आज जब लखनऊ से पत्रकार मित्र नवलकांत सिन्हा ने मुझे पूछा कि हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है या पढ़ा जाता है, तो क्षण भर के लिए मैं भी अचकचा गया था। प्रश्न जितना सपाट लग रहा है, उतना सपाट है नहीं। वाक्य रचना कर्मवाच्य की है और कर्मवाच्य में क्रिया कर्म के अनुसार होती है। चालीसा, चालिसा (40 दिन का कोई अनुष्ठान, 40 का कोई संग्रह) पुल्लिंग है और इस दृष्टि से क्रिया भी पुल्लिंग होनी चाहिए। अर्थात हनुमान चालीसा पढ़ा जाता है।
प्रश्न को मैंने बिना किसी लागलपेट के सोशल मीडिया के दो मंचों पर अपने मित्रों से पूछ लिया और उनके संवाद देखने लगा। चर्चा अच्छी रही और सजग पाठकों ने सक्रिय रुचि भी दिखाई। समस्या क्योंकि क्रिया के लिंग निर्धारण या उसके प्रयोग से जुड़ी है, इसलिए यह समझना आवश्यक है की पूर्वांचल, बिहार, ओडिसा, पश्चिमी बंगाल आदि क्षेत्रों की हिंदी में लिंग कोई बहुत बड़ा मसला नहीं है और उसमें स्त्रीलिंग का भेद प्रायः नहीं किया जाता।
जैसा कि मैंने अनेक बार संकेत किया है कि कोई भी जीवंत भाषा, यदि आवश्यक हुआ तो, व्याकरण के कूल-कगारों को तोड़ती हुई भी आगे बढ़ती है। और व्याकरण के कूल-कगारों को तोड़ने का यह काम किसी अख़बार के कार्यालय में बैठकर (जैसे एक राष्ट्रीय समाचार पत्र द्वारा नए स्त्रीलिंग— बल्लेबाज़नी, वैज्ञानिका— बनाने का उपक्रम) या किसी लेखक की सनक से नहीं होता। उसे लोक निर्धारित करता है। भाषा का संबंध लेखन से कम, उसके मौखिक स्वरूप से अधिक होता है । इसे यों कहा जाए कि मूलत: तो भाषा मौखिक होती है। भाषा बोलने-बरतने के लिए पहले से व्याकरण जानना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि किसी भी भाषा का व्याकरण उसके वक्ता प्रयोक्ता के मन में पहले से अनुस्यूत होता है। उसी के अनुसार वह वाक्य रचना करता है और अपने आप को संप्रेषित करता है। यदि आवश्यक हुआ तो उसके पीछे के निहित व्याकरण नियमों को वह बाद में समझता है अर्थात भाषा पहले, व्याकरण बाद में।
अब आते हैं मूल समस्या पर कि हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है या पढ़ा जाता है?
जैसा कि उत्तरों से भी स्पष्ट है अधिक संख्या में लोगों का मानना है कि हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है। निहित व्याकरण के अनुसार ये तर्क दिए जा सकते हैं । इनमें से कुछ तर्क मुझे अपने अनुसारकों, मित्रों, पाठकों से प्राप्त हुए हैं। उनका धन्यवाद।
आइए देखें -
यह सामान्यीकरण कि आकारांत संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। (जो इस संदर्भ में सत्य नहीं है क्योंकि चालीसा पुल्लिंग है)
जिसे पढ़ा जा रहा है वह आकार में बहुत छोटी पुस्तक, पुस्तिका/पोथी है, इसलिए स्त्रीलिंग ।
हनुमान चालीसा कोई सत्संग प्रवचन नहीं, स्तुति है और स्तुति स्त्रीलिंग है।
वेद-पुराण पढ़े जाते हैं; गीता या हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है।
रामायण और महाभारत में महाभारत पढ़ा जाता है किंतु रामायण पढ़ी जाती है। इसलिए कि रामायण भक्ति भाव प्रधान कथा (स्त्रीलिंग) है तथा महाभारत वीरता और पौरुष का महाकाव्य (पुलिंग)।
कुछ और रोचक तर्क मिले, उन्हें आप स्वयं देख सकते हैं।
No comments:
Post a Comment