"श्री" का मुख्य प्रचलित अर्थ है लक्ष्मी। यह प्रतिष्ठा, धन-दौलत, सम्मान आदि का वाचक भी है। है तो स्त्रीलिंग, किंतु पुरुषों ने इसे अपने नाम से पहले शोभा के रूप में धारण कर लिया है। पहले अपने देवताओं को अर्पित किया - श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री गणेश; और उसके बाद नैवेद्य के रूप में स्वयं ग्रहण कर लिया। अब यह पुरुष सामान्य के लिए विशेषण बन गया है। यह बात और है कि सौजन्य वश या शिष्टता के कारण (दिखावे की ही सही) व्यक्ति स्वयं अपने नाम के आगे श्री नहीं लगाता किंतु अपेक्षा करता है कि दूसरा उसे श्री अवश्य कहे। अब जिसके नाम का अंग ही श्री हो उन्हें एक श्री और उपहार में मिल जाता है - जैसे श्री श्रीलाल, श्री श्रीनाथ। अंग्रेजी के 'मिस्टर' के लिए यह हिंदी समानार्थी बन गया है। सामाजिक न्याय कुछ ऐसा है कि आप किसी सामान्य भिखारी को तो श्री भिखारी जी नहीं कहेंगे किंतु किसी सम्मानित पदधारी को आप श्री अशर्फीलाल ही नहीं, श्री भिखारी दास भी कह सकते हैं! हाँ, एक बात और। श्री आप एक व्यक्ति के लिए लगा रहे हैं तो भी क्रिया बहुवचन की ही लगेगी।
पुरुषों ने स्वयं को प्रतिष्ठित, धनसंपन्न, सम्मानित बताने के लिए अपने नाम के साथ श्री जोड़ा तो महिलाओं ने श्रीमती जोड़ लिया। अंततः धन-दौलत की चाबी तो उनके पास ही रहती है ना! वे श्रीमती होंगी, तभी आप श्रीमान होंगे; वरना ठन-ठन गोपाल। धीरे-धीरे श्रीमती विवाहिता महिला के लिए रूढ़ बन गया। केवल और केवल विवाहित महिला ही श्रीमती कही जाती है। यहां उसकी रुचि-अरुचि की अपेक्षा सामाजिक नियंत्रण अधिक समर्थ है। संपन्न किंतु अविवाहित महिला को श्रीमती कहे जाने का अधिकार नहीं।
याद आता है एक बार संसद में भी बहस हुई थी कि श्री विशेषण पर पुरुषों का वर्चस्व कैसे? महिलाओं के साथ भी श्री क्यों न लगे? यह पुरुषों का एकाधिकार कैसे हो सकता है? हम देवियों को तो श्री कहते हैं - श्री राधा जी, श्री सीता जी। याद नहीं कि बहस का क्या परिणाम निकला था किंतु पुरुष को श्री और विवाहिता महिला को श्रीमती कहने की यह परंपरा चल रही है आज भी और संभवत: आगे भी। पुरुषों ने रहस्य यहाँ भी बनाए रखा। विवाहित होने अथवा न होने के बारे में 'श्री' से कुछ पता नहीं चलता। श्री "अमुक" विवाहित भी हो सकते हैं, कुँवारे भी और विधुर भी। श्रीमती "अमुक" विवाहित ही होगी, विधवा होने पर भी श्रीमती। संबंध विच्छेद हो जाने पर उनकी इच्छा पर है कि वे 'सुश्री' ठीक समझती हैं या श्रीमती।
अपनी पत्नी को "श्रीमती जी!" संबोधन बिल्कुल सही है किंतु सामान्यतः किसी अन्य के लिए नहीं। पूछताछ वाली खिड़की पर बैठा कर्मचारी जब विनम्रता से किसी महिला से पूछता है, "मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ श्रीमती जी", तो उसका आशय अंग्रेजी के "मैडम" शब्द से होता है, कुछ और नहीं।
अविवाहित कन्याओं को "कुमारी" कहा जाने लगा किंतु कुमारी के साथ जो कौमार्य की अर्थ संकल्पना है वह नारी समाज के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण की भी द्योतक है और आवश्यक नहीं कि सबको स्वीकार्य हो। जो महिलाएँ उम्र में बड़ी हैं और विवाहित होने- न -होने के बारे में नहीं बताना चाहतीं या इस बारे में आपको नहीं पता है, तो? तब उनके नाम के पहले सम्मान व्यक्त करने के लिए "सुश्री" जोड़ने का चलन चला, अर्थात श्री को तो महिलाओं के लिए भी अपना लिया गया किंतु एक सुंदर सा प्रविशेषण "-सु" और जोड़ दिया गया। गोपनीयता की रक्षा भी हो गई।
श्री की सांस्कृतिक जड़ें बड़ी पुरानी और व्यापक रही हैं। पहले जब पत्र लेखन और औपचारिक संबोधन के नियम निर्धारित थे, तब सिखाया जाता था:
"श्री लिखिए षट् गुरुन को, स्वामि पाँच, रिपु चार।
तीन मित्र, दो भृत्य को, एक शिष्य सुत नार॥ "
अर्थात परिवार के बड़े लोगों, गुरुजनों को श्री ६, स्वामी अथवा राजा को श्री ५, शत्रु को श्री ४, मित्र को श्री ३, सेवक को श्री २, और शिष्य, पुत्र और पत्नी को श्री १ लिखा जाना चाहिए ।
कोई संत श्रीजी हों तो उन्हें श्री श्रीजी कहा जा सकता है, किंतु संत और साधुओं के समाज में श्री को लेकर बड़ी उथल-पुथल रही है और नियमों को ठीक ठीक नहीं समझा जा सकता। यहाँ तो कम से कम "श्री १०८" से संबोधन प्रारंभ होता है और "श्री १००८", "श्री १००००८" से होता हुआ "अनंत श्री" तक जा पहुँचता है। वे इतने समर्थ होते हैं कि अपने लिए स्वयं चुनाव कर सकते हैं कि उन्हें श्री १०८ कहा जाए या अनंतश्री विभूषित।
अर्थात परिवार के बड़े लोगों, गुरुजनों को श्री ६, स्वामी अथवा राजा को श्री ५, शत्रु को श्री ४, मित्र को श्री ३, सेवक को श्री २, और शिष्य, पुत्र और पत्नी को श्री १ लिखा जाना चाहिए ।
कोई संत श्रीजी हों तो उन्हें श्री श्रीजी कहा जा सकता है, किंतु संत और साधुओं के समाज में श्री को लेकर बड़ी उथल-पुथल रही है और नियमों को ठीक ठीक नहीं समझा जा सकता। यहाँ तो कम से कम "श्री १०८" से संबोधन प्रारंभ होता है और "श्री १००८", "श्री १००००८" से होता हुआ "अनंत श्री" तक जा पहुँचता है। वे इतने समर्थ होते हैं कि अपने लिए स्वयं चुनाव कर सकते हैं कि उन्हें श्री १०८ कहा जाए या अनंतश्री विभूषित।
••• ••• ••• ©suresh pant ••• •••
बहुत बढ़िया लेख।
ReplyDeleteआपके लेख ज्ञानवर्धक होते हैं।
ReplyDelete"हिंदी की बिंदी" शुद्ध व्याकरणिक प्रयोग कैसे करें, बहुत ही पसंदीदा/जिज्ञासु तथ्य जाने/"Hindi ki bindi" pasandeeda/jigyaasu tathy.
ReplyDeleteवादा है यदि आपने ये पेज पढ़ लिए तो आप हिंदी में कभी गलती नहीं करेंगे/Promise if you read these page you will never make mistake in Hindi.
����������❤️❤️❤️
बहुत बढ़िया
ReplyDeleteलाजवाब !
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