Thursday, 9 September 2021

गोरखधंधा वर्जित शब्द

"रब्ब इक्क गुंझलदार बुझारत,
रब्ब इक्क गोरखधंधा।
खोल्हण लग्गेयाँ पेच एस दे,
काफ़र हो जाय बंदा।"
       ~मोहन सिंह, पंजाबी कवि
 सामान्य जन को अपने अंतर की खोज के लिए आवश्यक अनुशासन और योग साधना में प्रवृत्त करने के उद्देश्य से गुरु गोरखनाथ जी (११-वीं सदी) ने जितना प्रयत्न किया उतना शायद किसी ने भी नहीं किया। मानसिक रूप से सक्षम व्यक्ति को ही शिष्य रूप में चुनने के लिए उन्होंने इतनी विधियाँ दीं कि लोग उलझ गए की कौन-सी ठीक है, कौन-सी गलत; कौन-सी करें, कौन-सी छोड़ें। यह उलझाव इस सीमा तक जा पहुँचा कि लोग हताश होने लगे तथा गोरखधंधा शब्द प्रचलन में आ गया। जो समझ में न आ सके वह गोरखधंधा कहा जाने लगा।
यह भी कहा जाता है कि गोरखपंथी साधु लोहे या लकड़ी की सलाइयों के हेर-फेर से एक चक्र बनाते हैं। उस चक्र के बीच में एक छेद करते हैं। इस छेद में से कौड़ी या माला के धागे को डालते हैं और फिर मंत्र पढ़कर उसे निकाला करते हैं। इसी को गोरखधंधा या धंधारी कहते हैं। इस गोरखधंधे का उल्लेख योगियों के संदर्भ में प्रायः मिल जाता है। गोरखधंधा या धंधारी में से सही विधि जाने बिना कौड़ी या डोरी निकालना बहुत उलझन भरा कठिन कार्य होता है। इसीलिए गोरखधंधा शब्द का प्रचलन उलझन और झंझट वाले कार्यों के लिए होता रहा है।
कालांतर में इन विधियों का दुरुपयोग नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को छलने में भी होने लगा जिसके कारण समय के साथ -साथ यह शब्द नकारात्मक होता चला गया।
मध्यकाल के व्याख्याता पंडित हजारी प्रसाद द्विदेवी को नाथपंथी धारा का अध्येता समझा जाता है। उन्होंने लिखा है कि ‘गोरखधंधा’ एक किस्म की जटिल मस्तिष्क क्रीड़ा या दिमागी खेल होता था जिसे स्वयं गुरु गोरखनाथ ने आविष्कृत किया था। इस क्रीड़ा के माध्यम से वे अपने घुमंतू अनुयायियों की मानसिक और शारीरिक क्षमताओं को निखारने का काम करते थे। उन्होंने अपने इन अनुयायियों को समाज में जाति रहित समुदायों की स्थापना का उपदेश दिया था।

अब यह शब्द अचानक चर्चा में आया है, इस आरोप के साथ कि यह समाज के कुछ लोगों की भावनाओं को आहत करता है। हिंदी शब्दकोशों के अनुसार गोरखधंधा शब्द का अर्थ- 'जल्दी समझ में न वाली बात, पहेली, कोई जटिल कार्य जिसका निराकरण सहज न हो, अनियमितता या घपला' होता है। ये सब अर्थ लाक्षणिक (मुहावरे के रूप में) हैं। किसी वर्ग को आहत करने की बात इनसे नहीं जुड़ती।
गोरखधंधा शब्द का प्रयोग कबीर, तुलसी आदि मध्यकालीन कवियों ने भी किया है। आज उसके लाक्षणिक अर्थ के कारण कुछ लोग आहत हो रहे हैं तो इसमें बेचारे निरपराध शब्द को सजा क्यों? ऐसे धंधे रुकें जो गोरखधंधे कहलाते हों, शब्द पर रोक लगाने से वे नहीं रुकेंगे।


1 comment:

  1. "गोरख" तो अत्यंत पवित्र नाम है। "गौरक्ष" या "गौ-रख"! अर्थात "गौ" माता के रक्षक! हिन्दू पुराणों में "गौ" में ३३कोटि का निवास माना गया है। कहते हैं आज भी घर घर में रोटी का पहला ग्रास "गौ" निमित्त ही निकाला जाता है। वैज्ञानिकों ने भी अपने सिद्धांत में पाया कि" गौ"एकमात्र ऐसा जीव जो प्राणवायु अॉक्सीजन लेती भी है और छोडती भी है।

    सो "गौ-रक्ष" का अर्थ परमपिता परमात्मा भगवान शिव के उस महायोगी स्वरूप निरंजन निराकार स्वरूप से है जो परम ब्रह्म है। जो अपनी शक्ति के द्वारा ३३ कोटि की रक्षा कर रहे हैं। यह ऐसे है जैसे वट वृक्ष रूपी सृष्टि में पत्ते तो अनेक हैं पर उनकी सजीवता व सुंदरता जड़ में स्थित प्राणवायु के द्वारा संभव हो रही हो।

    सृष्टि में शिवगोरक्ष एक ही नाम है और उनकी महिमा और गरिमा अतुल्य है।

    अलख निरंजन!!

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