नव संवत्सर प्रतिपदा को, और कहीं-कहीं बैसाखी संक्रांति को, नीम की कलियाँ खाने का रिवाज है। कन्हैया को भी नीम- मिसरी का भोग लगाया जाता है। संभवतः इसलिए की जीवन में मीठे के साथ कड़वा भी आवश्यक है, जैसे सुखों के साथ दुख।
भोजन के रस छह प्रकार के गिनाए गए हैं —
मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (चरपरा), तिक्त (तीता), कषाय (कसैला)।
संस्कृत में मिर्च (मरीच) के स्वाद को "कटु" (कड़वा) कहा गया है , आयुर्वेद के अनुसार त्रिकटु में आते हैं - मरीच, पिप्पली, शुण्ठी (सौंठ)। नीम को "तिक्त" (तीता) कहा गया है। हिंदी में आते-आते नीम और करेले का स्वाद भी कड़वा हो गया। मिर्च कहीं तीती बताई जाती है, कहीं करू, कहीं तीखी। तीखा/तीखी किसी स्वाद के विशेषण तो हो सकते हैं, स्वाद-नाम नहीं। झाल, जाल, झौलि, झौलैन भी मिर्च के स्वाद हैं जिनका मूल संस्कृत के √ज्वल् 🔥 (जलना) से है। अंग्रेजी इन झंझटों से मुक्त है। वहाँ मिर्च हॉट है जो हमारे ज्वल के ही निकट है।
मध्ययुगीन कविता में तिक्त भी कटु माना जाने लगा था। कटु > कड़वा > करुआ।
"सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यों करुई ककरी"--सूरदास
"खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय.
रहिमन करुए मुखन को, चहियत यही सजाय।।" -रहीम
तो मिर्च को तिक्त और नीम या करेले को कटु स्वाद का उदाहरण मान लिया जाय। "कड़वा तेल" में फिर मामला उलझता है क्योंकि उसका स्वाद नीम के नहीं, मिर्च के निकट है।
*******
No comments:
Post a Comment