Wednesday, 16 October 2024

कोजागरी, खीर और रोटी

कोजागरी, खीर और बेड़ईं रोटी
आश्विन पूर्णिमा को कुमाऊँ, नेपाल, महाराष्ट्र में "कोजागरी" [< 'क: (को) जागर्ति' से व्युत्पन्न] के नाम से जाना जाता है! लोकविश्वास है कि इस रात को लक्ष्मी स्वयं घर-घर घूमकर देखती हैं कि कौन उनकी प्रतीक्षा में जागा हुआ है ' को जागर्ति'। बिहार में, विशेषकर मिथिला में, इसे कोजागरा के नाम से मनाते हैं। नवविवाहित जोड़ों की ओर से तांबूल (पान), बतासा और मखाना वितरित किया जाता है। इसे विवाह के बाद का पहला सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है!
मराठियों में इस पर्व को कोजागिरी कहा जाता है। चन्द्रोदय के उपरांत, श्वेत वस्त्र धारी लक्ष्मी का पूजन होता है और प्रसाद में खीर , बर्फ़ी आदि अनेक प्रकार की सफेद वस्तुओं का भोग लगाया जाता है। सबसे मज़ेदार बात यह कि परिवार में पहली (ज्येष्ठ) सन्तान की आरती उतारी जाती है और उसे परिवार के सभी बड़ों से त्योहारी मिलती है। यह प्रिविलेज छोटे भाई-बहनों के लिए ईर्ष्या और झगड़े का एक कारण बन जाता है।
कुमाऊँ में एक पुराना रिवाज़ यह था कि इस दिन रात को उड़द की पिट्ठी से बेड़ईं रोटी अवश्य बनाई जाती थी। "भाव प्रकाश" में इसे बलभद्रिका रोटी कहा गया है। उल्लेख कुछ यों है:
“चूर्णं यच्छुष्कमाषाणां चमसी साभिधीयते।
चमसीरचिता रोटी कथ्यते बलभद्रिका॥"
(शब्दकल्पद्रुमुम)
अर्थात मास की पिट्ठी को चमसी कहा जाता है और चमसी से बनी रोटी का नाम है बलभद्रिका। संकेत यह भी है कि बलभद्रिका बेड़ई रोटी बल बढ़ाने वाली होती है।


किसी कवि ने इसे "चंद्रबदनी रोटी" भी कहा है।
गोधूमचूर्णचयचारुसुधाकराभा माषप्रचूर्णलवणार्द्रकहिङ्गुगर्भा । हैयङ्गवीनकृतमार्जनकोमलाङ्गी
रोटी मुखे विशतु पुण्यवतां जनानाम् ॥
अर्थात "दाल की पिट्ठी, नमक, अदरक, हींग को अपने उदर में समेटे हुए, ताज़ा घी से चुपड़ी, कोमलांगी, चाँद-सी गोरी, गेहूँ के आटे से बनी विशेष रोटी सभी पुण्यवान लोगों के मुँह में प्रवेश करे।"
शरद पूर्णिमा को अमृत काल कहकर रात भर खुले में रखी खीर सुबह खाना कभी स्वास्थ्यवर्धक रहा होगा, किंतु आज प्रदूषण के कारण एक रात में उसमें ढेर सारा अपद्रव्य मिल जाएगा। प्रदूषित खीर खाने से अच्छा है घर के भीतर बनी ताजी बलभद्रिका (बेडमी) रोटी खाना!
रुचि और वरीयता आपकी।

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