तब मेरा पहाड़ी गाँव पेड़ों की गोद में था
और पेड़ जंगल की गोद में
तोतों-खरगोशों-गिलहरियों से मेरी पहचान बहुत पुरानी है
वहीँ किसी चोटी गुफा या झुरमुट में
कैद है मेरा मन आज भी |
वहीँ किसी चीड़-वन से सीखा था सांस लेना
देवदार और बांज वृक्ष से लुकाछिपी सीखी थी
हरियाली ने सौंपी थीं कवितायेँ, झरने ने गति, स्वर और –
और बहुत कुछ बहुतों ने |
गाँव अभी भी वहीँ है, बस गोद छीन गई है उसकी –
टहनियाँ टूट-गिर गईं ...तिनके उड़ गए
घोंसले की जगह पहचानना आकाशबेल की जड़ पहचानना हो गया
मुझे अब न तोते पहचानते हैं, न खरगोश
न गिलहरियाँ न तितलियाँ
अपनी बेदखली का जिम्मेदार वे मुझे ही मानते हैं |
बहुत ही सुंदर शब्दों में सत्य कह गये आप नाना जी :)
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