Sunday, 20 October 2024

चौथ का चाँद

(प्रतीकात्मक फोटो गूगल से)
 भारत में विवाहित स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है। चौथ के दिन दिन भर व्रत रखकर शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद उसे अरगड़े कर ही व्रत खोला जाता है। करवा चौथ पर रीति कवि बिहारी की कल्पना बड़ी मनोरम है।
"तूँ रहि हौं ही सखि लखौं
चढ़ि न अटा बलि बाल।
सबही बिनु ससि ही उदै
दीजतु अर्घ अकाल॥
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बिहारी के ही एक अन्य दोहे में सखियाँ चंद्रमुखी नायिका से कहती हैं- चाँद देख लिया, अब संकट चतुर्थी का व्रत खोलने छत से नीचे चलो ताकि और नारियाँ भी एकचित्त होकर चाँद को देख सकें। तुम छत पर रहोगी तो वे दुविधा में पड़ जाएँगी कि चाँद तुम हो या आसमान वाला। तुम्हारा चाँद-सा मुखड़ा देखकर उन्हें यह दुविधा भी हो सकती है कि चौथ का चाँद तो पतला होता है, लेकिन आज चौथ के दिन पूरी गोलाई का चाँद कैसे उग आया। इसलिए -
दियौ अरघु नीचे चलौ, संकटु भानैं जाइ।
सुचिती ह्वै औरौ सबै ससिहिं बिलोकैं आइ॥
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महाकवि कालिदास ने भी एक अन्य प्रसंग में ऐसा ही कहा है। चंद्रग्रहण की वेला है। नायिका बाहर घूम रही है। ऐसे में अगर राहु ने उसे ही चंद्रमा समझकर, या चंद्रमा से भी अधिक सुंदर समझ कर उसे निगल लिया तो मुसीबत हो जायेगी।
झटिति प्रविश गेहे मा बहिस्तिष्ठ कान्ते, ग्रहणसमय बेला वर्त्तते शीतरश्मेः। तवमुखमकलङ्कं वीक्ष्य नूनं स राहुः, 
ग्रसति तब मुखेन्दुं पूर्णचन्द्रं विहाय॥
"हे सुंदरी! बाहर मत बैठो, जल्दी-जल्दी घर के अंदर घुस जाओ। चंद्रग्रहण का समय चल रहा है। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा देदीप्यमान मुखमंडल देखकर राहु चंद्रमा को छोड़कर तुम्हें ही जकड़ ले।"
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और इस नायिका ने तो कमाल ही कर दिया। उसके घर के आस-पास पूरे मोहल्ले में हर रात पूनम का चांद चमकता है। लोगों को समस्या है कि पूर्णिमा तिथि किस दिन मानें। निदान उन्हें पंचांग का महत्व समझ में आया कि पूर्णिमा जाननी हो तो भाई, पत्रा-पंचांग में ढूँढ़ लो। मोहल्ले में तो उस मुखड़े की चमक-दमक से रोज़ चाँदनी ही चाँदनी है।
पत्रा ही तिथि पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पून्यौई रहै, आनन-ओप-उजास॥
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