैं। इसी को गोरखधंधा या धंधारी कहते हैं। इस गोरखधंधे का उल्लेख योगियों के संदर्भ में प्रायः मिल जाता है। गोरखधंधा या धंधारी में से सही विधि जाने बिना कौड़ी या डोरी निकालना बहुत उलझन भरा कठिन कार्य होता है। इसीलिए गोरखधंधा शब्द का प्रचलन उलझन और झंझट वाले कार्यों के लिए होता रहा है।
कालांतर में इन विधियों का दुरुपयोग नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को छलने में भी होने लगा जिसके कारण समय के साथ -साथ यह शब्द नकारात्मक होता चला गया।
मध्यकाल के व्याख्याता पंडित हजारी प्रसाद द्विदेवी को नाथपंथी धारा का अध्येता समझा जाता है। उन्होंने लिखा है कि ‘गोरखधंधा’ एक किस्म की जटिल मस्तिष्क क्रीड़ा या दिमागी खेल होता था जिसे स्वयं गुरु गोरखनाथ ने आविष्कृत किया था। इस क्रीड़ा के माध्यम से वे अपने घुमंतू अनुयायियों की मानसिक और शारीरिक क्षमताओं को निखारने का काम करते थे। उन्होंने अपने इन अनुयायियों को समाज में जाति रहित समुदायों की स्थापना का उपदेश दिया था।

अब यह शब्द अचानक चर्चा में आया है, इस आरोप के साथ कि यह समाज के कुछ लोगों की भावनाओं को आहत करता है। हिंदी शब्दकोशों के अनुसार गोरखधंधा शब्द का अर्थ- 'जल्दी समझ में न वाली बात, पहेली, कोई जटिल कार्य जिसका निराकरण सहज न हो, अनियमितता या घपला' होता है। ये सब अर्थ लाक्षणिक (मुहावरे के रूप में) हैं। किसी वर्ग को आहत करने की बात इनसे नहीं जुड़ती।
गोरखधंधा शब्द का प्रयोग कबीर, तुलसी आदि मध्यकालीन कवियों ने भी किया है। आज उसके लाक्षणिक अर्थ के कारण कुछ लोग आहत हो रहे हैं तो इसमें बेचारे निरपराध शब्द को सजा क्यों? ऐसे धंधे रुकें जो गोरखधंधे कहलाते हों, शब्द पर रोक लगाने से वे नहीं रुकेंगे।