Saturday, 12 June 2021

शिक्षा, अनुशासन और उपदेश

उपदेश का अर्थ है- शिक्षा, सीख, नसीहत, हित की बात का कहना, दीक्षा। तैत्तिरीय आरण्यक के आचार्य 11 वें अनुवाक में अनुशासन (शिक्षा) देते हैं – सत्यं वद। धर्मं चर । और अंत में "एतदनुशासनम्"। यह तब की प्रत्यक्ष प्रणाली थी जिसमें गुरु का एक आदरणीय स्थान था और उसके उपदेशों को मानना कर्तव्य समझा जाता था।वही शिक्षा थी, वही अनुशासन था।

शिक्षा के कुछ उद्देश्य सनातन और स्थिर होते हैं तो कुछ देश, काल तथा परिस्थिति के अनुसार बदलते भी रहते हैं। इसलिए कुछ लोग शिक्षा, शिक्षण और उपदेश के बीच का अंतर ज्ञान प्रदान करने (शिक्षण) की विधि में मानते हैं। 

माता-पिता द्वारा पुत्र-पुत्री को दी गई शिक्षा को हम क्या कहेंगे? इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि शिक्षा कैसे दी जा रही है। आचरण से, अनुभव से, अपरोक्ष रूप में या कथा, कहानी, प्रवचन आदि के माध्यम से विधि-निषेध बताते हुए उपदेश रूप में। कथा-कहानी रोचक विधा हैं किंतु जब हम कथा के अंत में, "इससे क्या शिक्षा मिली?" से समाप्त करते हैं तो इसे नई पौध उपदेशात्मक मान लेती है। बिदकती है।
आज की पीढ़ी प्रत्यक्ष शिक्षण (करो-मत करो) को उबाऊ मानती है। इसलिए आप ही निर्णय कीजिए के उसे क्या शीर्षक दिया जा सकता है।
       (अपूर्ण)
     

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