कल
किसी का हो सका क्या ?
और अगला कल -
क्या किसी का हो सकेगा?
•••
मुट्ठीबंद सूखी रेत-सा
है फिसलता काल
हर विकल पल को बनाता कल
आज का चल बिंदु ही अपना
है लिए कुछ साँस के पल
तो बढ़ाएँ हाथ
जिएँ हम
इन पलों के साथ,
ऐसा न हो -
कल वे बनें
फिर वही
सूने विफल पल
कल के विकल पल !
कल किसी का हो सका क्या ?
••• •••
©सुरेशपन्त

वाह।
ReplyDeleteधन्यवाद।
ReplyDeleteबहुत सुंदर ।
ReplyDeleteबहुत सुंदर..जीवन की सच्चाई भी
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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