Friday, 25 June 2021

कल किसी का ...


कल
किसी का हो सका क्या ?
और अगला कल -
क्या किसी का हो सकेगा?
•••
मुट्ठीबंद सूखी रेत-सा 
है फिसलता काल
हर विकल पल को बनाता कल
आज का चल बिंदु ही अपना 
है लिए कुछ साँस के पल
तो बढ़ाएँ हाथ
जिएँ हम 
इन पलों के साथ,
ऐसा न हो -
कल वे बनें  
फिर वही
सूने विफल पल 
कल के विकल पल !
कल किसी का हो सका क्या ?
•••     •••
©सुरेशपन्त

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