दारुहरिद्रा बनाम किलमोड़ा
वैश्विक महामारी के कारण हल्दी को मिली व्यापक स्वीकृति के दौर में क्या दारुहल्दी (लकड़ी की हल्दी, tree turmeric) Berberis aristata को आप जानते हैं? उत्तराखंड में यह रसीला मौसमी जंगली फल "किलमोड़ा" नाम से जाना जाता है। भारत, नेपाल, भूटान में हिमालयी क्षेत्र में इसकी झाड़ियाँ प्राकृतिक रूप से उगी मिलती हैं। कुर्ग (कर्नाटक) और केंडी (श्रीलंका) की पहाड़ियों में भी मैंने इसे देखा है। हम पहाड़ के लोग इसके फल-फूलों पर ही मुग्ध रहे और वन-दोहकों ने इसकी जड़ें भी खोदकर महँगे दामों में बेच डालीं।
दारुहरिद्रा के फल, फूल, पत्तियाँ, छाल, लकड़ी, जड़ें सब कुछ उपयोगी है। इधर कुछ वर्षों से इसके फलों का रस बाज़ार में दिखाई देने लगा है जो बहुत सीमित मात्रा में कुटीर उद्योग के रूप में तैयार किया जाता है और कुछ दिनों में ही ख़राब हो जाता है।
जानकार लोग जड़ों को उबालकर बहुमूल्य रसौंत बनाते हैं जो आयुर्वेद में अनेक योग, रस, रसायन बनाने के काम आता है। चर्म उद्योग में तने की लकड़ी तथा जड़ें प्राकृतिक रूप से शोधन और रंजन के काम आती हैं।
दारुहल्दी को संस्कृत में दार्वी, पर्जन्या, पीता, पचम्पचा, कालियक, हरिद्रु, पीतदारु, पीतक आदि नामों से भी जाना जाता है। यह आयुर्वेद में एक महाऔषधि है। भावप्रकाश निघंटु में दारुहल्दी के गुणों का अद्भुत वर्णन मिलता है।
हृदय, पित्त, मधुमेह, रक्तचाप, जीर्ण ज्वर, खाँसी, दमा, मूत्रमार्ग की पथरी, रक्ताल्पता आदि अनेक रोगों में अपने गाँव में पितृ, पितृव्य, बांधवों को (जो परंपरा से वैद्य व्यवसायी थे) इसके योग बनाकर देते हुए देखा है।
शोभनम् ! सुन्दर !
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