[वरिष्ठ पत्रकार भाई ओम थानवी जी की एक फेसबुक पोस्ट के संदर्भ में]
पुल्लिंग पुंस (नर) के लिंग (चिह्न) के अर्थ में रचा गया हिंदी का अपना सामासिक शब्द है।
कुछ अन्य रूप जो दिखाई पड़ रहे हैं और शुद्ध बताए जा रहे हैं, उनमें पुर्लिंग बनेगा नहीं। पुंल्लिंग का उच्चारण नहीं हो सकता, इसलिए असिद्ध। पुँल्लिंग बोला जा सकता है किंतु मकार को अनुनासिक बनाने का नियम कम-से-कम मुझे मालूम नहीं है।
स्रोत भाषा संस्कृत में पुल्लिङ्ग के स्थान पर पुंलिङ्ग शब्द का प्रयोग किया जाता है।
"पुंलिङ्गा इव नार्य्यस्तु स्त्रीलिङ्गाः पुरुषाभवन्।"
(~ महाभारत)
यदि संस्कृत वर्तनी ही शुद्ध होती हो तब तो पुल्लिंग अशुद्ध है, किंतु हमें यह भी देखना होगा कि हिंदी संस्कृत से बहुत आगे निकल आई है। उसका अपना व्याकरण कुछ ऐसा भी है जो संस्कृत से पूरा-पूरा मेल नहीं खाता। उसे बार-बार संस्कृत के व्याकरण में क्यों जकड़ा जाए। सैकड़ों शब्द ऐसे हैं जो वर्तनी, लिंग, अर्थ आदि में संस्कृत से भिन्न हैं या एकदम विपरीत हैं। भिन्न लिंग का ही एक उदाहरण देना चाहूँगा–
देवता- (संस्कृत में स्त्रीलिंग, हिंदी में पुल्लिंग) ।
आत्मा (संस्कृत में पुल्लिंग, हिंदी में स्त्रीलिंग)।
तद्भव रूप में विकसित हुए शब्दों में पुल्लिंग मेरी जानकारी में एकमात्र ऐसा शब्द है जिसमें अनुस्वार का ल् में परिवर्तन दिखाई पड़ता है। व्याकरण से भाषा बनती नहीं, सँवरती है और व्याकरण का अनुशासन भाषा के समकालीन प्रयोगों की अनदेखी नहीं कर सकता। लोकसिद्ध को असिद्ध भी नहीं ठहराया जा सकता।
यह मेरे विचार हैं। चर्चा से इन्हें आगे बढ़ाया जा सकता है और सुधार किया जा सकता है।
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