Friday, 18 October 2024

चेतावनी : व्याकरण न जानने से होगी दुर्गति

व्याकरण न जानने से होगी दुर्गति 
••••••••
व्याकरण न जानने वाले का विवाह होना कठिन हो सकता है। यह कथा तो सब जानते हैं कि कुछ धूर्त पंडितों ने छल करके विद्योतमा का विवाह मूर्ख कालिदास से कर दिया था जिसका उच्चारण तक शुद्ध नहीं था। इस कन्या को संभवतः मालूम था कि विद्योत्तमा के साथ धोखा हुआ, इसलिए उसने स्वयं दूल्हे की परीक्षा ली और उसे घोषणा करती पड़ी -
"यस्य षष्ठी चतुर्थी च विहस्य च विहाय च।
यस्याहं च द्वितीया स्यात् द्वितीया स्यामहं कथम्।।"
'जिसके लिए विहस्य, विहाय और अहम् पद क्रमशः षष्ठी, चतुर्थी और द्वितीया विभक्ति के रूप हों, मैं उसकी द्वितीया (पत्नी) कैसे बन सकती हूँ!'
एक पिता ने सोचा अपनी विदुषी कन्या के लिए स्वयं दूल्हे की परीक्षा लेंगे। दुर्भाग्य से व्याकरण न जानने से होने वाले जँवाईं राजा की बड़ी हँसी हो गई। परीक्षक ने घोषणा की- 
अजर्घा यो न जानाति 
यो न जानाति वर्वरी।
अचिकमत यो न जानाति 
तस्मै कन्या न दीयताम् ॥
अजर्घा, वर्वरी और अचिकमत इन पदों की सिद्धि जो लड़का न जानता हो उसे कन्या नहीं देनी चाहिए।
( न त्वम् अजर्घाः कस्यचिद् धनं बाल्ये। 
अचीकमत न त्वद्यापि ते चित्तम्।)
एक पिता अपने पुत्र से निवेदन करते हुए कहते हैं - 
यद्यपि बहुनाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
स्वजनः श्वजनः मा भूत् सकलः शकलः सकृत्छकृत्।।
बेटे, व्याकरण इसलिए भी पढ़ो कि उच्चारण में स और श का अंतर न जानने से ही अनर्थ हो सकता है। जैसे:
स्वजन – संबंधी, श्वजन – कुत्ता।
सकल – सम्पूर्ण, शकल – खण्ड। 
सकृत् – एक बार, शकृत् – विष्ठा।

राजा भोज तो बहुत शिक्षित और विद्वान था, कहते हैं उसके राज्य में सब संस्कृत बोलते-समझते थे, लेकिन एक बार व्याकरण की अशुद्धि के कारण स्वयं राजा भोज को एक लकड़हारिन से अपमानित होना पड़ा था। उसने देखा एक लकड़हारिन ने इतना भारी बोझ उठा रखा था कि बेचारी को चलना कठिन हो रहा था। प्रजा का दुख न देख पाने के स्वभाव से भोज पूछ बैठा -
"भूरिभारभराक्रान्तस्तत्र स्कन्धो न बाधति?   
न तथा बाधते राजन् यथा बाधति बाधते॥"
संवाद का आशय कुछ इस प्रकार है -
भोज~ भारी बोझ उठाते तुम्हारे कंधे नहीं दुखते?
लकड़हारिन~ महाराज, बोझसे उतना नहीं दुखते। मैंने तो अभी आपके मुँह से 'बाधते' के स्थान पर 'बाधति' सुना और व्याकरण की ऐसी अशुद्धि सुनकर मुझे सिर पर रखे बोझ से भी अधिक कष्ट हो रहा है!
*******
१८ अक्टूबर '२४

3 comments:

  1. हिंदी भाषा के प्रयोक्ताओं में भाषा प्रयोग के प्रति जिम्मेदार एवं संवेदनशील दृष्टि के निर्माण में सर्वाधिक सक्रिय भाषा पुरोधा डॉ सुरेश पंत जीवन की सामान्य गतिविधियों के बीच हास्य-व्यंग्य के उपयोग से व्याकरण चर्चा को आम जन के लिए ग्राह्य बनाते हैं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत धन्यवाद आपका। पुरोधा तो भारी विशेषण है, नहीं उठा पाऊँगा। 🤔

      Delete
  2. डॉ सब्य साचिन

    ReplyDelete