• कोई भी जीवित भाषा नदी की भाँति निरंतर बहती है, वह व्याकरण की चिंता नहीं करती. उसके प्रयोक्ता उसे आगे बढ़ाते हैं. व्याकरण तो उसका पीछा करता है. इसलिए व्याकरण के नियम जब तक स्थिर होते हैं तब तक भाषा आगे निकल जाती है.
• हिंदी संस्कृत से भले ही विकसित हुई हो किंतु आज वह प्राकृत, अपभ्रंश के पड़ावों को पार करती हुई संस्कृत से दूर निकल आई है और एक स्वतंत्र भाषा है। उसका अपना व्याकरण है। इसलिए उस पर संस्कृत व्याकरण को थोपा नहीं जा सकता। हाँ, जहाँ तक संगत हो, उससे दिशा-निर्देश लिया जा सकता है। हिंदी व्याकरण वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) है, इसलिए बाध्यकारक नहीं। संस्कृत व्याकरण निर्देशात्मक (प्रेस्क्रिप्टिव) है, पाणिनीय नियमों का उल्लंघन स्वीकार नहीं करता। हिंदी में व्याकरण से भिन्न लोकस्वीकृत भाषा रूप भी स्वीकारे जाने चाहिए, किंतु इसका आशय यह नहीं कि मनमानेपन की छूट हो।
• हिंदी का सौभाग्य है कि उसे अलग अलग राज्यों-देशों के लोग अपने-अपने ढंग से बोलते हैं. हरयाणवी हिंदी या हैदराबादी हिंदी या ‘गोरों’ की हिंदी हमारी अपनी हिंदी भाषा की शोभा बढाती हैं, उसकी व्यापकता और अपरिहार्यता को रेखांकित करती हैं.
• हिंदी कैसी हो, उसकी वर्तनी, प्रयोग आदि पर बहसों में हिंदी-भाषी का मत ही ग्राह्य हो, यह ज़रूरी नहीं. ज़रूरी है सबका सबसे संवाद.
• हम हिंदी भाषी लोग तो हिंदी वर्तनी के अनेक रूपों से परिचित है, इसलिए हमें हिंदी आसान लगती है पर जो चेन्नई, दीमापुर, कवरत्ती या न्युयार्क, बीजिंग, तोक्यो, केपटाउन जैसे दूरदराज के स्थानों से हिंदी सीख रहे है उनके लिए हिंदी बहुत कठिन भाषा है और एक ही शब्द को लिखने-बोलने के अलग-अलग तरीकों से वे भ्रमित होते हैं. मानकीकरण एकरूपता के लिए होता है, जिससे सीखने-पढ़ने में आसानी होती है. उससे नाक-भौंह सिकोड़ना हिंदी के व्यापक हित में नहीं है।
बहुत ही श्रद्धा हुआ एवं उपयोगी विचार वास्तव में हिंदी अथवा कोई भी भाषा को एक अविरल नदी के समान है जो जिस किसी स्थान विशेष से गुजरता है वहां की स्थानीय ता से अपने को पृथक नहीं रख पाता भाषा विथ सुरेश पंत जी की टिप्पणियां वास्तव में बहुत ही मार्मिक एवं तथ्यपरक होती हैं इस टिप्पणी को मैंने साभार अपने क्विट के लिए ग्रहण किया है और एक बार पुनः आपको बहुत-बहुत बधाई देते हुए आपका आभार व्यक्त करता हूं
ReplyDeleteभाषा का दो पक्ष होता है एक सैद्धांतिक पक्ष दूसरा व्यावहारिक पक्ष इन दोनों पक्षों में भाषा के द्वारा अपनाए गए शब्द विधान एवं वाक् चातुर्य वाक्य विद्या अलग-अलग होते हैं निश्चित तौर पर समय-समय पर इनका निराकरण एवं मूल्यांकन होते रहना अत्यंत आवश्यक है सुरेश पंथ जैसे भाषा वैज्ञानिक एक भाषा की लिपि की भांति अपने दायित्व निर्वहन हेतु सदैव तत्पर रहते हैं यह हम सब भाषा के विद्यार्थियों का सौभाग्य है मैं एक बार पुनः आपका आपके इन योगदान ओं के लिए आभार व्यक्त करता हूं एवं निरंतर आपका आशीष बना रहे इसकी कामना करता हूं
ReplyDeleteराष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में हिंदी का प्रचार प्रसार एवं व्यवहार कुछ अलग संदर्भों को ले करके देखा गया है हमें हिंदी के बहुभाषिक व्यावहारिक स्वरूप को ध्यान में रखते हुए आत्मसातीकरण के बृहद परिप्रेक्ष्य हेतु स्वयं को तैयार रखते हुए भी इसकी मूल आत्मा की सुरक्षा हेतु सदैव तैयार रहना होगा बड़ी प्रसन्नता का विषय है कि सुरेश पंथ इस विषय में अपने दृष्टिकोण सहित पूरी तरह सतर्क है यह सतर्कता हमें आगे की राह दिखाती है
ReplyDeleteसर आप बहुत शानदार लिखते हैं।🙏🙏🙏👍👍👍❤️❤️
ReplyDelete"हिंदी की बिंदी" शुद्ध व्याकरणिक प्रयोग कैसे करें, बहुत ही पसंदीदा/जिज्ञासु तथ्य जाने/"Hindi ki bindi" pasandeeda/jigyaasu tathy.
हिंदी का अनोखा अनुभव ब्लॉगस्पॉट