Saturday, 10 February 2024

मेरी नफ़रत और मेरा प्यार

नफ़रत और प्यार पहले ही नज़र में एक दूसरे के विलोम है। हम जिससे नफ़रत करते हैं, उसे अपने पास नहीं फटकने देना चाहते और इसके विपरीत जिससे प्यार करते हैं, उसे अपनी नज़रों से दूर नहीं करना चाहते। ऐसा संभव नहीं है कि हम एक ही समय किसी को प्यार भी करते हों और नफ़रत भी। लेकिन ऐसा हो रहा है, कम से कम मेरे साथ तो कुछ वर्षों से हो रहा है। वो कहते हैं ना कि बुढ़ापे का इश्क़ गजब का होता है।

आत्म नियंत्रण की परख के लिए सरदार खुशवंत सिंह ने कहीं लिखा था- कोई मूँगफली की एक पुड़िया लेकर जेब में रख ले। एक-दो मूँगफलियाँ खा लेने के बाद तय करे कि अब नहीं खाएगा। यदि वह ऐसा कर पाया तो सचमुच दृढ़ इच्छा शक्ति वाला माना जाएगा, लेकिन कोई ऐसा कर नहीं पाता। मुझे लगता है यह परीक्षण मोबाइल और हमारे संबंधों पर भी लागू होता है।

मोबाइल फ़ोन अभिशाप भी है और वरदान भी। निस्संदेह इसमें बीसियों बुराइयाँ हैं। ऐसा गुरुत्वाकर्षण है कि पूछिए मत। यह जानना असंभव हो जाता है कि आप इससे चिपके हैं या यह आपसे। समय का पता ही नहीं लगता। मुवे को एक बार छू लिया तो गए दीन से भी और दुनिया से भी। मैं व्यक्तिगत तौर पर इसकी आशिक़ी का सताया हुआ हूँ। जीवन में कभी मादक द्रव्यों का सेवन नहीं किया फिर भी कह सकता हूँ कि मोबाइल का नशा सबसे तीखा नशा है और मैं इसका नशेड़ी हूँ। मेरे एक मित्र नशे में टुन्न होकर शाम को मेरे पास आते थे तो रोते हुए, कसमें खा-खाकर कहते थे कि कल से बिल्कुल नहीं पियूँगा और अगली शाम को फिर बोतल के पास। यही हाल हम मोबाइल वालों का भी है। अगली शाम तो क्या, हम अगले घंटे तक रुक नहीं सकते बिना निगोड़े को छुए।

लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। यह आज के जीवन का अपरिहार्य अंग बन गया है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए, उसकी आवश्यकतानुसार। अपना ही उदाहरण दूँ। उम्र के इस पड़ाव पर कलम से लिखने में मुझे बड़ी असुविधा होती है। अधिक देर तक मेज़ पर बैठ नहीं पाता और लिखावट टेढ़ी-मेढ़ी होती है। पिछले चार-पाँच वर्षों में मैंने जो भी लिखा है (ब्लॉग ,यूट्यूब की स्क्रिप्टें, अखबारों के लिए लेख और पुस्तकें) मोबाइल पर डिक्टेट करके ही लिखा है। दूसरी बात, भाषाओं और शब्द व्युत्पत्तियों पर अपनी रुचि होने के कारण मुझे संदर्भ के लिए प्रायः अनेक शब्दकोश देखने पड़ते हैं। भारी-भरकम कोशों को उठाने और बरतने में कष्ट होता है। अब बीसियों कोश मेरी हथेली पर हैं, वे भी जो अन्यथा अनुपलब्ध हैं। एक-दो क्लिक और वांछित सामग्री सामने होती है। मेरी पठनगति और जानकारी  में बहुत विस्तार हुआ है। सोचता हूँ इसके बिना तो अब मेरा काम ही नहीं चल सकता।

धन्यवाद मेरे सहायक। मैं तुमसे परेशान हूँ, तुमसे नफ़रत करता हूँ, लेकिन मैं तुम्हें प्यार भी करता हूँ। हरदम हथेली पर रखता हूँ और आँखों से दूर नहीं होने देता।

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